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'जो दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा रोकेंगे मैं 2019 में उन्हें वोट करूंगी': GROUND REPORT
- Author, अनघा पाठक
- पदनाम, बीबीसी मराठी संवाददाता
'पिछले महीने ही यहां गोलियां चलीं थीं' - दीवार में गोलियों के निशान दिखाते हुए 18 वर्षीय अनीता ने मुझसे कहा.
अनीता के गांव के पुराने घरों की जर्जर दीवारों को देखकर ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल था कि दीवार को नुक़सान गोलियों ने पहुंचाया है या बदहाली ने.
अंकिता पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज़िला मुज़फ़्फ़रनगर के पुरकाज़ी ब्लॉक के अब्दुलपुर गांव में अपने परिवार के साथ रहती हैं.
"दूसरी जाति के लोगों ने हमारे गांव के एक लड़के के साथ झगड़ा किया. वजह? वो साइड लेने के लिए अपनी बाइक का हॉर्न बजा रहा था. वो बाइक पर था और कुछ लोग उसके आगे ट्रैक्टर पर चल रहे थे."
"उसने हॉर्न बजाया तो उन्हें बुरा लग गया और लड़ाई शुरू हो गई. गांव के कुछ लोगों ने हस्तक्षेप किया और उन्हें वहां से भगाया. लेकिन बात यहां ख़त्म नहीं हुई. अगली सुबह वो लोग फिर हमारे गांव पहुंचे, उनके साथ पहले से अधिक लोग थे."
"वो ट्रैक्टर पर आए और उन्होंने गोलियां चलानी शुरू कर दीं. वो चिल्ला रहे थे कि तुम दलित हमसे आगे नहीं निकल सकते."
अनीता बताती हैं, "मैं अपने घर के भीतर छुप गई थी. उस ख़ौफ़ के माहौल को मैं बयान नहीं कर सकती. बीते साल दो अप्रैल को भी हमारे गांव में दंगा हुआ था. अचानक गोली चल गई थी. मैंने पहली बार जीवन में असली गोली देखी थी. उस दिन की बात को सोचकर अब भी मैं सहम जाती हूं."
वो कहती हैं, "मैं अभी भी सोचती हूं कि यदि कोई महिला या बच्चा उनके रास्ते में आ गया होता तो क्या होता. वो लोग अपनी राइफ़लों से अंधाधुंध गोलियां चला रहे थे."
पहली बार मतदान करेगी अंकिता
ये चुनावी साल है. मैं और मेरी सहकर्मी उत्तर प्रदेश के इस गांव में ये समझने के लिए गए थे कि 18 साल की किसी दलित युवती के लिए चुनाव में क्या अहम मुद्दे हो सकते हैं.
हमारे पास और भी कई सवाल थे. दंगों, हिंसा और शोषण का महिलाओं पर क्या असर होता है? ऐसी घटनाएं सुर्खियां बटोरती हैं. मृतकों की संख्या या सरकार की ओर से दी गई राहत रक़म पर ख़ूब चर्चा होती है. लेकिन उन महिलाओं का क्या होता है जो ऐसी हिंसा में फंस जाती हैं या अगर भाग्यशाली हों तो हिंसा से बच जाती हैं? हिंसा का उनके जीवन पर क्या असर होता है? क्या दंगों महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले अलग तरह से प्रभावित करते हैं?
अंकिता इस साल पहली बार मतदान करेंगी. वो कहती है, "मैं चाहती हूं कि ये दंगे रुक जाएं. दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा रुक जाएं. जो भी इस हिंसा को रोकेगा मैं उसे ही वोट दूंगी."
अंकिता कहती हैं कि जाति आधारित हिंसा का असर सबसे ज़्यादा लड़कियों और महिलाओं पर ही होता है. उनका कहना सही ही होगा क्योंकि हिंसा ने उन्हें भी प्रभावित किया है. उनकी पढ़ाई आधे में छूट गई है.
अपनी सुरक्षा के लिए वो अपने घर के भीतर ही सीमित रह गई हैं और अब उनका परिवार जल्द से जल्द उनकी शादी कर देना चाहता है.
अंकिता को अपने परिवार से ही लड़ना पड़ रहा है क्योंकि वो अभी शादी नहीं करना चाहती हैं.
उनकी मां ओमबीरी एक मज़बूत महिला हैं. वो गांव की पहली महिला हैं जिन्होंने अपनी बेटी को बारहवीं तक पढ़ाया है.
जब अंकिता 9वीं-10वीं में थी तब उन्हें हॉस्टल भेजा गया क्योंकि आसपास कोई अच्छा स्कूल नहीं था. ओमबीरी ने गांव की अन्य महिलाओं को भी बेटियों को स्कूल में भेजने के लिए प्रोत्साहित किया.
ओमबीरी कहती हैं, "लोग कहते थे कि तुमने अपनी बेटी को पढ़ाई के नाम पर जहां भेजा है वो स्कूल नहीं है, वो लोग तुम्हारी बेटी को बेच देंगे. लेकिन मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ा. मैं कहती थी कि आप मेरी बेटी की चिंता मत करो. अगर वो किसी को बेचेंगे तो मेरी बेटी को बेचेंगे. लेकिन तुम भी अपनी बेटियों को स्कूल भेजो."
वो कहती हैं कि गांव की कुछ औरतों ने उनकी बात मानकर अपनी बेटियों को पढ़ने भेजा. लेकिन फिर हालात बदल गए.
ओमबीरी कहती हैं, "अब चीज़ें पहले जैसी नहीं रही हैं. पूरा का पूरा सामाजिक वातावरण बदल गया है. बीते साल 2 अप्रैल को दलितों और अगड़ी जातियों के बीच दंगा हुआ. उस दिन के बाद से अब तक हालात सामान्य नहीं हुए हैं. अब मैं अपनी बेटी को ख़तरे में कैसे डाल सकती हूं. बेहतर यही है कि हम उसके लिए कोई लड़का खोज लें और शादी कर दें."
लड़कियों की सुरक्षा बड़ा मुद्दा
जब हम गांव पहुंचे तो पूरा गांव लगभग ख़ाली नज़र आया. काम करने लायक़ सभी लोग या तो खेतों की तरफ़ गए थे या फिर पास के शहरों में काम की तलाश में गए थे.
गांव के अधिकतर पुरुष आसपास के शहरों में दिहाड़ी मज़दूर के तौर पर काम करते हैं जबकि अधिकतर महिलाएं खेतों पर काम करती हैं. वो लकड़ियां बीनने के लिए नज़दीक के जंगल में भी जाती हैं.
गांव के अधिकतर परिवारों के पास थोड़ी-बहुत ज़मीन है. भैंसें और बैलगाड़ियां भी हैं. लेकिन अंकिता के परिवार के पास खेती के लिए कोई ज़मीन नहीं है.
आरक्षण, आर्थिक से ज़्यादा सामाजिक मुद्दा क्यों है ये बात भी इस गांव में बेहतर तरीक़े से समझी जा सकती है.
गांव के लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजना चाहते हैं. यहां माएं अपनी बेटियों को पढ़ाना तो चाहती हैं लेकिन उनकी सुरक्षा को लेकर डरी हुई हैं.
गांव में रहने वाली एक और महिला कविता बताती हैं, "स्कूल सिर्फ़ दो किलोमीटर दूर है. लेकिन बेटी वहां तक सुरक्षित पहुंच पाएगी या नहीं इस बात की कोई गारंटी नहीं है. कोई भी दलित लड़कियों के साथ छेड़छाड़ कर देता है लेकिन ऐसे हुड़दंगियों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है."
कविता की बेटी रिया नौवीं में पढ़ती हैं. वो कहती हैं, "कई बार मैं अपनी बेटी को स्कूल नहीं भेजती हूं क्योंकि कोई और लड़की उसके साथ जाने के लिए होती ही नहीं है. कई बार तो स्कूल से शिक्षक ही फ़ोन करके कह देते हैं कि आज स्कूल में कम बच्चे हैं, आप बेटी को ना भेंजे."
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस इलाक़े में धार्मिक और जातीय हिंसा कोई नई बात नहीं है.
एक स्थानीय ग़ैर सरकारी संगठन में काम करने वाली रेशमा परवीन कहती हैं, "यहां लोगों की सोच रूढ़िवादी है. जाति व्यवस्था भी यहां मज़बूत हैं. तथाकथित अगड़ी जातियों के लोग दलितों को दबा कर रखना चाहते हैं और यही हिंसा की वजह है."
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के डेटा के मुताबिक़ साल 2014 से 2016 के बीच देशभर में दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा या उत्पीड़न के कुल 1,19,872 मामले दर्ज किए गए. इनमें से सिर्फ़ 24.3 प्रतिशत मामलों में ही अभियुक्तों को सज़ा दी जा सकी.
रेशमा परवीन कहती हैं, "अब दलित भी जागरुक हो रहे हैं. वो अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं. कई बार ऊंची जाति के लोग बुरा मान जाते हैं. वो दलितों को अलग थलग कर, हमला कर या कई बार महिलाओं के साथ छेड़छाड़ या बलात्कार कर उन्हें दबाने की कोशिश करते हैं."
"आपको यक़ीन नहीं होगा लेकिन हम जब भी जागरूकता कैंप लगाते हैं हम लोगों से कहते हैं कि यदि किसी लड़की का बलात्कार हुआ हो तो सबूतों को सुरक्षित रखने की कोशिश की जानी चाहिए."
"हम उन्हें सिखाते हैं कि अदालत में काम आने के लिए सबूतों को कैसे जुटाया जाए. हम बताते हैं कि पीड़िता के कपड़ों को सुरक्षित रखा जाए और पुलिस के आने तक उसे नहलाया न जाए. हम उनसे घटनास्थल की तस्वीरें लेने और वीडियो बनाने के लिए भी कहते हैं."
'हम हिंसा के साये में जी रहे हैं'
अंकिता का सपना सिर्फ़ जाति आधारित हिंसा को रोकना ही नहीं है. वो महिलाओं से जुड़े अन्य मुद्दों पर भी काम करना चाहती हैं. दलित महिलाओं को सिर्फ़ जातिगत हिंसा का ही नहीं बल्कि घरेलू हिंसा का भी सामना करना पड़ता है. कम उम्र में शादी, शिक्षा की कमी, स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी उनके सामने अहम मुद्दे हैं.
अंकिता कहती हैं, "पहले हम इन्हीं मुद्दें पर काम करते थे. रेशमा ने मेरी मदद की है और मैं आसपास के गांवों में लगने वाले जागरूकता कैंपों में शामिल रही हूं. मुझे लगता है कि हम मिलकर महिलाओं के लिए हालात बदल सकते हैं."
लेकिन ये कहते कहते अंकिता के चेहरे पर उदासी आ जाती है. वो कहती हैं, "दुर्भाग्यवश अब सब कुछ बदल गया है और सुरक्षा हमारे लिए सबसे अहम मुद्दा बन गई है. हम हिंसा के साये में जी रहे हैं. कई बार तो लगता है कि पिता, मां या भाई सुबह को घर से गए तो शाम को लौटेंगे भी या नहीं."
इन महिलाओं को देखकर समझ आता है कि अब ज़िंदा रहना ही अपने आप में एक बड़ा संघर्ष बन गया है और बराबरी फ़िलहाल दूर का सपना बन गई है.
लेकिन अभी भी उम्मीद की किरण बाक़ी हैं जो अंकिता जैसी लड़कियों की आंखों में चमकती है.
वो कहती हैं, "मैं अगले पांच सालों में सबसे पहले अपनी डिग्री लेना चाहती हूं. नौकरी हासिल करके लड़कियों की शिक्षा के लिए काम करना चाहती हूं. मैं नहीं चाहती की किसी लड़की को स्कूल छोड़ना पड़े. इसके लिए मैं किसी से भी लड़ने के लिए तैयार हूं."
वो कहती हैं, "मेरा वोट बहुत महत्वपूर्ण है. मेरा वोट दुनिया बदल सकता है."
"मैं ऐसी सरकार चाहती हूं जो मेरे लिए काम करे. तब ही हालात बदलेंगे."
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