सामान्य वर्ग को आरक्षण दिए जाने से जुड़े 5 अनसुलझे सवाल?

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    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के ग़रीब और पिछड़े तबके के लोगों को सरकारी नौकरियों में दस फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला किया है. कैबिनेट ने सोमवार को फ़ैसला किया और मंगलवार को बिल लोकसभा में पेश भी कर दिया गया जो कि शीतकालीन सत्र का आख़िरी दिन है.

लेकिन सवाल ये उठता है कि केंद्र सरकार आने वाले दिनों में अपने इस फ़ैसले को अमल में कैसे लाएगी और अगर ये संभव हुआ तो ये आरक्षण किसे और कैसे मिलेगा?

इन्हीं सवालों को जानने के लिए बीबीसी ने बात की कानूनी मामलों के जानकार विराग गुप्ता से.

सवाल - 1 केंद्र सरकार ने चुनाव से ठीक तीन महीने पहले इस फ़ैसले का ऐलान क्यों किया?

जवाब - हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में नुकसान होने के बाद भाजपा को महसूस हुआ कि एसएसी-एसटी मामले पर उन्हें जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई के लिए सवर्ण वर्ग को भी आरक्षण का लॉलीपॉप देना चाहिए.

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लेकिन मुझे लगता है कि ये सही समाधान नहीं है क्योंकि इससे स्थिति और जटिल होगी. सुप्रीम कोर्ट में जब ये मामला जाएगा तब सरकार की फजीहत होगी. और इससे किसी भी वर्ग को कोई लाभ होने की जगह जातीय विद्वेष में बढ़त होगी.

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सवाल - 2 क्या केंद्र सरकार अपने वर्तमान कार्यकाल में इस फ़ैसले पर अमल कर पाएगी?

जवाब - फिलहाल, इस बात पर काफ़ी कयास लगाए जा रहे हैं कि केंद्र सरकार इस फ़ैसले को कानूनी जामा पहना पाएगी या नहीं. मैं मानता हूं कि संसद में इस फ़ैसले से जुड़े विधेयक को पास कराना केंद्र सरकार के लिए बड़ी चुनौती नहीं होगी.

सरकार को ये भली भांति पता है कि राज्यसभा में उसके पास बहुमत नहीं है. लेकिन आज की तारीख़ में आरक्षण समर्थक करने वाले हों या इसके विरोध में खड़े लोग हों, गरीब सवर्णों के आरक्षण का विरोध कौन कर सकता है.

हाल ही में एससी-एसटी मुद्दे पर लाया गया बिल भी ऐसा ही उदाहरण था जब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद बदलाव किया गया था और सभी दलों ने इसका समर्थन किया था.

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सवाल - 3 केंद्र सरकार की इस नीति के दीर्घकालिक परिणाम क्या होंगे?

देखिए, प्रश्न इस बात का है कि सरकार कानून बनाने की प्रक्रिया को लेकर कितनी गंभीर है. कल कैबिनेट में ये फैसला लिया गया और दो दिनों में सरकार इस बिल को पास करना चाहती है तो राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए कानून में बदलाव करने के जो प्रयास हैं, वो संसदीय प्रणाली की गिरावट को दर्शाते हैं.

आने वाले समय में इस तरह कमजोर तरीके से कानूनों में बदलाव किए जाएंगे तो उन्हें निश्चित तौर पर अदालतों में चुनौती मिलेगी.

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सुप्रीम कोर्ट ने आज से 26 साल पहले सन 1992 में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित किया था कि अगर सरकार के सामने सामाजिक न्याय और समाज में समानता लाने की मजबूरी है तो वह आरक्षण की व्यवस्था करे लेकिन 50 फीसदी तक की सामान्य लिमिट होनी चाहिए.

इससे बची नौकरियों को आप मैरिट से भरें ताकि प्रशासनिक कार्यकुशलता से किसी तरह का समझौता न किया जाए. ऐसे में सरकार रोजगार के अवसर बढ़ाए जिससे ये संतुलन खराब न हो और आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रहेगी.

सवाल - 4 क्या मुसलमानों और ईसाइयों को इस फ़ैसले का लाभ मिलेगा?

ये एक बड़ा सवाल है क्योंकि मुसलमानों और ईसाइयों में जाति प्रथा नहीं होती है. ऐसे में एससी-एसटी, ओबीसी का आरक्षण सामान्यत: उन्हें नहीं मिलता है. हालांकि, कुछ राज्यों में इसके लिए प्रावधान हैं. लेकिन गरीबी तो सब में होती है तो क्या इस वर्ग को इस फ़ैसले का लाभ मिलेगा.

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अगर उन्हें मिलता है तो मैं समझता हूं कि संघ परिवार में अड़चनें पैदा होंगी. लेकिन अगर उन्हें नहीं मिलेगा तो अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा जो कि ये बताता है कि कानून के सामने सभी को बराबरी का दर्जा और एक समान अधिकार हासिल हैं.

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सवाल - 5 क्या आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना कानून संगत है?

जवाब - साल 1992 में इंदिरा साहनी मामले में और 2010 में बने एक आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में ये कहा गया था कि इस तरह से आर्थिक आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता है. क्योंकि जिस सिद्धांत के तहत एससी-एसटी या ओबीसी को आरक्षण दिया जाता है, अगर उसे पारित किया जाता है तो आर्थिक आधार आरक्षण कैसे दिया जा सकता है.

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