रफ़ाल दस्तावेज़ों और मीडिया की भूमिका पर क्या कहते हैं एन. राम

'द हिंदू' मीडिया समूह के चेयरमैन एन. राम

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    • Author, मुरलीथरन काशी विश्वनाथ
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, तमिल सेवा

'द हिंदू' मीडिया समूह के चेयरमैन एन. राम आजकल सुर्खियों में बने हुए हैं. रफ़ाल सौदे को लेकर हाल के दिनों में 'द हिंदू' में उनके कई लेख छपे थे, जिसे लेकर वो एकाएक सुर्खियों में आ गए.

एन.राम ने रफ़ाल सौदे के बारे में खोजी लेखों की एक सिरीज़ लिखी है. इनमें से एक लेख में यह दावा किया गया है कि फ्रांस की दासौ एविएशन कंपनी से रफ़ाल लड़ाकू जेट ख़रीदने के लिए जो सौदा हुआ वो 2007 की क़ीमत से चालीस फ़ीसदी अधिक क़ीमत पर हुआ था और यह साल 2012 की तय क़ीमत से 14 फ़ीसदी अधिक है.

उनके एक लेख से पता चलता है कि जिस समय भारतीय रक्षा मंत्रालय दासौ से रफ़ाल को लेकर बातचीत कर रहा था ठीक उसी समय प्रधानमंत्री कार्यालय भी उनसे संपर्क में था. जिसकी वजह से भारत का पक्ष कमज़ोर पड़ गया.

इस सिरीज़ में लिखे एक अन्य लेख में आरोप लगाया गया था कि सौदे में भारत सरकार ने "प्रधानमंत्री के दफ्तर से बैंक गारंटी माफ करने के लिए ज़ोर पड़ने पर खाता निलंबन संबंधी सुझावों को दरकिनार कर" भ्रष्टाचार रोधी क़ानून से भी छूट दे दी गई थी.

जो दस्तावेज़ सामने आए हैं उनसे स्पष्ट होता है कि रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने इस संबंध में आपत्ति दर्ज़ कराई थी. साथ ही सौदे को लेकर उनके असंतोष को भी जताया था. सौदे से जुड़े ये दस्तावेज़ भी अख़बार 'द हिंदू' में प्रकाशित किए गए हैं.

एन. राम पर आरोप

इसके बाद इसी सप्ताह बुधवार को भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि 'द हिन्दू' के ख़िलाफ़ गोपनीयता के क़ानून के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है क्योंकि रफ़ाल सौदे से जुड़े दस्तावेज़ रक्षा मंत्रालय से चोरी हो गए हैं और इसी के आधार पर 'द हिन्दू' ने अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की है.

इसके अलावा उन्होंने ये भी कहा कि सरकार आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत आपराधिक कार्रवाई करने पर विचार कर रही है.

उन्होंने कहा कि उन दस्तावेजों के प्रकाशन ने राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरे में डाल दिया है और इस वजह से मित्र देशों के साथ संबंध भी प्रभावित हुए हैं.

एन. राम का कहना है कि रफ़ाल सौदे से जुड़े दस्तावेज़ों के ग़ायब होने में उनका कोई हाथ नहीं है. दो टूक शब्दों में वो कहते हैं "मैंने रक्षा मंत्रालय से सौदे से संबंधित दस्तावेज़ नहीं चुराए हैं."

बाद में शुक्रवार को अटॉर्नी जनरल ने दावा किया कि जो दस्तावेज़ प्रकाशित किये गए वो चुराए हुए नहीं थे. उन्होंने कहा कि उनके कहने का आशय सिर्फ़ इतना ही था कि इन खुफ़िया दस्तावेज़ की प्रतिकॉपी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है.

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हालांकि शुक्रवार को रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि रफ़ाल सौदे से जुड़ी फ़ाइलें रक्षा मंत्रालय से चोरी नहीं हुई हैं.

उन्होंने ट्वीट किया "अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने समाचार एजेंसी पीटीआई को बताया है कि रफ़ाल सौदे से जुड़े दस्तावेज़ चोरी नहीं हुए हैं. उन्होंने जो कुछ कोर्ट में कहा उसका मतलब था कि पिटीशनर ने अपनी अर्ज़ी में असल दस्तावेज़ की फ़ोटोकॉपी इस्तेमाल की थी जिन्हें सरकार ख़ुफ़िया दस्तावेज़ मानती है."

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बीबीसी तमिल सेवा के मुरलीथरन काशी विश्वनाथ ने 'द हिंदू' मीडिया समूह के चेयरमैन एन. राम से बातचीत की. पढ़ें उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश.

सवाल: अटॉर्नी जनरल का बयान था कि रफ़ाल सौदे से जुड़े दस्तावेज़ चोरी हो गए.

जवाब: हमने कोई भी दस्तावेज़ नहीं चुराया है. और ना ही हमने उसे पैसे देकर हासिल किया है. लेकिन अमरीका, ब्रिटेन में कुछ मीडिया संस्थान ऐसे गुप्त दस्तावेज़ों के लिए पैसे ख़र्च करते हैं. ख़ुफिया स्त्रोतों के माध्यम से हमें ये दस्तावेज़ वहीं से मिले.

हम इस तरह के दस्तावेज़ पहले भी प्रकाशित कर चुके हैं. बोफ़ोर्स घोटाले के दौरान भी.

साल 1981 में भारत ने एक्सटेंडेड फंडिंग फेसेलिटी के तहत 6.5 बिलियन डॉलर प्राप्त करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. लेकिन फंड पाने के लिए श्रम कानूनों में संशोधन सहित कई शर्तें थीं.

हमें इससे जुड़े 64 पन्नों के दस्तावेज़ मिले थे और हमने वो सब कुछ प्रकाशित किया. उन ख़ुलासों में भारत सरकार के कई राज़ भी शामिल थे. लेकिन उस समय किसी ने भी उन्हें 'चोरी के दस्तावेज़' नहीं कहा था.

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी कोयला घोटाले से जुड़े कुछ दस्तावेज़ जारी किये थे. उन्हें भी चोरी का नहीं बताया गया. ऐसे बहुत से अंतरराष्ठ्रीय कानून हैं जो इस तरह दस्तावेज़ों को जारी किये जाने का समर्थन करते हैं.

1970 के दशक में पेंटागन पेपर्स, वाटरगेट घोटाला, विकीलीक्स के सामने आने के बाद मीडिया को उनके पक्ष में निर्णय मिला.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 (1) ए के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के कुछ अपवाद हैं. लेकिन आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम उस प्रावधान को ख़त्म नहीं कर सकता है. सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8 (1) और (2) भी आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है.

अब एक सवाल करता हूं - साल 1923 में ब्रिटिश सरकार द्वारा अपने स्वयं के हित की रक्षा के लिए अधिनियम क्यों बनाया गया?

यह अधिनियम आज़ादी के आंदोलन के दौरान तत्कालीक ब्रिटिश सरकार के भ्रष्टाचारों को छिपाने के लिए लाया गया था. यह अधिनियम बहुत व्यापक है. इसके दायरे में कुछ भी लाया जा सकता है. लेकिन इसका इस्तेमाल शायद ही कभी होता था. यदि इसका व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, तो खोजी पत्रकारिता तो हो ही नहीं पाएगी.

और द हिंदू इसका सामना करने के लिए तैयार है.

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'द हिंदू' मीडिया समूह के चेयरमैन एन. राम

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सवाल: खोजी पत्रकारिता के दौरान मीडियाकर्मियों को खुद को कैसे रखना चाहिए?

जवाब: जब तक कोई जनहित न हो उस शख़्स को अपने निजी जीवन को सार्वजनिक करने से बचना चाहिए. हमने विकीलीक्स के दस्तावेज़ जारी करते हुए संयम बरता था.

हमने अफ़गानिस्तान में कुछ ननों के निजी जीवन का ख़ुलासा करने वाले दस्तावेजों को जारी नहीं किया क्योंकि वो ज़रूरी नहीं था.

लेकिन रफ़ाल दस्तावेजों में कुछ भी निजी नहीं है. इसमें केवल सौदे का विवरण शामिल है.

सवाल: क्या आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम के तहत ऐसी सूचनाओं का खुलासा करने वाले मीडिया संस्थान के खिलाफ़ कोई कार्रवाई की जा सकती है?

जवाब: एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया के एक बयान में इस बात उल्लेख किया गया है कि अटॉर्नी जनरल ने आश्वासन दिया था कि कानून का इस्तेमाल मीडिया और वकीलों के खिलाफ नहीं किया जाएगा.

यह बयान टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के लिए था. लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि उन्होंने ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया होगा.

अगर वो हमारे खिलाफ़ कोई कार्रवाई करते हैं, तो हम इसका मुक़ाबला करेंगे. लेकिन अगर ऐसा हुआ तो ये एक बड़ा मुद्दा बन जाएगा. इसलिए वे बहुत सक्रियता शायद न दिखाएं.

राफ़ेल लड़ाकू विमान

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सवाल: ऐसा लगता है कि ये मुद्दे पुलवामा हमले के चलते थोड़े ठंडे पड़ गए?

जवाब: हिंदी भाषी राज्यों में पुलवामा एक बहुत बड़ा मुद्दा बना. आप ये सही कह रहे हैं कि बीते कुछ दिनों में रफ़ाल को लेकर उस तरीके से चर्चा नहीं हुई.

सवाल: क्या आपने हमले के समाचार के कारण दस्तावेजों को जारी करने में देरी की?

जवाब: नहीं. हमें जैसे ही दस्तावेज़ मिले हमने उन्हें जारी कर दिया.

हमने जो भी वक़्त लिया वो सिर्फ़ उन दस्तावेज़ों की विश्वसनीयता जांचने के लिया.

सवाल : क्या आपको लगता है कि रफ़ालमामला आने वाले आम चुनावों को प्रभावित करेगा?

जवाब: बिल्कुल, यह असर डालेगा. राहुल गांधी और संभव है कि दूसरे विपक्षी दल इस संबंध में बात करें.

लेकिन चुनाव में मुख्य रूप से जीवन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाती है. इसके बाद किसानों के मुद्दों को महत्व मिलता है. रफ़ाल जैसे मुद्दे इसके बाद ही प्रभाव डालते हैं.

बहुत से लोग ये बोल चुके हैं कि राजीव गांधी की हार बोफ़ोर्स घोटाले की वजह से हुई. लेकिन इसके अलावा दूसरे कई मुद्दे भी थे.

ठीक इसी तरह यूपीए दूसरे कार्यकाल के बाद सिर्फ़ टू-जी स्कैम की वजह से नहीं हारी. बहुत से मुद्दे थे.

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बोफोर्स तोप

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सवाल: रफ़ालमामला, बोफ़ोर्स मामले से अलग कैसे है?

जवाब: दोनों मामलों में अंतर तो है. सरकार के पक्ष में कई तरह के कैंपेन चल रह हैं. ख़ास तौर पर टीवी पर. लेकिन बावजूद इसके रफ़ाल का मुद्दा लोगों तक पहुंचा. इसमें सबसे बड़ा योगदान सोशल मीडिया का है.

जिस वक़्त बोफ़ोर्स घोटाला सामने आया था, उस समय मीडिया में होड़ लग गई थी कि कौन कितनी जल्दी और कितनी जानकारियों के साथ इस घोटाले को उजागर करेगा.

'इंडियन एक्सप्रेस' के एडिटर उस समय अरुण शौरी थे और वो ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धी थे. राम जेठमलानी 'इंडियन एक्सप्रेस' के माध्यम से हर रोज़ राजीव गांधी से 10 सवाल पूछते थे.

'इंडिया टुडे' और 'द स्टेट्समैन' भी इन मुद्दों पर बेहद गंभीर थे.

आज के वक्त में कैरावैन पत्रिका और वायर या स्क्रॉल जैसे कुछ ऑनलाइन समाचार पोर्टल ही अधिक जानकारी छापते हैं.

बोफोर्स घोटाले की तुलना में देखें तो रफ़ाल घोटाले के बारे में पढ़ने वाले कहीं अधिक हैं.

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सवाल: क्या आज के दौर में सच्चाई को सामने लाने के लिए मीडिया संस्थानों के बीच भी होड़ है?

जवाब: उस दौर में कोई डरता नहीं था. जब हमले बोफोर्स घोटाले के बारे में खुलासे किए तो दूसरे मीडिया संस्थानों को भी उसे छापने के लिए बाध्य होना पड़ा.

लेकिन आज का वक्त अलग है. एनडीटीवी जैसा मीडिया संस्थानों के दफ्तरो पर आयकर विभाग का छापा पड़ा है.

अब मीडिया बदल गई है. उसमें होने वाला फायदा कम हुआ है. और अगर सरकारी विज्ञापनों को ना छापा जाए तो फायदा और भी कम हो जाएगा.

'द हिंदू' समेत सभी मीडिया संस्थानों पर काफी दवाब है. पहले प्रिंट मीडिया से 70-80 फीसदी तक लाभ आता था, लेकिन वक्त के साथ डिजिटल मीडिया ने काफी कुछ बदल दिया है.

डिजिटल मीडिया में समाचार पढ़ने के लिए एक न्यूनतम राशि लगाई जानी चाहिए. लेकिन किसी भी मीडिया में इतनी हिम्मात नहीं कि वो ऐसा कर सकें.

जल्द ही अख़बारों का सर्कुलेशन भी कम हो जाएगा और टेलीविज़न मीडिया को ऐसा लगता है कि राष्ट्रवाद की जीत होगी.

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