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सबरीमला में 50 साल से कम उम्र की दो महिलाओं ने किया प्रवेश, जानिए कितना मुश्किल था ये?
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
केरल के सबरीमला मंदिर में 50 साल से कम उम्र की दो महिलाओं के प्रवेश के बाद मंदिर को लगभग दो घंटे तक 'शुद्धीकरण' के लिए बंद रखा गया. इन महिलाओं के प्रवेश के साथ ही मंदिर में हर उम्र की महिलाओं के प्रवेश ना करने की दशकों पुरानी परंपरा ख़त्म हो गई.
40 वर्षीय बिंदु अम्मिनि और 39 वर्षीय कनकदुर्गा ने इससे पहले भी पुलिसकर्मियों के साथ 24 दिसंबर को मंदिर में प्रवेश करने की कोशिश की थी लेकिन भारी विरोध के कारण वे मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकी थीं.
बिंदु ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा, ''हमने देर रात डेढ़ बजे पंबा से चढ़ाई शुरू की. सबरीमला के परिसर तक हमें पहुंचने में 3.30 बज गए फिर हमने पूजा की. इस दौरान पुलिस ने हमें सुरक्षा दी. ''
''हम दोनों ही श्रद्धालु हैं. मेरा जन्म 1978 में हुआ और कनकदुर्गा का जन्म साल 1979 में हुआ है. मैं सासता की भक्त हूं और कनकदुर्गा स्वामी अयप्पा की भक्त हैं. हम दोनों ने देश के कई मंदिरों के दर्शन किए हैं.''
दर्शन के बाद नीचे आकर बिंदु ने बीबीसी से कहा, ''स्वामी अयप्पा के दर्शन करने में श्रद्धालुओं ने मेरी मदद की. वो सच्चे श्रद्धालु हैं. इसने इस बात को साबित कर दिया है कि केवल कुछ कट्टरपंथी ही महिलाओं को वहां पूजा करने से रोक रहे हैं. कई श्रद्धालुओं ने मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया. इन श्रद्धालुओं के व्यवहार से मैं बेहद ख़ुश हूं.''
उधर सबरीमला कर्मा समिति ने इसके विरोध में बुधवार को केरल में बंद बुलाया है. इस समिति के अंतर्गत कई हिंदू संगठन आते हैं. संस्था के संयोजक एस जे आर कुमार ने बीबीसी हिंदी को बताया, ''हमने कल हड़ताल बुलाई है. महिलाओं को अंधेरे में चोरों की तरह मंदिर में दाखिल करवाने की साज़िश रचने के लिए मुख्यमंत्री विजयन ज़िम्मेदार हैं. ये सरकार ऐसा काम इसाई और मुसलमान समुदाय के साथ भी कम कर सकती है.''
सामाजिक कार्यकर्ता और अयप्पा सेना के संयोजक राहुल ईश्वर ने कहा, "पुलिस ने दोनों महिलाओं को ट्रांसजेंडर बताकर मंदिर में दाखिल करवाया और लोगों के साथ धोखा किया."
जैसे ही इन महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का वीडियो सामने आया मंदिर के पुजारी ने 'शुद्धीकरण' के लिए मंदिर के द्वार बंद कर दिए.
सबसे पहले पिछले साल अक्तूबर में रेहाना फ़ातिमा और पत्रकार कविता जक्काला ने मंदिर में प्रवेश की कोशिश की थी. लेकिन मंदिर के मुख्य पुजारी ने उस वक़्त मंदिर बंद करने की दी और ये महिलाएं प्रवेश नहीं कर सकीं.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद बिदुं और कनकदुर्गा ने वो परंपरा तोड़ी है. जिसे तोड़ने में अबतक कम से कम 10 महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया.
दलित एक्टिविस्ट और लेखक सनी कप्पिकड़ ने बीबीसी हिंदी को बताया, '' पिछले महीने मंदिर में प्रवेश की कोशिश के वक़्त इन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ा था. सबरीमला दलित और आदिवासी काउंसिल के सदस्यों ने इन्हें सुरक्षा दी थी.''
महिलाओं के मंदिर में प्रवेश की ख़बर पर ख़ुद केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने मुहर लगाई है. उन्होंने एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बात करते हुए कहा, ''महिलाओं ने मंदिर में पुलिस की सुरक्षा के साथ प्रवेश किया है. ''
28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को स्वामी अयप्पा के मंदिर परिसर में जाने की अनुमति दे दी थी. हालांकि जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने कहा था कि धार्मिक मामलों में कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.
दो महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर प्रतिक्रिया देते हुए 'रेडी टू वेट' मुहिम से जुड़ी पदमा पिल्लई ने बीबीसी से कहा, ''एक श्रद्धालु के तौर पर ये बेहद दुखद है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी वहां के संगठन विरोध कर रहे हैं. इस पर अध्यादेश लाया जाना चाहिए. ''
''मंदिर में प्रवेश से महिलाओं के जीवन पर ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. ऐसा नहीं है कि एक महिला सबरीमाला जाकर स्वर्ग या नरक में जाएगी. तो, क्यों लाखों भक्तों के दिलों को दुखी किया जा रहा है. ये मांग लोकतांत्रिक और संवैधानिक है.''
ऐसी प्रथा है कि स्वामी अयप्पा ब्रह्मचारी हैं और माहवारी की आयु की महिलाएं अंदर नहीं जा सकती हैं. बीजेपी और अन्य संगठन का मानना है कि महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोककर मंदिर की 'परंपरा' को बचाया जा रहा है.
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