पुणे दीवार हादसा: दीवार से दबकर मर गए, जिनके अपने घरों में दीवार न थी- ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, नीरज प्रियदर्शी
- पदनाम, कटिहार से, बीबीसी हिंदी के लिए
महाराष्ट्र के पुणे में शुक्रवार को भारी बारिश के कारण दीवार ढह जाने से उसमें दबकर 15 लोगों की मौत हो गई.
उनमें से 11 लोग कटिहार के बलरामपुर प्रखंड के बघार गांव और आसपास के गांवों के हैं.
आपको इस बात पर यक़ीन करने में दिक्कत हो सकती है कि पुणे में दीवार गिरने से जिन लोगों की मौत हुई है, गांव में उनमें से ज़्यादातर के ख़ुद के घरों में दीवार नहीं है.
बलरामपुर के अधिकतर घर टीन या फूस की टाटी से घेरकर बनाए गए हैं.
कारण कि यह इलाका बाढ़ प्रभावित है. लोगों के पास इतने पैसे भी नहीं हैं कि लगभग हर साल आने वाली बाढ़ को सहने लायक पक्के घर बना सकें.
शनिवार को बघार में मातम पसरा था. गांव के दो परिवारों के आठ लोग पुणे में भारी बारिश से ढहने वाली दीवार की चपेट में आ गए. कुछ घायल भी हैं, जिनका इलाज पुणे के ही स्थानीय अस्पताल में चल रहा है.
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कटिहार का बघार गांव
सुबह के क़रीब 10 बजे जिस वक्त हम बघार पहुंचे थे, घटना में मारे गए लोगों के शवों का इंतजार हो रहा था जिनके देर शाम तक घर पहुंचने की उम्मीद थी.
गांव के मुहाने पर स्थित मिडल स्कूल के पास सड़क किनारे दर्जनों लोग जमा थे. कुछ पुलिस वाले भी यहां मौजूद थे.
पूछने पर पता चला कि आने वाले शवों के लिए अर्थियां बनाई जा रही हैं. बांस और लकड़ियां जुटाने का काम चल रहा था.
वहीं से कुछ दूरी पर वे दोनों घर भी थे जिनका पूरा परिवार घटना में तबाह हो चुका था.
पहले भीमा दास का घर मिला. भीमा, उनकी पत्नी और दो बच्चे घटना में अपनी जान गंवा चुके हैं.
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भीमा दास का घर
घर में मातम पसरा था. ओसारे में महिलाएं अपनों को खोने के गम में विलाप कर रही थीं. पिता श्याम लाल सिर पर हाथ रखकर बैठे हुए थे.
भीमा के बारे में पूछने पर कहते हैं, "वो तो पांच-छह सालों से पुणे में रहकर कमा रहा था. जनवरी में बहू, बाल-बच्चा सबको लेकर गया था. सबलोग काली पूजा के समय आने वाले थे लेकिन अब तो ये हादसा हो गया."
श्यामलाल आगे कहते हैं, "आप जानते हैं ना, बड़ा बेटा पिता का कंधा होता है. हमारा तो कंधा ही चला गया."
भीमा के छोटे भाई जीतन दास धनबाद में वही काम (कंस्ट्रक्शन में सेंट्रिंग का) करते हैं जो भीमा पुणे में किया करते थे. कुछ दिनों के लिए उन्होंने भी भाई के पास जाकर काम किया था.
जीतन कहते हैं, "मुझे कल रात सूचना मिली थी. उसी समय वहां से निकल गया था क्योंकि आना ज़रूरी था. मां-बाबूजी के पास कोई तो होना चाहिए था. आज सुबह ही पहुंचा हूं. प्रशासन के लोग आए थे, कह रहे थे कि डेड बॉडी आ रहा है."

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लोगों की भीड़
भीमा के घर से थोड़ा आगे चैतू शर्मा का घर था. लेकिन जाने का कोई रास्ता नहीं. सुबह की बरसात में कच्चे रास्ते कीचड़ से भर गए थे.
गांव में अंदर पक्की नालियां और गलियां कहीं नहीं दिखीं. लग रहा था कि विकास और सुशासन का बघार से कोई बैर हो.
चैतू शर्मा के घर में कोई बचा ही नहीं रह गया है, सिवाय बुजुर्ग रोगी पत्नी के. उनके बेटे, बहू और दो पोते पुणे की घटना में मर गए.
चैतू की पत्नी झरिया देवी जमीन पर निढाल पड़ी थीं, एकदम बेसुध. बगल में मचान पर चैतू रोते हुए ख़ुद से बड़बड़ा रहे थे.
घर पर लोगों की भीड़ तो जमा थी, लेकिन उनसे बात करने वाला कोई नहीं था. मौजूद लोगों ने कहा, "जब से इन्हें घटना की सूचना मिली है, तब से ऐसे ही कर रहे हैं. सेंस लेस हो गए हैं."
हमने चैतू शर्मा से बात करने की कोशिश की. एक बात बोल पाए, फिर रोने लगे, "हमारा तो एक ही बेटा था सर. उससे दो पोते भी हुए थे. लेकिन सब मर गए. हम दोनों को मुखाग्नि देने वाला कोई नहीं रहा."
थोड़ी देर बाद वो खुद कहते हैं, "छह साल पहले मेरा छोटा बेटा भी वहीं पुणे में बिल्डिंग के सेंट्रिंग का काम करते हुए गिरा था और मर गया था."

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मज़दूरी के लिए दूसरे शहरों में...
वहां मौजूद लोगों ने बताया कि क़रीब डेढ़ हज़ार की आबादी वाले गांव में हर घर से एक ना एक आदमी, किसी के घर से दो-तीन आदमी भी इसी तरह पुणे, बेंगलुरु और मुंबई में भवन निर्माण कंपनियों में काम कर रहे हैं.
बघार की अधिकांश आबादी पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों की है. बहुत कम ही घर ऐसे हैं जो घर की तरह लगते हैं. झोपड़ियां अधिक दिख रही थीं.
लोगों से बातचीत करने के दौरान ही चैतू के घर पर बलरामपुर के बीडीओ मुकुल सिन्हा मृतक के परिजनों से मुलाकात करने आ गए. उन्होंने परिजनों से बात की, उनका हाल जाना.
उसके बाद वहां मौजूद अधीनस्थ अधिकारियों को यह निर्देश दिया कि आवास योजना के तहत चैतू शर्मा का नाम जोड़कर जितनी जल्दी हो सके उनके लिए पक्का घर बनवाया जाए. इसके अलावा बुजुर्ग दंपति का नाम वृद्धा पेंशन योजना में भी चेक करने के लिए कहा. थोड़ा समय बिताने के बाद हरसंभव मदद का आश्वासन देकर चले गए.
उनके जाने के बाद बगल से आए लोग आपस में बात करने लगे कि इन्हें तो उज्ज्वला के तहत गैस भी नहीं मिली है और शौचालय तक नहीं है. ऊपर से बहू-बेटे की मौत की ख़बर सुनने के बाद से दोनों की तबीयत भी बिगड़ी हुई है, कब क्या हो जाए नहीं पता.

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सरकारी योजनाओं का लाभ
बघार और आसपास के गांवों में ग़रीबी सड़क के रास्ते चलते हुए ही देखी जा सकती थी. लोगों की जीविका खेतीबाड़ी पर आधारित है, वो भी जिनके पास अपनी ज़मीन है, बस उन्हीं की. बाक़ी के लिए मज़दूरी ही सहारा है.
भीमा दास के भाई जीतन कहते हैं, "यहाँ काम नहीं है हमारे पास. मज़दूरी इतनी कम है कि परिवार चलाना मुश्किल है. यहां रोज़ ज़्यादा से ज़्यादा डेढ़ सौ रुपये मज़दूरी मिलती है. बाहर जाते हैं तो रोज़ का 500 से 600 रुपया मिल जाता है. और नहीं तो क्या हमें शौक़ है बाहर जाने का?"
गांव वालों से अब तक की बातचीत में यह ज़ाहिर हो गया था कि उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ न के बराबर मिला है. क्या सरकार की रोजगार गारंटी योजना से भी उन्हें काम नहीं मिलता?
बलरामपुर के स्थानीय पत्रकार राहुल आनंद कहते हैं, "मनरेगा से कितना काम हुआ है यह तो क्षेत्र घूमने से ही पता चल जाता है. मज़दूरों की इतनी बड़ी फ़ौज ही खड़ी हो गई है कि सबको काम देना सरकार के वश का नहीं रहा. इधर तो मनरेगा वाले काम भी बहुत कम हुए हैं."
बलरामपुर में जिला प्रशासन के अधिकारियों का आना जाना लगा हुआ है. बरसोई के अनुमंडल पदाधिकारी पवन मंडल वहां शनिवार से ही कैंप कर रहे हैंय बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "आज शव पहुंच जाएंगे. ज़िला प्रशासन इसपर लगातार नज़र बनाए हुए है. वहां (महाराष्ट्र) के अधिकारियों के साथ हमलोग संपर्क में हैं."
"यहां पीड़ितों के आश्रितों को हरसंभव मदद दी जाएगी. जितनी सारी सरकारी योजनाएं होंगी, उनमें उन्हें वरीयता मिलेगी. राज्य सरकार द्वारा घोषित मुआवज़े की राशि जल्द से जल्द उपलब्ध कराने के लिए काग़ज़ी काम कर लिए गए हैं. मृतकों के परिजनों को दो लाख रुपये और घायलों को 50 हजार रुपये दिए जाएंगे."

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लाश आ रही है...
बघार से दूसरे गांवों में, जहां के लोग हादसे के शिकार हुए थे, जाने के क्रम में सड़क किनारे विलाप करते कुछ और परिजन मिल गए. ये बघार गांव का ही दूसरा टोला था, मगर बलरामपुर पंचायत में नहीं, महिसाल पंचायत में पड़ता है.
पूछने पर मालूम चला कि वे मृतक रवि शर्मा के परिजन हैं. बघार के इस टोले के दो और लोग अलक शर्मा और मोहन शर्मा हादसे में मारे गए हैं. वहां रवि के नाना उपेंद्र शर्मा शर्मा भी थे. कहने लगे, "हमारा नाती रवि मर गया ये हमको पता है, मगर हमारी घायल बेटी कैसी है, मुझे नहीं पता. क्या आपको पता है? मुझे कोई कुछ नहीं बोल रहा. कल इतना पता चला कि वो अस्पताल में भर्ती है. कुछ बोल नहीं पा रही है."
उपेंद्र शर्मा हताश थे. उनके घर पर भी एकदम वैसा ही माहौल था जैसा श्यामलाल और चैतू शर्मा के घर का था. घर के बाहर महिलाएं समूह में बैठकर रो रही थीं.
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रवि के बार में पूछने पर उपेंद्र कहते हैं, "आठ दिन पहले हम उसके पास से आए थे. वो लोग बगल की दीवार गिरने से दबा है. लाइन से झोपड़ी जैसा बनाकर इधर का सबलोग वहां रहता है. संजय ठेकेदार सबको रखा था उधर. यहां के सारे लोग उसी के पास काम करते हैं."
रवि कब घर आने वाला था? उपेंद्र कहते हैं, "दुर्गा पूजा में आएगा ऐसा कह रहा था. ऐरोप्लेन से आने बोल रहा था. मुझे भी रोक रहा था कि नाना आप भी हवाई जहाज में बैठकर चलिएगा. देखिए आ तो रहा है ऐरोप्लेन से, पर वो नहीं, उसकी लाश आ रही है."
शाम चार बजने वाले थे. अभी तक मृत व्यक्तियों के शव नहीं लाए गए थे. मौजूद पुलिस और प्रशासन के लोगों ने कहा कि देर शाम हो जाएगी. बागडोगरा से यहां लाना कठिन काम है. सड़क की हालत देख ही रहे हैं, जाम भी बहुत मिलेगा.
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