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साल 2018: महिलाओं के हक़ और इंसाफ़ के लिए एक बड़ा साल
- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जेंडर के लिहाज़ से यूं तो 2018 भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ जारी हिंसा की सैकड़ों वीभत्स घटनाओं से भरा रहा लेकिन इन अपराधों को कम करने के लिए क़ानून में कुछ बड़े बदलाव भी किए गए.
सर्वोच्च न्यायालय ने बीते साल सबरीमला मंदिर विवाद और अडल्ट्री के मुद्दों पर महिलाओं के पक्ष में दो महत्त्वपूर्ण फ़ैसले दिए. इन सब घटनाओं के साथ ही अमरीका से शुरू हुए 'मी टू' आंदोलन ने भारत के दरवाज़े पर पहली दस्तक भी 2018 में ही दी.
महिलाओं के मुद्दों से जुड़ी, बीते साल की अहम घटनाओं पर एक नज़र-
कठुआ हादसा और बच्चों से बलात्कार के मामलों में मृत्यु दंड की घोषणा
जनवरी 2018 में जम्मू से सटे कठुआ क़स्बे में एक आठ साल की बच्ची के साथ हुए सामूहिक बलात्कार की घटना ने पूरे देश को हिला दिया. इस यौन हमले के बाद की गई बच्ची की निर्मम हत्या ने एक बाद फिर भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा के मुद्दे को आम लोगों में चिंता और चर्चा का विषय बना दिया. सड़कों पर देश-व्यापी विरोध प्रदर्शन हुए और बच्चों के ख़िलाफ़ बढ़ रही यौन हिंसा के मामलों पर नए सख़्त क़ानूनों की मांग बढ़ी.
लोकसभा ने छह महीनों के भीतर ही आपराधिक क़ानून संशोधन विधेयक पर चर्चा के बाद उसे पास कर दिया. आपराधिक क़ानून में इस बदलाव के बाद से अब 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के मामलों में दोषियों को मृत्युदंड तक की सज़ा सुनाई जा सकती है. इससे पहले साल 2012 में दिल्ली में एक चलती बस में कॉलेज की छात्रा 'निर्भया' के बलात्कार के बाद अगले साल क़ानून में संशोधन कर बलात्कार के लिए अधिकतम मौत की सज़ा का प्रावधान लाया गया था.
#MeToo आंदोलन की दस्तक
अमरीका में शुरू हुए #MeToo अभियान ने इस सितम्बर में तब दस्तक दी जब फ़िल्म अभिनेत्री तनुश्री दत्ता ने दस साल पहले हुए एक मामले में नाना पाटेकर के ख़िलाफ़ उत्पीड़न के आरोप लगाए. इसके बाद इस अभियान के तहत फ़िल्म, कला और मीडिया से जुड़ी कई महिलाओं ने अपने साथ हुई प्रताड़ना, उत्पीड़न की घटनाओं पर खुलकर बात की. महिलाओं द्वारा लगाए लगे आरोपों के दायरे में कई नामी हस्तियां जैसे नाना पाटेकर, विकास बहल, उत्सव चक्रवर्ती, आलोक नाथ और एमजे अकबर के नाम शामिल थे. यौन शोषण के आरोपों से घिरने के बाद एम जे अकबर ने विदेश राज्य मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.
अडल्ट्री क़ानून में बदलाव
सितम्बर 2018 में ही दिए गए एक ऐतिहासिक फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 150 साल पुराने 'अडल्ट्री' या 'व्याभिचार' के क़ानून को रद्द कर दिया. सर्वोच्च अदालत में दायर जनहित याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि 'ऐसा कोई भी क़ानून जो व्यक्ति कि गरिमा और महिलाओं के साथ समान व्यवहार को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, वह संविधान के ख़िलाफ़ है.'
इस संदर्भ में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 497 को मनमाना और अप्रासंगिक घोषित करते हुए जस्टिस मिश्रा ने जोड़ा, "अब यह कहने का वक़्त आ गया है कि शादी में पति, पत्नी का मालिक नहीं होता है. स्त्री या पुरुष में से किसी एक की दूसरे पर क़ानूनी सम्प्रभुता पूरी तरह ग़लत है."
पुराना अडल्ट्री क़ानून 1860 में बना था. आईपीसी की धारा 497 में इसे पारिभाषित करते हुए कहा गया था, अगर कोई मर्द किसी दूसरी शादीशुदा औरत के साथ उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाता है, तो पति की शिकायत पर इस मामले में पुरुष को अडल्ट्री क़ानून के तहत आरोप लगाकर मुक़दमा चलाया जा सकता था. ऐसा करने पर पुरुष को पांच साल की क़ैद और जुर्माना या फिर दोनों ही सज़ा का प्रावधान भी था. हालांकि इस क़ानून में एक पेंच यह भी था कि अगर कोई शादीशुदा मर्द किसी कुंवारी या विधवा औरत से शारीरिक संबंध बनाता है तो वह अडल्ट्री के तहत दोषी नहीं माना जाता था.
सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटी
एक जनहित याचिका पर 12 साल तक चली सुनवाई के बाद सितम्बर में आख़िरकार सर्वोच्च न्यायालय ने केरल के सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी. हिंदुओं के एक प्रमुख तीर्थ स्थल के तौर पर पहचाने जाने वाले सबरीमला मंदिर में सैकड़ों सालों से माहवारी की उम्र वाली महिलाओं का प्रवेश वर्जित रहा है.
इस भेद-भाव के पीछे मंदिर प्रशासन का तर्क ये था कि मंदिर के अंदर बैठे ईश्वर अयप्पा जीवन भर ब्रह्मचारी रहे हैं, इसलिए माहवारी की उम्र में आने वाली महिलाएँ यहां आकर पूजा नहीं कर सकतीं. लेकिन 28 सितंबर 2018 को आख़िरकार सबरीमाला मंदिर मामले में 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने फ़ैसला सुनाते हुए इस रोक को संविधान की धारा 14 का उल्लंघन बताया.
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच के मुताबिक हर किसी को, बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए. निर्णय में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि हर किसी के लिए एकसमान अधिकार होना चाहिए और 'नैतिकता' का फ़ैसला कुछ लोग नहीं ले सकते. संविधान पीठ की पांचवीं और अकेली महिला न्यायाधीश जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बाक़ी 4 न्यायाधीशों से असहमति जताई लेकिन निर्णय 4-1 के बहुमत से पारित हो गया.
वैसे निर्णय पारित होने के लगभग तीन महीने बाद भी, मंदिर से जुड़े सांस्कृतिक-सामाजिक संगठनों के सतत विरोध की वजह से महिलाएं आज तक मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाई हैं.
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