किसे वोट देंगे भारत-पाकिस्तान सीमा पर गोलाबारी झेलते गाँव के लोग -ग्राउंड रिपोर्ट

जम्मू, पूंछ, राजौरी

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    • Author, मोहित कांधारी
    • पदनाम, जम्मू से बीबीसी हिंदी के लिए

भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे रणबीर सिंह पुरा इलाके के चंदूचक गाँव के रहने वाले बहादुर सिंह रात को ठीक से सो नहीं पाते. ऐसा पिछले एक साल से उनके साथ हो रहा है. उन्हें हर समय इस बात का दर सताता रहता है कहीं उनके घर की छत नीचे न गिर जाए.

पिछले साल रमज़ान के महीने में पाकिस्तान की तरफ से की गयी भारी गोलाबारी में उनके गाँव में बड़ा नुकसान हुआ था.

एक ही परिवार के दो सदस्य गोलाबारी में मारे गए थे.

गाँव में जगह जगह गोले गिरे थे. बहादुर सिंह के घर की छत पर भी दो गोले गिरे थे.

पिछले एक साल से उन्होंने अपने घर की छत बड़ी मुश्किल से बचा कर रखी है.

लेकिन अब वो थक गए हैं. सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगा -लगा कर वो परेशान हो चुके हैं लेकिन कहीं पर उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही.

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इमेज कैप्शन, चंदू चक गाँव के रहने वाले बहादुर सिंह

सरकार का वादा

8 जून 2018 को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने जम्मू कश्मीर के अपने दो दिवसीय दौरे के दौरान रणबीर सिंह पूरा का दौरा कर पाकिस्तान की गोलाबारी से जूझ रहे गाँव वालों से मुलाक़ात की थी.

सीमावर्ती क्षेत्र की जनता की परेशानियाँ सुनने के बाद गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उसी दिन यह घोषणा की थी कि पाकिस्तान की गोलाबारी से बचने के लिए सीमावर्ती क्षेत्र में 5 बुलेट प्रूफ बंकर गाड़ियों को जल्दी से जल्दी उपलब्ध करवाया जायेगा. ताकी गोलाबारी के वक्त गांव के निवासियों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके.

लेकिन अब जैसे-जैसे लोकसभा के चुनाव करीब आ रहे हैं अलग अलग सियासी पार्टियों के उम्मीदवार एक बार फिर उनका वोट हासिल करने के लिए उनके दरवाज़े पर दस्तक दे रहे हैं.

लेकिन इंसाफ़ के इंतज़ार में बहादुर सिंह ने अपना मन बना लिया है. उनका कहना है मैं अपना वोट उसी उम्मीदवार को दूंगा जो उनके घर की मरम्मत करवाने में मदद करेगा .

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इमेज कैप्शन, दीवारों पर शेलिंग के निशान

बीजेपी-कांग्रेस के बीच कड़ा मुकाबला?

जम्मू-पूंछ संसदीय सीट से बीजेपी के उम्मीदवार जुगल किशोर शर्मा और कांग्रेस-नेशनल कांफ्रेंस के साझा उम्मीदवार रमण भल्ला के बीच इस बार कड़ा मुकाबला होने की उम्मीद है.

2014 के लोकसभा चुनाव में जुगल किशोर ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी, कांग्रेस पार्टी के मदन लाल शर्मा को 2.57 लाख के बड़े अंतर से हराया था. पीडीपी के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर थे.

इस बार बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस, नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं. 11 अप्रैल के दिन लगभग 20 लाख मतदाता अपने वोट का इस्तेमाल कर अपना सांसद चुनेगे.

मदद की आस में गांव

चंदूचक गाँव में अपने घर के आंगन में बैठे बहादुर सिंह ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "मुझे अभी तक सरकार से कुछ नहीं मिला, न बंकर मिला और न ही कोई मुआवज़ा. बाकी लोगों को सरकार ने राहत राशि दी होगी लेकिन अभी तक मुझे कुछ नहीं मिला" .

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उन्होंने कहा, "मैंने बहुत कोशिश कर के अपना मामला भाजपा के क्षेत्रीय विधायक श्याम लाल चौधरी की जानकारी में लाने का प्रयास किया लेकिन मुझे कोई सफलता हासिल नहीं हुई" .

जम्मू के सीमावर्ती क्षेत्र में पिछले साल बहादुर सिंह जैसे बहुत से गरीब लोग पाकिस्तान की गोलाबारी का शिकार हुए थे.

लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी वो सरकारी अनदेखी का शिकार हो रहे हैं.

बड़ी संख्या में सीमावर्ती क्षेत्रों में गांववासियों की नाराज़गी को देखते हुए उम्मीदवारों ने पहले से ही कमर कस ली है.

कोई भी उम्मीदवार इनकी नाराज़गी नहीं झेल सकता.

इस संसदीय सीट पर सीमा पर बसे गांव के रहने वाले लोगों का रुझान जिस ओर होगा उसी दल का उम्मीदवार जीत हासिल करने में कामयाबी हासिल करेगा. यह सीट जम्मू संभाग के चार जिलों, जम्मू, साम्बा, राजौरी और पूँछ में फैली हुई है.

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इमेज कैप्शन, चंदु चक गाँव की वार्ड नंबर 5 की पंच नरिंदर कौर.

चंदूचक गाँव की वार्ड नंबर 5 की पंच नरिंदर कौर ने बीबीसी हिंदी के कहा, " मैंने जीत हासिल की है, मोदी भी तभी जीतेंगे जब वो मेरे से, सब से वोट मांगने आयेंगे, 'करो हमारा सपोर्ट' हम सपोर्ट तभी करेंगे जब हमारे घर के बारे में कोई सोचेगा" .

नरिंदर कौर खुद काफ़ी लम्बे समय से अपने मकान की मरम्मत करवाने के लिए सरकारी सहायता का इंतज़ार कर रही हैं लेकिन पंच का चुनाव जीतने पर भी उन्हें खुद इंसाफ़ का इंतज़ार है .

वहीं अरनिया के रहने वाले सुमित ने बीबीसी हिंदी से ज़मीनी सचाई का ज़िक्र करते हुए कहा, "केंद्र सरकार अपना रिपोर्ट कार्ड तो पेश कर रही है, कि हमने इतने बंकर बना दिए , इतना मुआवाज़ा दे दिया, लेकिन ज़मीन पर हालात कुछ और हैं, बंकर की हालत बहुत खराब है, उसकी डिजाइन ठीक नहीं है. बारिश का पानी एक बार भर जाता है तो निकालने में बड़ी परेशानी आती है. मुआवज़ा सिर्फ 5200 रुपये मिल रहा है जबकि लोगों का लाखों का नुकसान हुआ है .

सुमित ने बताया कि सीमावर्ती क्षेत्रों में जनता की सरकार से जो अपेक्षा है उस पर वो खरी नहीं उतर रही है. लेकिन इस सब के चलते भी उनके पास कोई विकल्प नहीं है .

उनका कहते हैं, ''कांग्रेस पार्टी का पाकिस्तान प्रेम उभर कर सामने आता है. वो कभी हमारे हित की बात ही नहीं करते हैं.''

इसके बाद हमारी मुलाकात स्थानीय विधार्थी साहिल से पास के ही गांव अब्दुल्लियन में हुई तो उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, " हमारी सरकार पूरी तरह से फ़ेल हो चुकी है. इस इलाके में कुछ गाँव ऐसे हैं जहाँ 400 से ज़्यादा की आबादी है और सिर्फ एक बंकर बना है. लोगों में बड़ा रोष है, वो ख़ुद अपना बंकर बनाने को मजबूर हैं.

सरकार के दावों की पोल खोलते हुए साहिल ने बीबीसी हिंदी से बताया उनके इलाके में अभी तक एक भी बुलेट प्रूफ एम्बुलेंस नहीं मिली है. साहिल का मानना है कि एक महत्वपूर्ण घोषणा के बाद भी ज़मीन पर अभी तक एक भी एम्बुलेंस नहीं पहुंची है.

दूध का व्यापार करने वाले मुहम्मद मुश्ताक ने बीबीसी हिंदी से कहा, "हमारे पास ऐसा कोई ऑप्शन नहीं है कि वोट किसे दें, मोदी ने तो कोई सुविधा हमे नहीं दी है, हमें अपनी फ़सल का रेट नहीं मिलता, दूध का रेट देखा जाए तो वो पानी के बराबर है."

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इमेज कैप्शन, बंकर से बाहर निकलता एक स्थानीय युवक

अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सटे जेओरा फार्म की हालत बाकी गाँव से कुछ बेहतर है. पिछले साल पाकिस्तान की तरफ से की गयी मोर्टार शेलिंग में जेओरा फ़ार्म में बड़ी संख्या में गुज्जर परिवारों के घर जल गए थे और पशुओं को भी बहुत नुकसान हुआ था. गांव वालों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सरकार ने युद्ध स्तर पर काम किया और साल के अन्दर अन्दर 56 नए घर बना कर पीड़ित परिवारों को दिए थे. इस के अलावा मोर्टार शेलिंग से बचने के लिए सरकार ने जेओरा फार्म में 38 बंकर और तीन कम्युनिटी बंकर बना दिया है.

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इमेज कैप्शन, जेओरा फार्म के रहने वाले सत्तार दीन

जेओरा फार्म के पंच लियाक़त अली ने बीबीसी हिंदी से कहा, "सरकार ने हमारी बड़ी मदद की है. हमे नए घर बना कर दिए और पशुओं के नुकसान की पूरी भरपाई कर दी है. हमारे गाँव में फायरिंग से बचने के लिए बंकर बना दिए हैं."

लेकिन सत्तार दीन कहते हैं, "अभी मेरे घर में बंकर बनना बाकि है लेकिन कम से कम इस बात का भरोसा है कि हमारे गाँव में इंसानी जान को बचाने के लिए सरकार ने बंकर बना दिए हैं."

अब देखना यह है कि 11 अप्रैल के दिन बॉर्डर के रहने वाले लोग बड़ी संख्या में मतदान कर सरकार को दूसरा मौका देने के लिए तैयार हैं या उसे उनकी अनदेखी की सजा देंगे.

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