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तमिलनाडुः 80 साल पहले जब मीनाक्षी मंदिर में प्रवेश किए थे दलित
- Author, मुरलीधरन कासी विश्वनाथन
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी तमिल
पिछले दिनों केरल के सबरीमला मंदिर में 50 साल से कम उम्र की दो महिलाओं के प्रवेश के बाद मंदिर के दरवाजे कुछ समय के लिए बंद कर दिए गए थे और उसका शुद्धीकरण किया गया था.
ऐसा ही कुछ तमिलनाडु में 80 साल पहले भी हुआ था जब मदुरई के प्रख्यात मीनाक्षी मंदिर में दलितों ने प्रवेश किया था.
मंदिर के पुजारी और हिंदुवादी संगठनों ने तब मंदिर के शुद्धीकरण पर ज़ोर दिया था. लेकिन उसके बाद क्या हुआ?
8 जुलाई, 1939. दिन शनिवार. लगभग सुबह 8 बजकर 50 मिनट पर तमिलनाडु हरिजन सेवा संघ के विद्यानाथन अय्यर और एलएन गोपालास्वामी, नादर समुदाय के एक और कथित रूप से छोटी जाति के पांच लोगों के साथ मंदिर के अंदर गए.
नादर समुदाय अब अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल हो चुका है और उसके साथ वैसा भेदभाव नहीं होता है जैसा दलित समुदायों के साथ आज भी हो रहा है.
लेकिन तब नादर समुदाय के सदस्यों के साथ दलितों जैसा ही दुर्व्यवहार किया जाता था.
'अलाया प्रवेशम'... यानी 'मंदिर प्रवेश' में इस घटना का जिक्र किया गया है. इसके मुताबिक पी कक्कण, उसीलामपट्टी वी मुथु, मेलूर बीआर भूमिनाथन, वीएस चिन्नय्या और मुरुगन्नदम दलित समुदाय से थे.
हार पहनाकर किया स्वागत
एसएस षणमुगम् नादर समुदाय से संबंध रखते थे. कक्कण ने बाद में तमिलनाडु सरकार की कैबिनेट में जगह पाई, जब कांग्रेस अध्यक्ष के कामराज मद्रास रियासत के मुख्यमंत्री हुए थे.
मंदिर प्रवेश करने के बाद इन सभी के साथ क्या हुआ, इसका जिक्र लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के सीजे फलर की शोध पुस्तक 'द सरवेंट ऑफ गॉडेस' में विस्तार से किया गया है.
किताब में लिखा गया है कि उस समय मंदिर के प्रबंधक अधिकारी रहे आर सेशाचलम ने इन सभी का मंदिर के भीतर स्वागत किया था.
मंदिर के पुजारी पोन्नुस्वामी पट्टर उस समय गर्भगृह में थे और जैसे ही वो सभी वहां पहुंचे, पुजारी ने फूलों का हार पहनाकर उनका स्वागत किया.
वो सभी वहां बैठे और करीब 30 मिनट की पूजा के बाद वो मंदिर से बाहर आए.
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अगले दिन ही मंदिर बंद
अगले दिन यह बड़ा मुद्दा बन गया. पुजारियों में से एक मुथु पट्टर ने सुबह की पूजा के बाद मंदिर का दरवाजा बंद कर दिया.
उसके बाद उसने शाम की पूजा के लिए दरवाजा खोलने के इनकार कर दिया. उनका कहना था कि मंदिर दलितों के प्रवेश से अशुद्ध हो गया था और उसका शुद्धीकरण ज़रूर था.
मंदिर के प्रबंध अधिकारी आरएस नायडू को उस पुजारी ने दरवाजे की चाबी तक देने से इनकार कर दिया.
यह सबकुछ तब हुआ जब मंदिर के एक दूसरे पुजारी स्वामीनाथन पट्टर शहर से बाहर थे. वो उस रात वापस लौटे और उन्होंने प्रबंधन के साथ खड़े होने का निर्णय लिया.
10 जुलाई को मीनाक्षी मंदिर के दरवाजे पर लगे ताले को तोड़ा गया और स्वामीनाथन पट्टर ने वहां पहले की तरह पूजा की.
मंदिर के बाहर प्रदर्शन
जिन तीन पुजारियों ने मंदिर के शुद्धीकरण की बात की थी, उन्हें प्रबंधन ने मंदिर से बाहर का रास्ता दिखा दिया.
इनके अलावा और भी कई पुजारी थे जो शुद्धीकरण के पक्ष में थे, उन्हें भी मंदिर प्रबंधन ने काम से निकाल दिया.
कई पुजारियों का कहना था कि दलितों के प्रवेश से मंदिर अशुद्ध हो गया है और भगवान रूठकर मंदिर से चले गए हैं. उन्हें वापस मंदिर में लाने के लिए विशेष पूजा करनी होगी.
29 जुलाई को मंदिर के बाहर एक पुजारी के नेतृत्व में प्रदर्शन किया गया, जो मंदिर के शुद्धीकरण की मांग कर रहे थे.
मंदिर के प्रबंध अधिकारी आरएस नायडू अपनी जिद पर अड़े रहे और उन्होंने शुद्धीकरण की मांग को ख़ारिज कर दिया और प्रदर्शन करने वालों पर हमेशा के लिए प्रतिबंध लगा दिया.
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लड़ाई का अंत
इन घटनाओं के बाद न्यायालय में मंदिर के शुद्धीकरण को लेकर कई मुकदमे दायर किए गए. कोर्ट ने सभी को ख़ारिज कर दिया.
जिन पुजारियों को मंदिर प्रबंधन ने निकाला था, उन सभी ने मिलकर 1942 में मदुरई के एक कोर्ट में मुकदमा दायर किया.
उनका तर्क था कि वो मंदिर इसलिए नहीं जा रहे थे क्योंकि मंदिर अशुद्ध था और उसका शुद्धीकरण नहीं किया गया था.
1943 में कोर्ट का फ़ैसला आया, जिसमें जज ने निकाले गए पुजारियों के पक्ष में निर्णय दिया. हालांकि हाईकोर्ट ने निचली कोर्ट के इस फ़ैसले को पलट दिया.
अगस्त 1945 में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ. इसके मुताबिक निकाले गए पुजारी वापस मंदिर में लौटे ज़रूर, लेकिन मंदिर के शुद्धीकरण के बिना और इस तरह यह लड़ाई खत्म हुई.
और इस तरह प्रख्यात मीनाक्षी मंदिर में दलितों को प्रवेश मिला, जो आज भी कायम है.
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