लोकसभा चुनाव 2019: झारखंड में एमजे अकबर का 'आदर्श गांव', जहां कोई नेता नहीं जाता

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, गुमला (झारखंड) से, बीबीसी हिंदी के लिए
अलंकेरा गांव की किसी भी छत पर चुनावी झंडे नहीं लगे हैं. मानो यह भारत से दूर कोई गांव हो जहां आम चुनाव नहीं हो रहे हैं. कुछ छतों पर लाल-पीले रंगों वाले महावीरी झंडे हैं. इन पर हाथों में पहाड़ और कंधे पर गदा लिए हवा में उड़ते हनुमान की तस्वीर है. यह इस बात की मुनादी है कि यहां हाल ही में सार्वजनिक रामनवमी पूजा हुई है.
यह गांव गुमला ज़िले के पालकोट प्रखंड का हिस्सा है. पूर्व विदेश राज्यमंत्री और झारखंड से राज्यसभा के सांसद एमजे अकबर के 'गोद' लिए जाने की वजह से सरकारी फ़ाइलें इसे 'आदर्श ग्राम' कहती हैं.
एमजे अकबर एक बार यहां आए भी थे. तब उन्होंने गांव वालों से कई वादे किए. उनके साथ गांव पहुंचे अधिकारियों ने भी उनकी हां में हां मिलाई. अब यहां वैसा कुछ भी नहीं दिखता, जो इसके 'आदर्श ग्राम' होने की तस्दीक़ कर सके.

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एमजे अकबर के जाने के बाद यहां उनके नाम की कुछ ईंटें, सीमेंट की बोरियां, बालू, दीवारों की पुताई करने वाले पेंट और ग्रेनाइट पत्थर का एक टुकड़ा आया. इससे दो प्राइमरी स्कूलों की घेराबंदी कराई गई है. एक प्याऊ बना है, जिसकी टोटियों से कभी पानी नहीं निकल सका.
पक्के निर्माण के ऊपर पानी की काली टंकी है. नीचे प्लास्टिक के सफ़ेद नल. यहां काले रंग के ग्रेनाइट पत्थर पर सुनहरे रंग से लिखा है- यह निर्माण एमजे अकबर के सांसद मद से कराया गया है. इसके अलावा यहां एमजे अकबर का कोई नामोनिशान भी नहीं है.
इस कारण गांव के लोग उनसे नाराज़ हैं. उनका कहना है कि न केवल एमजे अकबर बल्कि तमाम सांसदों और विधायकों ने उन्हें ठगा है.
इससे खफ़ा ग्रामीणों ने गांव की मुख्य सड़क पर एक बैरिकेडिंग लगा दी थी. इस पर लिखा था-'नेताओं का प्रवेश वर्जित'. प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद अब यह बैरिकेडिंग हटा ली गई है, लेकिन गांव अधिकतर लोग वोट नहीं देने की बात पर अडिग हैं.
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सड़क नहीं तो वोट नहीं
पालकोट से इस गांव की दूरी सिर्फ़ सात किलोमीटर है, लेकिन कार से यहां आने में 45 मिनट लग जाते हैं. बाइक आधे घंटे में पहुंचाती है.
सबसे आसान साइकिल की सवारी है. पालकोट से यहां तक साइकिल से पहुंचने में करीब एक घंटे का वक्त लगता है लेकिन यह ख़तरनाक है. साइकिल और बाइक चलाते हुए कई लोग इस सड़क पर गिरकर अपने हाथ-पैर तुड़वा चुके हैं.
गांव के अलख नारायण सिंह ने बताया कि सड़क की ऐसी हालत पिछले कई सालों से है. इस कारण गांव के लोगों ने बैठक कर निर्णय लिया कि अगर सड़क नहीं बनी तो वो लोग वोट नहीं देंगे.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "अब यह बैरिकेडिंग हटा ली गई है क्योंकि पालकोट के बीडीओ ने हमसे इसे हटाने की अपील की थी. उन्होंने आश्वस्त किया है कि चुनाव के बाद सड़क का टेंडर कराया जाएगा. उन्होंने कहा कि गांव वालों को ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए, जिससे राष्ट्र का अहित हो."
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'यहां कोई नेता नहीं आता'
एमजे अकबर ऐसे अकेले जनप्रतिनिधि हैं जो पिछले 10-12 सालों के दौरान इस गांव में आए. यहां कोई उम्मीदवार वोट मांगने भी नहीं आता.
करीब पांच हज़ार लोगों की आबादी वाला अलंकेरा गांव झारखंड के खूंटी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है. लोकसभा के पूर्व उपाध्यक्ष कड़िया मुंडा यहां से पांच बार सांसद रहे, लेकिन ग्रामीणों की शिकायत है कि वो एक बार भी इस गांव तक नहीं पहुंचे.
भाजपा ने इस बार उनका टिकट काट दिया है. उनकी जगह पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा चुनाव लड़ रहे हैं.
गांव के छत्रपाल सिंह पेशे से शिक्षक हैं. उन्होंने बताया कि सड़क ख़राब होने के कारण यहां कोई भी नेता नहीं आता. उनके लोग आते हैं और वोट मांगकर चले जाते हैं.
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छत्रपाल सिंह ने बताया, "पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों के दौरान यहां कोई भी उम्मीदवार वोट मांगने नहीं आया था. निर्मल कुमार बेसरा ऐसे अंतिम जनप्रतिनिधि हैं, जो विधायक रहते हुए यहां आए थे. इस बात के भी कई साल हो गए. इसके बाद एमजे अकबर यहां आए. यहां के लोग हमेशा से वोट देते आए हैं लेकिन इस बार हम लोगों ने फ़ैसला किया है कि अगर सड़क बनने की गारंटी नहीं मिली तो हमलोग वोट नहीं देंगे."
वो कहते हैं, "मैं जवानी में साइकिलिस्ट था. लेकिन अब हिम्मत नहीं होती. इस सड़क पर कई बार गिरकर चोटिल हो चुका हूं. आप बताइए कि रोड के बिना विकास की बात कैसे कर सकते हैं?"
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'वोट दे दिया तो सड़क नहीं बनेगी'
500 से भी ज़्यादा घरों वाले अलंकेरा गांव में राजपूतों के 40-50 परिवार रहते हैं. बाकी के घर उरांव और मुंडा आदिवासियों के हैं.
राजपूतों का दावा है कि यहां के आदिवासी उनके कहे मुताबिक़ ही वोट देते हैं. ऐसे में उम्मीदवार यहां आने की जहमत नहीं उठाते क्योंकि सिर्फ दो-चार राजपूत परिवारों से बातचीत करने से ही उन्हें पूरे गांव का वोट मिल जाता है. लेकिन इस बार वोट देने को लेकर गांव में अलग-अलग राय है.
राजपूतों के भी कई गुट बन चुके हैं. आदिवासियों ने भी अपनी बात कहनी शुरू कर दी है.
गांव के सिलास बेक मजदूरी करते हैं. वो आदिवासी हैं और मजदूरी से मिले पैसों से ही उनका परिवार चलता है.
वो कहते हैं, "सड़क हमारी मुख्य समस्या है. अगर ये नहीं बनी तो वोट नहीं देंगे. क्योंकि हमें पता है कि वोट मिलने के बाद कोई भी नेता सड़क बनवाने नहीं आएगा."
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पीने के लिए पानी नहीं, लड़कों की शादियां नहीं
गांव के किसान गिरधारी सिंह ने बताया कि अलंकेरा में न तो पीने के पानी की समुचित व्यवस्था है और न सिंचाई का साधन.
इसलिए यहां सिर्फ़ एक मौसम में खेती होती है वो भी बारिश और बगल से बहने वाली पिंजरा नदी के पानी पर निर्भर है. गर्मी के दिनों में यह नदी सूख जाती है.
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इसी गांव के नमन कुमार भारद्वाज ने बीबीसी को बताया कि पीने के पानी के लिए गांव के लो कुंए पर निर्भर हैं. ज़्यादातर हैंडपंप ख़राब पड़े हैं और कुछ कुंओं का पानी भी पीने लायक नहीं है.
रितेश कुमार सिंह 26 साल के हैं लेकिन उनकी शादी नही हुई है.
उन्होंने कहा कि अच्छे घरों के लोग यहां अपनी बेटियां नहीं ब्याहना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि सड़क नहीं होने के कारण यहां बेटी की शादी करना ठीक नहीं है. यही वजह है कि गांव में इस उम्र के दर्जनों लड़के अभी तक कुंवारे हैं.

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एक और आश्वासन...
इस बीच पालकोट के बीडीओ शंकर एक्का ने कहा है कि पालकोट से अलंकेरा होकर नागफेनी जाने वाली 36 किलोमीटर लंबी सड़क के निमार्ण का प्रारूप तैयार कराया जा चुका है लेकिन चुनावी आचार संहिता के मद्देनज़र इसकी घोषणा नहीं की जा सकी है. चुनाव खत्म होते ही इस पर क़ायदे से काम शुरू कर दिया जाएगा.
उन्होंने कहा, "इसलिए मैंने गांव के कुछ लोगों को अपने दफ़्तर बुलाकर उनसे चुनाव का बहिष्कार न करने की अपील की है. उम्मीद है कि लोग मेरी बात मानेंगे."
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