छत्तीसगढ़ में सब पर कैसे भारी पड़े भूपेश बघेल

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- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए
क्रिकेट की एक चर्चित कहावत है- 'कैचेज़ विन मैचेज़.' मतलब कैच गिरा और हाथ से मैच गया.
क्रिकेट के मैदान पर जिन्होंने टीएस सिंहदेव को देखा होगा, वे जानते हैं कि उनसे किसी तरह की चूक की गुंजाइश नहीं होती. न खेल में और ना ही राजनीति में.
लेकिन टीएस सिंहदेव छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री पद की दावेदारी में कैसे चूक गए, यह समझ पाना मुश्किल है.
राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि उन्हें औद्योगिक घरानों का क़रीबी बता कर उनकी दावेदारी को कमज़ोर किया गया. इसके अलावा राजनीति में क्या पक्ष, क्या विपक्ष; सबसे बेहद आत्मीय होने का नुक़सान भी उन्हें उठाना पड़ा है.
सिंहदेव के अलावा पिछले पांच दिनों में मुख्यमंत्री पद के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री चरणदास महंत और सांसद ताम्रध्वज साहू का नाम भी तेज़ी से उभर कर सामने आया. रायपुर से लेकर दिल्ली तक इन सभी नेताओं के नाम पल-पल बदलते घटनाक्रम के साथ 'प्रबल दावेदार' के तौर पर सामने आते रहे.
कभी टीएस सिंहदेव के मुख्यमंत्री बनने की ख़बर सामने आई तो कभी ताम्रध्वज साहू के नाम पर मुहर लगने की बात कही गई. कभी चरणदास महंत के इलाक़े में समर्थकों ने जश्न मना लिया तो कभी भूपेश बघेल के घर पर पटाखेबाजी हुई. लेकिन रविवार को मुख्यमंत्री के लिए भूपेश बघेल के नाम के ऐलान के साथ सारी अटकलों पर विराम लग गया.

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टीएस सिंहदेव
ताजा विधानसभा चुनाव में जिस सरगुजा इलाक़े में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी शुरुआती सभाएं की थीं, उन इलाक़ों की सभी 14 सीटों पर अगर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार जीत कर आए हैं तो उसके पीछे कहीं न कहीं यह जन आकांक्षा भी थी कि इस बार उनके इलाक़े के टीएस सिंहदेव ही मुख्यमंत्री बनेंगे.
अंबिकापुर के वरिष्ठ पत्रकार अशोक शर्मा कहते हैं, "वे उन थोड़े से राजनेताओं में से हैं, जिनके भीतर कहीं गहरे तक संकोच भरा हुआ है. सरल और सौम्य टीएस सिंहदेव के किसी भी निर्णय में आप नहीं पाएंगे कि उनके भीतर कोई अतिरिक्त महत्वाकांक्षा है. और जब बात दोस्ती की हो, रिश्तों की हो, व्यवहार की हो तो फिर दूसरी तमाम चीज़ें पीछे रह जाती हैं. मुख्यमंत्री का पद भी."

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विरासत बनाम संघर्ष
छत्तीसगढ़ की सरगुजा रियासत के 66 साल के राजा त्रिभुवनेश्वर शरण सिंहदेव उनसे एक चौंथाई उम्र वाले लोगों के लिए भी या तो 'महाराज जी' हैं या 'टीएस बाबा'. आम तौर पर सादा-सा कुर्ता-पायजामा पहनने वाले टीएस सिंहदेव पांच राज्यों में चुने गए सर्वाधिक पैसे वाले विधायकों में शुमार हैं.
पिछली सरकार के मुख्यमंत्री रमन सिंह, राज्य का खजाना खाली होने जैसे सवालों पर मज़ाक में कहते थे कि अगर ज़रूरत हुई तो नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव जी से क़र्ज़ ले लेंगे.
सरगुजा देश की उन रियासतों में से रही है, जिसका कांग्रेस पार्टी के शुरुआती दौर से ही लगाव बना हुआ था. दस्तावेज़ बताते हैं कि 1930 में त्रिपुरी में जब कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, तब सरगुजा रियासत से 50 से अधिक हाथी और रसद भेजे गए थे.
आज़ादी के बाद जब रियासतों का विलय हो गया, उसके बाद भी मध्य भारत की सियासत में छत्तीसगढ़ की सरगुजा रियासत का दबदबा बरकरार रहा. राजाओं-महाराजाओं से अलग इस रियासत के उत्तराधिकारियों ने अपनी अलग जगह बनाई.
टीएस सिंहदेव के पिता मदनेश्वर सरन सिंह देव जहां मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव और योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे, वहीं मां देवेंद्र कुमारी सिंह देव विधायक और मंत्री बनीं. परिवार में ऐसे कई लोग रहे, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में राजनीति में महत्वपूर्ण पदों पर आज भी सक्रिय हैं.

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टीएस सिंहदेव याद करते हुए बताते हैं कि 1952 में हुए पहले चुनाव के बाद से लगातार उनके परिवार का राजनीति से जुड़ाव बना रहा और इस इलाक़े का प्रतिनिधित्व का अवसर उन्हें मिलता रहा.
ज़मीनी राजनीति
लेकिन इतिहास में मास्टर की पढ़ाई पूरी करके परिवार के कामकाज और विरासत को संभालने के लिए सरगुजा लौटे टीएस सिंहदेव ने जब राजनीति में क़दम रखा तो उसकी शुरुआत उन्होंने किसी छोटे-से राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर ही की.
सिंहदेव के गृहनगर अंबिकापुर के महेश वर्मा कहते हैं-"जिन्हें लगता हो कि महाराजा का ग्रासरूट से कोई जुड़ाव नहीं रहा है, उन्हें यह पता होना चाहिए कि उन्होंने 1983 में शहर के वार्ड नंबर 20 से पहली बार पार्षद का चुनाव लड़ा था. वे 10 सालों तक पार्षद और अंबिकापुर के नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष भी रहे."
जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना तो अजीत जोगी की सरकार में उन्हें वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया गया. बाद में 2008 में जब अंबिकापुर विधानसभा सामान्य घोषित हुई तो टीएस सिंहदेव पहली बार विधानसभा पहुंचे.
भारतीय जनता पार्टी के युवा नेता अनुराग सिंह देव से लगभग 948 वोटों से विजयी हुए टीएस सिंहदेव को यह उम्मीद नहीं थी कि वोटों का अंतर इतने भर का ही होगा.
उनके सहयोगियों का दावा है कि इस चुनाव के बाद टीएस सिंहदेव ने अपने संकोच और अंतर्मुखी स्वभाव के विपरीत इलाक़े में आम लोगों से मिलने-जुलने का सिलसिला शुरू किया और शायद यह भी एक बड़ा कारण था कि जब 2013 में जब उन्होंने अनुराग सिंह देव को हराया, तब दोनों नेताओं के बीच हार-जीत का अंतर 948 से बढ़ कर 19,558 तक जा पहुंचा. सिंहदेव विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाये गए.
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दोस्ती और रिश्ते
विधानसभा में अक्सर सरकार को घेरने के बाद भी कांग्रेस पार्टी के भीतर सिंहदेव इस बात को लेकर हमेशा निशाने पर रहे हैं कि वे मुख्यमंत्री रमन सिंह समेत दूसरे नेताओं के साथ बेहतर रिश्ते बनाए रखने के पक्षधर क्यों रहे हैं?
कई बार यह राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना रहा कि आख़िर सिंह देव सत्ता पक्ष के नेताओं की व्यक्तिगत आलोचना से क्यों बचते हैं?
सिंह देव ऐसी आलोचनाओं का विनम्रता से जवाब देते हुए बताते हैं कि राजशाही की पृष्ठभूमि के बाद भी माता-पिता ने हमेशा यही सिखाया कि व्यक्तिगत जीवन में हम जितने विनम्र हो सकते हैं, हमारे भीतर जितना लचीलापन होगा, हम उतने ही संवेदनशील भी होंगे.
सिंह देव का कहना है कि वे तथ्यों के साथ बात रखने के आदी हैं और इसके लिए तीखे और कड़वे शब्दों का उपयोग बिल्कुल ज़रूरी नहीं है. कम से कम व्यक्तिगत स्तर पर तो हमला बोलने से बचना ही चाहिए.

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सिंहदेव कहते हैं, ''विधानसभा या किसी राजनीतिक मंच पर मुद्दा उठाना अलग बात है. लेकिन जो व्यक्तिगत व्यवहार होता है, सुख-दुख में शामिल न होना, आमने-सामने होने पर मुंह मोड़ लेना, ये अपरिपक्व और असभ्य समाज की व्यवहार कल्पना है. फुटबॉल या क्रिकेट के खिलाड़ी खेल के मैदान पर अगर लड़ते-भीड़ते हैं तो ऐसा नहीं होता कि मैदान से बाहर वे एक-दूसरे के साथ मिल जुल कर बात न करें."
शायद खेल की यह स्प्रिट ही उन्हें कांग्रेस के दूसरे नेताओं से अलग करती है और उनके व्यक्तिगत रिश्ते कभी कमज़ोर नहीं पड़ते. पिछले 6 दिनों से मुख्यमंत्री पद की जोड़-तोड़ और तमाम बहसों के बीच सिंहदेव ने रविवार को इसे फिर से साबित किया और सार्वजनिक तौर पर भूपेश बघेल के लिए शोले के गीत दुहराये-"ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे."
चरणदास महंत
नवंबर 2000 में जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना, उस समय शुक्ल बंधुओं के अलावा मुख्यमंत्री पद के लिए जिस नाम पर सबसे अधिक चर्चा हुई थी, वह नाम चरणदास महंत का था.
18 साल बाद महंत एक बार फिर मुख्यमंत्री बनने से रह गए. लेकिन महंत को इसका कोई मलाल नहीं है. वे कहते हैं, "हमने छत्तीसगढ़ में जीत सुनिश्चित की, यही हमारा लक्ष्य था. हम सब एक हैं. यहां कोई विभेद की स्थिति नहीं है."
ताज़ा विधानसभा चुनाव में उन्हें कांग्रेस पार्टी ने प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाया था.
भूपेश बघेल, टीएस सिंहदेव और ताम्रध्वज साहू में से सबसे लंबी राजनीतिक पारी खेलने वाले कबीरपंथी समाज से जुड़े 64 वर्षीय चरणदास महंत को राजनीति विरासत में मिली है.

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एमएससी, एमए, एलएलबी और पीएचडी करने वाले चरणदास महंत के पिता बिसाहूदास महंत कांग्रेस सरकार में विधायक और मंत्री थे.
चरणदास महंत ने पहली बार 1980 में अविभाजित मध्य प्रदेश में चुनाव लड़ा और लगातार दो बार वे विधायक चुने गये. 1988 में उन्हें मध्य प्रदेश में कृषि विभाग का मंत्री बनाया गया. 1993 से 1995 तक विधानसभा का सदस्य रहते हुए उन्हें वाणिज्य कर मंत्री भी बनाया गया. 1995 से 1998 तक उन्होंने मध्य प्रदेश में गृह मंत्रालय और जनसंपर्क विभाग की कमान संभाली.
1998 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा और वे 12वीं लोकसभा के सदस्य चुने गए. 1999 में वे फिर से सांसद चुने गए. अलग राज्य बनने के बाद 2004 से 2008 तक उन्होंने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष का पद भी संभाला.
वे 2009 में तीसरी बार सांसद चुने गए. पंद्रहवीं लोकसभा में छत्तीसगढ़ से चुने जाने वाले एकमात्र सांसद थे. 2011 और 2013 में केंद्र में उन्हें राज्यमंत्री भी बनाया गया. लेकिन 2014 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.
2018 में चरणदास महंत फिर से राज्य की राजनीति में लौटे और सक्ति विधानसभा से विधायक चुने गये.
कबीर चिंतन, हिंदू कहे मोही राम पियारा मुसलमान रहमाना और छत्तीसगढ़ के सामाजिक धार्मिक आंदोलन जैसी किताबें लिखने वाले चरणदास महंत की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को लेकर माना जा रहा था कि दूसरे सभी दावेदारों की तुलना में केंद्र में उनकी अच्छी पकड़ है और इसका उन्हें लाभ मिलेगा. लेकिन बात नहीं बन पाई.
हालांकि उनके गृह ज़िले जांजगीर-चांपा के सामाजिक कार्यकर्ता ब्रजेश गौराहा नहीं मानते कि महंत मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल थे. गौराहा कहते हैं, "महंत जी राज्य और केंद्र में लंबे समय तक मंत्री रहे हैं. यह तो केवल समर्थकों का दबाव था कि वे मुख्यमंत्री बनें. इसके अलावा मुझे नहीं लगता कि उनकी कोई व्यक्तिगत इच्छा रही होगी."

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ताम्रध्वज साहू
छत्तीसगढ़ में साहू समाज की अपनी एक पहचान रही है. एकजुट हो कर सामाजिक राजनीतिक लड़ाई में इस समाज की सहभागिता के कारण माना जा रहा था कि लोकसभा चुनाव को देखते हुये कांग्रेस पार्टी ताम्रध्वज साहू को मुख्यमंत्री बना सकती है.
सौम्य माने जाने वाले साहू की राजनीतिक गलियारे में खास पहचान नहीं होने के बावजूद माना जा रहा था कि उनके पिछले चुनाव परिणाम को देख कर पार्टी आलाकमान कोई सकारात्मक फ़ैसला ले सकता है.
छत्तीसगढ़ में लोकसभा की 11 में से 10 सीटें भाजपा के पास हैं और साहू अकेले कांग्रेसी नेता थे, जो मोदी लहर में भी चुन कर आए. उन्होंने भाजपा की राष्ट्रीय नेता सरोज पांडे को हराया था.
हायर सेकेंडरी तक की पढ़ाई करने वाले ताम्रध्वज साहू को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी की ओबीसी मोर्चा का अध्यक्ष और फिर कांग्रेस पार्टी की केंद्रीय कार्य समिति में शामिल किया गया.
पहली बार सरपंच बन कर राजनीतिक मैदान में आए ताम्रध्वज साहू को लेकर बेमेतरा के रामचंद्र देवांगन कहते हैं-"राजनीति में होने के बाद भी वे जोड़-तोड़ से दूर रहे. एक बार चुनाव हारने के बाद तो उन्होंने राजनीति छोड़ने का भी मन बना लिया था. लेकिन उनके जैसे लोगों के होने से राजनीति पर आम जनता की आस्था बनी रहती है."
1998 में पहली बार विधायक चुने गए ताम्रध्वज साहू छत्तीसगढ़ की पहली सरकार में राज्य मंत्री बनाये गये थे. 2003 और 2008 में भी वे विधायक चुने गए. लेकिन 2013 में वे बेमेतरा विधानसभा का चुनाव हार गए.

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पार्टी के अध्यक्ष भूपेश बघेल ने उन्हें लोकसभा चुनाव के लिए राजी किया और भाजपा के सांसद और मंत्री का गढ़ बने दुर्ग ज़िले में उन्होंने मोदी लहर में भी जीत हासिल की.
साहू को जब इस बार विधानसभा चुनाव में टिकट दिया गया तो माना जा रहा था कि लगभग 18 फ़ीसदी मतदाताओं वाले साहू समाज को साधने के लिए पार्टी ने ताम्रध्वज साहू को अपना उम्मीदवार बनाया है.
साहू को जीत भी हासिल हुई लेकिन कांग्रेस के कुल आठ साहू उम्मीदवारों में से तीन चुनाव हार गए.
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