कश्मीर में सेना का साथ देने वाले लड़ाकों का क्या हुआ

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से बीबीसी हिन्दी के लिए
ये 20 दिसंबर 1994 की बात है, जब कश्मीर की सर्दियों में गुलाम नबी लोन उर्फ़ शफात ने भारतीय सेना और भारत प्रशासित कश्मीर में अनंतनाग ज़िले के पुलिस अधिकारियों के सामने आत्मसमर्पण किया था.
कभी चरमपंथी रहे गुलाम नबी लोन आत्मसमर्पण के साथ ही इख्वानी का काम करने लगे थे. इख्वान यानी सेना की तरफ से लड़ाई का मोर्चा संभालने वाले.
1989 में 14 साल की उम्र में लोन हथियारों की ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान पहुंच गए थे. कश्मीर वापसी हुई दो साल बाद.
कुछ समय के लिए लोन ने चरमपंथी गतिविधियों में हिस्सा लिया और 1994 की शुरुआत में वो ये सारे काम छोड़कर घर बैठ गए.
साल 2003 में जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने इख्वानी पर रोक लगा दी. इसके बाद से लोन ज़िंदगी बसर और समाज में स्वीकार किए जाने को लेकर संघर्ष कर रहे हैं.
इख्वान एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें चरमपंथी लड़ाकों को मुख्य धारा में लाया जाता है. चरमपंथी संगठनों के लिए काम कर रहे ये लड़ाके आत्मसमर्पण के बाद भारतीय सेना के साथ काम करने लगते हैं. इस प्रक्रिया पर रोक लगने से पहले कई लड़ाके चरमपंथ छोड़ इख्वानी बने थे.

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ना नौकरी मिली ना सम्मान
मैं अनंतनाग के गुड़ी स्थित लोन के एक मंजिला घर में गया. जब मैंने उनसे एक चरमपंथी और इख्वानी के तौर पर उनकी पिछली ज़िंदगी के बारे में पूछा तो उन्होंने तुरंत ही मेरे सामने उन्हें इख्वानी साबित करने वाले कई दस्तावेज रख दिए.
लोन कहते हैं, ''मैंने और कुछ सहयोगियों ने 1996 विधानसभा चुनावों के शांतिपूर्ण संचालन के लिए काम किया था और इसके बदले सरकार ने हमें छोड़ दिया. मैंने जम्मू-कश्मीर पुलिस में एसपीओ (स्पेशल पुलिस ऑफिसर) के तौर पर काम किया था. तब एक एसपीओ होने के नाते मुझे कुछ समय के लिए दो हजार रुपए महीना वेतन भी मिला, जो मेरे परिवार को चलाने के लिए काफ़ी नहीं था.''
वो कहते हैं, ''इस दौरान 2004 में भारतीय सेना ने टेरिटोरियल आर्मी की यूनिट बनाई और मुझे उसमें नौकरी दी. लेकिन मैं पारिवारिक हालात और ख़राब सेहत के चलते काम नहीं कर पाया. जब से मैं घर वापस आया, तब से बस अपनी ज़रूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगा हूं और ज़िंदगी के बेहतर होने का इंतजार कर रहा हूं. लेकिन, हमारे जैसे लोगों के लिए कुछ नहीं किया गया. हम अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं.''
1989 में हज़ारों कश्मीरी युवा हथियारों के प्रशिक्षण के लिए सीमा पार करके पाकिस्तान चले गए थे और कश्मीर में भारतीय प्रशासन के ख़िलाफ़ व्रिदोह कर दिया था.

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इख्वानी से कैसे जुड़े
लोन एक बार चरमपंथ का रास्ता अपनाने के बाद अपने इख्वान बनने का कारण बताते हैं.
वो कहते हैं, ''जब मैं प्रशिक्षण के लिए पाकिस्तान गया था तो मुझे बिल्कुल भी इल्म नहीं था कि क्या करना है और मैंने सीमा क्यों पार की है. मुझे नहीं पता था कि पाकिस्तान जाने और हथियार उठाने के पीछे क्या मकसद था. 1991 तक पाकिस्तान में दो साल बिताने के बाद मैं भारत के ख़िलाफ़ लड़ने वाला एक चरमपंथी था. लेकिन जब 1994 में मैंने किसी भी चरमपंथी गतिविधि में हिस्सा ना लेने का फैसला किया तो कुछ चरमपंथी मेरे घर पर आए और मुझे जान से मारने की धमकी दी.''
''फायरिंग की घटना के बाद मैंने अन्य चरमपंथियों के साथ 20 दिसंबर 1994 को पुलिस और सेना के शीर्ष अधिकारियों के सामने खानाबल सेना मुख्यालय में आत्मसमर्पण कर दिया था. इसके बाद हम सरकारी बंदूकधारी बन गए. भारत सरकार ने हमें शरण दी और ट्रेनिंग दी. 1994 से 2003 तक लगातार हमने भारत के लिए काम किया.''

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इख्वानी का अतीत लोन को अब भी डराता है जबकि वो अब एक सामान्य ज़िंदगी जी रहे हैं.
लोन कहते हैं कि अपने अतीत को वो भारी कीमत अदा कर रहे हैं.
लोन बताते हैं, ''हमारे पड़ोसी भी हमें भारतीय एजेंट, सरकारी बंदूकधारी कहकर बुलाते हैं और हमारे साथ दुर्व्यवहार करते हैं. इख्वान के ठप्पे के साथ जीना आसान नहीं है. जब हम कहीं और काम करने जाते हैं तो लोग हमें नौकरी नहीं देते. वो कहते हैं कि हम इख्वान हैं. वो सोचते हैं कि अगर वो हम लोगों को काम पर रख लेंगे तो चरमपंथी उन्हें मार देंगे. हमारे घरों में ये डर हमेशा बना रहता है. हमने चरमपंथियों को छोड़कर हर किसी से हमें माफ करने की विनती की. उनसे कहा कि अब वो समय जा चुका है. हम भी इंसान हैं. लेकिन, लोग नहीं सुनते हैं. जब पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल बिक्रम सिंह ब्रिगेडियर थे तो मैंने उनके साथ चार साल काम किया था. मैंने उनसे कई बार पुनर्वास के लिए अुनरोध किया लेकिन सब बेकार चला गया.''
लोन की एक पत्नी और तीन बच्चे हैं. उनका गावं गुड़ी, इख्वानी गतिविधियों का गढ़ है और यहां एक इख्वान शिविर भी है.
उन्होंने कश्मीर के कई इलाकों में दर्जनों चरमपंथ विरोधी अभियानों में हिस्सा लिया है.

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पुनर्वास का इंतज़ार
1994-1995 में कश्मीर में भारत सरकार के ख़िलाफ़ लड़ रहे हजारों चरमपंथी आत्मसमर्पण करके इख्वानी से जुड़े थे.
चरमपंथियों ने कश्मीर में कई इख्वान को मार दिया था.
इख्वानी पूरे कश्मीर में फैल गया. बांदीपोरा और अनंतनाग जिले में सबसे ज़्यादा संख्या में इख्वान थे.
इख्वान के पूर्व कमांडर लियाकत अली ख़ान अनंतनाग के उच्च सुरक्षित क्षेत्र खन्नाबल में रहते हैं. वह कहते हैं कि अभी तक सिर्फ 25 प्रतिशत इख्वानों का ही पुनर्वास किया गया है.
लियाकत अली बताते हैं, ''जब इख्वानी की स्थापना हुई थी और उसने भारतीय सेना के साथ काम करना शुरू किया था और उसे मज़बूती दी थी तब ये विचार था कि जब कश्मीर में हालात सामान्य हो जाएंगे, राजनीति प्रक्रिया शुरू हो जाएगी और लोकतंत्र बहाल हो जाएगा तब इख्वानी के लिए काम करने वाले सभी लोगों का पुनर्वास किया जाएगा. पुनर्वास की अलग-अलग श्रेणियां हैं. इस तरह के वादे किए गए थे.''
वो कहते हैं, ''2004 में, भारत सरकार ने अपने वादे को पूरा किया और एक टेरिटोरियल आर्मी यूनिट बनाई. इस यूनिट में सभी लड़कों को नौकरी की पेशकश की गई. कुछ ने इसे ज्वाइन किया और कुछ ने नहीं. उस वक़्त हमारे कुछ लड़कों के लिए हालात अनुकूल नहीं थे. उन्होंने सोचा कि अगर वो इस यूनिट से जुड़ जाते हैं तो पता नहीं कश्मीर के बाहर उनकी कहां पोस्टिंग की जाएगी. मैं कहूंगा कि केवल 25 प्रतिशत लड़के ही उस यूनिट में नौकरी करने के लिए तैयार थे. बचे हुए हमारे लड़के दयनीय ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं. कुछ लड़के सब्जी बेच रहे हैं, कुछ गाड़ियां चला रहे हैं और कुछ ख़ाली बैठे हैं.''
लियाकत खुद 1990 में सीमा पार करके हथियारों का प्रशिक्षण लेने गए थे.
साल 2008 में उन्होंने विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन जीत नहीं सके.
दक्षिणी कश्मीर के अनंतनाग शहर में तीन इख्वान शिविर लगाए गए थे, जिसमें आत्मसमर्पण कर चुके 300 इख्वान रहते थे.
लियाकत कहते हैं कि हमारे कारण ही भारत सरकार जम्मू और कश्मीर में 1996 के चुनाव कराने में सफल हो सकी थी.
वो कहते हैं, ''हमारे बिना भारत सरकार के लिए जम्मू-कश्मीर में लोकतंत्र बहाल करना संभव नहीं था. भारत सरकार को हमारे उन लड़कों का ख्याल रखना चाहिए जिन्होंने भारत के लिए अपनी जान दांव पर लगाई और चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़े. अगर ऐसा नहीं होगा तो कश्मीर में ये संदेश जाएगा कि जिन लोगों ने अपने सीने पर गोलियां खाईं उन्हें बुरी हालात में छोड़ दिया गया. और यह एक अच्छा संकेत नहीं है.''

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अशाके चक्र पाने वाले नज़ीर अहमद वानी
इख्वानों के त्याग की बात करते हुए लियाकत ख़ान गर्व के साथ नज़ीर अहमद वानी की सेना में भूमिका के बारे में बताते हैं.
नज़ीर अहमद वानी भारतीय सेना में थे और कश्मीर में चरमपंथ से लड़ने वाले पूर्व इख्वान थे. हाल ही में 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर उन्हें भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च शांति-वीरता पुरस्कार अशोक चक्र प्रदान किया गया था.
वानी की पिछले साल नवंबर में शोपियां में चरमपंथियों से मुठभेड़ के दौरान मौत हो गई थी. वानी ने सेना और इख्वानी में रहते हुए दर्जनों मुठभेड़ों में हिस्सा लिया था.
लियाकत कहते हैं, ''मैं नज़ीर वानी को जानता था. वो हमारे साथ काम करता था. हमें बहुत गर्व हुआ जब पता चला कि उन्हें अशोक चक्र दिया जा रहा है. वह एक गौरवपूर्ण पल था कि उनके काम और त्याग को पहचान दी जा रही थी. हम चाहते हैं कि हमारे जिन लड़कों ने कश्मीर में चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी है उन्हें भी पहचान दी जानी चाहिए.''

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ख़ान ये मानने के लिए तैयार नहीं होते कि इख्वान की लड़ाई कश्मीर में पूरे चरमपंथ से है.
वो कहते हैं, ''हम चरमपंथी संगठन हिज़्ब (हिज़्बुल मुजाहिदीन) से लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थे. इसीलिए हमने सेना से समर्थन मांगा और लड़ाई शुरू की.''
वो कहते हैं, ''कश्मीर में ये धारणा आम है कि इख्वान को बनाया था. लेकिन, इख्वान को बनाया नहीं गया था. उस वक्त के हालात कुछ इस तरह थे. हिज़्बुल मुजाहिदीन ने आजादी समर्थक चरमपंथी समूहों को भी मारना शुरू कर दिया था. हमने इसका विरोध किया लेकिन बिना भारतीय सेना की मदद से ऐसा कर पाना संभव नहीं था. हम कश्मीर में शांति बहाल करना चाहते थे.''
हालांकि, ख़ान मानते हैं कि इख्वानी के तौर पर काम करने के दौरान और उसे छोड़ने के बाद उनके आदमियों को सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा.
वो कहते हैं, ''यह सच है कि इख्वानी से अलग होने के बाद हमारे लड़कों को घर और अपने समाज में वापस जाना पड़ा. लोग हमसे मिलने से कतराने लगे. रिश्तेदारों ने भी हमसे दूरी बना ली. यहां तक कि हमारे एक इख्वान लड़के को मस्जिद में नमाज़ तक नहीं पढ़ने दी गई.''

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इख्वानियों पर गंभीर आरोप
कश्मीर के लोग इख्वानी पर मानवाधिकार उल्लंघन का आरोप लगाते हैं.
श्रीनगर में वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता परवेज़ इमरोज़ इख्वान को सेना, राजनेताओं और छुपे हुए अन्य लोगों द्वारा इस्तेमाल किया गया सबसे खतरनाक और कुख्यात बल कहते हैं.
परवेज़ कहते हैं, ''इख़्वानी का गठन कश्मीर से चरमपंथियों के खात्मे के लिए हुआ था. लेकिन, चरमपंथियों के अलावा उन्होंने निर्दोष लोगों की भी जान ली. राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मारा और जबरन वूसली तक की.''
इख्वानी के संस्थापक मोहम्मद युसूफ पारे उर्फ़ कुका पारे की साल 2003 में बांदीपोरा जिले में एक चरमपंथी हमले में हत्या कर दी गई थी.
कई इख्वान को हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था.

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'इख्वान का राजनीतिक इस्तेमाल'
पूर्व गृह राज्य मंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के शीर्ष नेता अली मोहम्मद सागर इख्वान के दौरान राज्य मंत्री थे. वह कहते हैं कि इन लोगों का कुछ राजनीतिक दलों ने इस्तेमाल किया और उसके बाद फेंक दिया.
वह कहते हें कि मैं हमेशा उनकी अवैध गतिविधियों के ख़िलाफ़ था. वह मगम में कासिम इख्वानी के बारे में बताते हैं कि उन्होंने शिकायत मिलने पर कासिम की गिरफ़्तार का आदेश दिया था.
जब उनसे ये पूछा गया कि उस वक्त वो मंत्री थे और इख्वान में शामिल कुछ लोग सरकार पर उन्हें उपेक्षित करने का आरोप लगाते हैं, तो उन्होंने कहा, ''उन्हें दिल्ली से पूछना चाहिए कि उनसे किस तरह के वादे किए गए थे.''
जम्मू-कश्मीर की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और नेशनल कांफ्रेंस एक-दूसरे पर कश्मीर में इख्वान बल बनाने का आरोप लगाते रहे हैं.
2003 में, पीडीपी और कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार ने जम्मू-कश्मीर में इख्वानी को ख़त्म कर दिया था.
पूर्व पुलिस डीजीपी और लेखक अली मोहम्मद वटाली ने बीबीसी को बताया कि इख्वान बल की कश्मीर में चरमपंथ-विरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका थी.
वटाली कहते हैं, ''वह कुछ प्रशिक्षित आतंकवादियों का एक समूह था जिन्होंने चरमपंथ विरोधी अभियानों में भाग लिया था. कुछ ऐसे राजनेता भी उनके निशाने पर थे जिनका उन्हें चरमपंथियों से संबंध लगता था. उस दौरान उन्होंने कश्मीर से चरमपंथ का सफाया कर दिया था. मुझे जानकारी नहीं है कि सभी का पुनर्वास किया गया या नहीं.''
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