'BJP नेता के एक दलित परिवार को बेरहमी से पीटने' का सच: ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, प्रशांत चाहल
- पदनाम, फ़ैक्ट चेक टीम, सिद्धार्थनगर (यूपी) से
उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर ज़िला अस्पताल में भर्ती 37 वर्षीय रामू सिंह लोधी को गोरखपुर के किसी बड़े अस्पताल में ले जाने की तैयारी की जा रही है.
आँखों के डॉक्टर ने उनकी दाहिनी आँख में लगी चोट को देखते हुए उन्हें गोरखपुर रेफ़र कर दिया है. वहीं ज़िला अस्पताल में हड्डी एवं नस रोग विशेषज्ञ डॉक्टर कृष्ण कुमार यादव ने रामू को बताया है कि उनकी दोनों टांगों में फ़्रैक्चर है.
10 दिन के ट्रीटमेंट के बाद भी रामू की ये शिक़ायत है कि वो अपनी टांगों को उठा नहीं पा रहे हैं.

65 वर्षीय उनके पिता झीनक लोधी उनकी तिमारदारी में लगे हुए हैं. साथ हैं उनके छोटे भाई अनिल जिनकी पीठ पर अभी भी लाठियाँ पड़ने के नीले निशान देखे जा सकते हैं.
ये वही परिवार है जिसका एक वीडियो लोकसभा चुनाव के छठे चरण के मतदान से पहले सोशल मीडिया पर इस दावे के साथ सर्कुलेट किया गया कि 'सिद्धार्थनगर के बीजेपी नेता आशुतोष मिश्र ने एक दलित परिवार को बेरहमी से पीटा और योगी सरकार के दबाव में यूपी पुलिस नेता के ख़िलाफ़ कोई एक्शन नहीं ले रही'.

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ट्विटर और फ़ेसबुक के कई बड़े ग्रुप्स में इसी दावे के साथ यह विभत्स वीडियो सैकड़ों बार शेयर किया गया है और लाखों बार इसे देखा जा चुका है.
बीबीसी की फ़ैक्ट चेक टीम ने ग्राउंड पर (सिद्धार्थनगर) जाकर इस वीडियो की पड़ताल की.
अपनी जाँच में हमने पाया कि मारपीट की यह घटना 9 मई 2019 को हुई थी, लेकिन जिस दावे के साथ इस घटना के वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है वो भ्रामक है.
क्या पीड़ित परिवार दलित है?
ये घटना सिद्धार्थनगर ज़िले में दक्षिण की तरफ स्थित खेसरहा ब्लॉक के टोला टिकुहियाँ की है जो कपियवाँ गाँव की सीमा में आता है.
इस टोले में क़रीब 90 घर हैं जिनमें से 3 घर बढ़ई यानी लकड़ी का काम करने वाले लोगों के हैं और बाकी सभी घर लोधी समुदाय (पिछड़े वर्ग) के लोगों के हैं.
गाँव के लोगों ने बताया कि उनके यहाँ एक भी दलित परिवार नहीं है. गाँव के प्रधान और ब्लॉक स्तर के अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की.

टोला टिकुहियाँ में दाख़िल होते ही हमारी मुलाक़ात कुछ खेलते हुए बच्चों से हुई जो मराठी स्टाइल में हिन्दी बोल रहे थे.
उनके बारे में गाँव के एक बुज़ुर्ग ने बताया कि "पिछली पीढ़ी पास के ही गाँवों में खेतिहर मज़दूरी करके गुज़ारा कर लेती थी. लेकिन अब उतने से घर नहीं चलता. रोज़गार का अभाव है इसलिए बीते डेढ़ दशक से गाँव के बच्चे रोज़गार के लिए केरल और महाराष्ट्र के पुणे-मुंबई जैसे शहरों में जा रहे हैं और उनके बच्चे वहीं पढ़ते हैं."
रामू लोधी और उनके भाई अनिल भी मुंबई की कंस्ट्रक्शन साइट्स में मजदूरी करते हैं और दोनों छुट्टियों पर घर आये हुए थे.
टोला टिकुहियाँ को सरकारी आवासीय योजना के तहत कपियवाँ गाँव की बंजर ज़मीन पर दशकों पहले बसाया गया था, लेकिन अब तक इस गाँव में एक भी पक्का रास्ता नहीं था.
कुछ दिन पहले ही गाँव में खड़ंजा (ईंटों की सड़क) बिछाया गया है जिसे लेकर गाँव में हिंसा हुई और यह पूरा विवाद खड़ा हो गया.

झगड़ा किस बात पर शुरु हुआ?
9 मई की घटना को याद करते हुए रामू लोधी कहते हैं, "हम अपने छोटे भाई विजय की शादी के लिए मुंबई से घर लौटे थे. 12 मई को उसकी शादी थी."
"मारपीट की ये घटना 9 मई सुबह साढे 8 बजे के बाद की है. गाँव में खड़ंजे का काम चल रहा था. हमारे घर के सामने एक झोपड़ी थी जिसका दो फ़ीट हिस्सा रास्ते में आ रहा था."
"घास के छप्पर वाली यह झोपड़ी हमने घर आये मेहमानों के बैठने के लिए बनाई थी. लेकिन ग्राम प्रधान बबलू मिश्र का कहना था कि उसे हम तुरंत हटा लें. इसी बारे में उनसे बात चल रही थी कि क्या हमें शादी से निपटने तक का समय मिल सकता है? तभी कुछ लोगों ने आरी लेकर छप्पर काटना शुरु कर दिया."

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मुंबई में पढ़ने वाले रामू के 17 साल के बेटे विशाल इस पूरी घटना को अपने मोबाइल कैमरे से शूट कर रहे थे.
उनके बनाये वीडियो में दिखाई देता है कि छप्पर को लेकर चल रही बातचीत कुछ ही देर बाद गर्म बहस में बदल जाती है.
रामू के घर की महिलाएं भीड़ को कोसने लगती हैं और तभी ग्राम प्रधान देसी तमंचा निकालकर उसे रामू के छोटे भाई अनिल लोधी के मुँह से भिड़ा देते हैं, उन्हें गालियाँ देते हैं.

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28 वर्षीय अनिल लोधी बताते हैं, "बबलू मिश्र के तमंचा निकालते ही जो गाँव वाले उनके साथ आये थे, उन्होंने हमें मारना शुरू कर दिया. वो मेरे भाई को घर से खींचकर पास के खेतों में ले गए और वहाँ बिजली के खंभे से बांधकर उसकी पिटाई की."
अपने हाथ और चेहरे पर लगी चोट को दिखाते हुए रामू की माँ कहती हैं, "हमने हाथ जोड़कर लोगों से सिर्फ़ तीन दिन का समय ही तो मांगा था."
इसी गाँव में रहने वाले 55 वर्ष के इंद्रजीत सिंह कहते हैं, "रास्ते को लेकर पूरा गाँव एक तरफ़ था और रामू लोधी का परिवार एक तरफ. उन्होंने ग़लत तरीक़े से ज़मीन घेर रखी थी. लेकिन जब उनसे जगह खाली करने को कहा गया तो वो हंगामा करने लगे."

27 वर्षीय राम सूरत सिंह इंद्रजीत सिंह की इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं.
इंद्रजीत सिंह का नाम उन 17 लोगों की लिस्ट में शामिल है जिन्हें स्थानीय पुलिस ने इस हिंसा के मामले को लेकर चेतावनी दी है. वो मानते हैं कि गाँव के लोग रामू और उनके परिजनों को पीटने में शामिल थे.
यूपी पुलिस ने क्या कार्रवाई की?
खेसरहा ब्लॉक के थानाध्यक्ष विजय दुबे इस मामले में जाँच अधिकारी हैं.
वो बताते हैं कि डायल-100 के ज़रिये स्थानीय पुलिस को इस घटना की सूचना मिली थी.
एमएलसी रिपोर्ट के हवाले से विजय दुबे ने बीबीसी को बताया कि रामू के शरीर पर डॉक्टरों को आठ जगह चोट के स्पष्ट निशान मिले थे. लेकिन उनकी आँख में लगी चोट सबसे गंभीर बताई गई थी.

विजय दुबे के अनुसार, पीड़ित परिवार की तहरीर पर इस हिंसा के तीन अभियुक्तों (मोहन लाल, सोनू और दयाराम) को पुलिस ने हिरासत में ले लिया है.
दो अन्य अभियुक्तों (ग्राम प्रधान बबलू मिश्र और सोहन) को स्थानीय पुलिस ने 'वॉन्टेड' की लिस्ट में रखा है.
सभी अभियुक्तों के ख़िलाफ़ बलवा करने, किसी को घेरकर मारने और मारने की धमकी देने जैसी छह धाराओं के तहत मुक़दमा दर्ज किया गया है.
पर क्या पुलिस को बबलू मिश्र की 'तमंचे वाली वीडियो' की जानकारी नहीं है? और टोला टिकुहियाँ से महज़ 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित घोसियारी बाज़ार में रहने वाले बबलू मिश्र को घटना के 11 दिन बाद भी पुलिस हिरासत में क्यों नहीं ले पाई?
स्थानीय पुलिस से इन सवालों का कोई स्पष्ट जवाब हमें नहीं मिला.
'वॉन्टेड' बबलू कहाँ हैं?
अपनी पड़ताल में हमने पाया कि जिस गाँव में बबलू मिश्र रास्ते का काम करवा रहे थे वो उस गाँव के प्रधान ही नहीं हैं.
कपियवाँ और टोला टिकुहियाँ की ग्राम प्रधान संगीता मिश्र हैं जो बबलू मिश्र की भाभी हैं. संगीता मिश्र का नाम टोला टिकुहियाँ में कोई नहीं जानता.
बबलू मिश्र पड़ोस की एक ग्राम सभा के प्रधान हैं और उनके छोटे भाई आशुतोष मिश्र एक अन्य ग्राम सभा के प्रधान हैं.
दोनों भाइयों से घोसियारी बाज़ार स्थित उनके घर पर हमारी मुलाक़ात हुई.

बबलू मिश्र के अनुसार, उनके परिवार ने चार ग्राम सभाओं से प्रधानी का चुनाव लड़ा था जिनमें से तीन जगह उनकी जीत हुई.
टोला टिकुहियाँ की घटना को दोनों भाइयों ने राजनीति से प्रेरित बताया और कहा कि रामू का परिवार ढोंग कर रहा है.
स्थानीय ब्राह्मण महासंघ के अध्यक्ष रहे आशुतोष मिश्र ने यह मानने से ही इनकार किया कि रामू को कोई गंभीर चोट आई है.
उनके भाई बबलू मिश्र ने अपने हाथ की एक ऊंगली पर बंधी पट्टी को दिखाकर कहा कि उन्हें बीचबचाव करने में यह चोट लगी थी और रामू लोधी को जो भी चोटें आई हैं वो छप्पर गिरने की वजह से हैं.
जब हमने बबलू मिश्र से पूछा कि स्थानीय स्तर पर आपकी एक वीडियो वॉट्सऐप पर सर्कुलेट हो रही है जिसमें आप टोला टिकुहियाँ में तमंचा लहराते दिख रहे हैं?
तो बबलू मिश्र ने हल्की सी हंसी के साथ जवाब दिया, "रामू ने डराने के लिए तमंचा निकाला था. लेकिन गाँव वालों ने तमंचा उससे छीन लिया और प्रधान की हैसियत से मेरे हाथ में थमा दिया था. वो तमंचा मेरा नहीं था."

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अभियुक्तों का BJP से क्या संबंध है?
सोशल मीडिया पर रामू लोधी के परिवार की जो वीडियो सर्कुलेट हुई उसके साथ ये दावा किया गया कि उनकी पिटाई 'बीजेपी नेता आशुतोष मिश्र' ने की.
ग्राम प्रधान आशुतोष मिश्र को स्थानीय स्तर पर लोग बीजेपी नेता के तौर पर जानते हैं. टोला टिकुहियाँ में भी सभी लोग यही मानते हैं.
आशुतोष मिश्र ये दावा करते हैं कि ज़िला पंचायत का पिछला चुनाव उन्होंने बीजेपी के समर्थन से लड़ा था. हालांकि ये चुनाव वो हार गये थे.
लेकिन उनके इस दावे की जाँच करने के लिए हमने सिद्धार्थनगर के बीजेपी ज़िलाध्यक्ष लाल जी त्रिपाठी से बात की.
उन्होंने कहा, "पहले बात तो ये कि ज़िला पंचायत के चुनाव में कोई राजनीतिक पार्टी कभी सिंबल जारी नहीं करती और दूसरी बात ये कि आशुतोष मिश्र नाम का कोई शख़्स इस ज़िले में भारतीय जनता पार्टी के किसी ज़िम्मेदार पद पर नहीं है."

वीडियो को किसने ग़लत संदर्भ दिया?
अपनी पड़ताल में हमने पाया कि पीड़ित परिवार दलित समुदाय का नहीं, बल्कि 'पिछड़े वर्ग' से है.
जिन ग्राम प्रधान का नाम इस मामले में लिया जा रहा है, उनका या उनके भाई का भारतीय जनता पार्टी से कोई आधिकारिक संबंध नहीं पाया गया.
सिद्धार्थनगर संसदीय सीट पर छठे चरण में यानी 12 मई को मतदान हुआ था.
स्थानीय लोग बताते हैं कि 9 मई की घटना का यह वीडियो वोटिंग से पहले सोशल मीडिया पर काफ़ी सर्कुलेट हुआ था.
थानाध्यक्ष विजय दुबे का कहना है कि पुलिस इस बात की जाँच कर रही है कि एक स्थानीय घटना को ग़लत तरीके से राजनीतिक रंग देना का प्रयास किसने किया.
और झीनक सिंह लोधी को चिंता है कि उनके बेटे रामू की हालत अगर सामान्य नहीं हुई या वो फिर से मज़दूरी करने लायक नहीं हो पाये तो परिवार का क्या होगा?

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