अदालती फ़ैसले से ‘रफ़ाल’ की हवा निकली: नज़रिया

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- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आरोपों से बरी कर दिया है. प्रकारांतर से आरोप लगाने वाले अब आरोपों के घेरे में आ जाएंगे. उल्टे राष्ट्रीय सुरक्षा के राजनीतिकरण के आरोप भी लगेंगे. उत्तर के तीन राज्यों में जीत से प्रसन्न कांग्रेस के लिए ये बुरी ख़बर है.
राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने रफ़ाल को 'घोटाला-घोटाला' कहने के साथ 'चौकीदार चोर है' भी गढ़ लिया. इससे शंका का पर्याप्त माहौल बन गया था. पार्टी की योजना इसे देर तक खींचने की थी.
कांग्रेस की मंशा कुछ और थी
अदालत में जाने और फैसला आने से ये मामला बहुत जल्दी तार्किक परिणति तक पहुंच गया. कांग्रेस इस मसले को चुनाव तक खींचना चाहती थी, जो अब सम्भव नहीं.
बेशक रिलायंस परिवार को मिले ऑफसेट अधिकार और क्रोनी कैपिटलिज्म जैसे आरोप बदस्तूर रहेंगे पर आरोपों की हवा अब निकल चुकी है. उनमें अब वह दम नहीं बचा, जितनी हवा बाँधी गई थी.
जब राहुल गांधी ने इस साल के शुरू में रफ़ाल को लेकर आरोप लगाने शुरू किए तो जवाब में पहले अरुण जेटली ने पंद्रह सवाल राहुल से पूछे थे.

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उसी दौरान सितंबर में सुप्रीम कोर्ट में एक वकील ने याचिका दायर कर दी.
याचिकाओं से क्या मिला?
इस याचिका के बाद आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की और फिर प्रशांत भूषण, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा की याचिकाएं सामने आईं.
शायद कांग्रेस की इच्छा अदालत जाने की नहीं थी. उसे संभवतः इस बात का अनुमान था कि अदालत में जाने से इसका राजनीतिकरण रुक जाएगा.
कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने एक वक्तव्य में उन्हीं दिनों इस मामले की पीआईएल को बीजेपी स्पांसर्ड बताया था.
पी. चिदंबरम ने कहा था कि इस मामले के लिए अदालत नहीं, संसद का मंच बेहतर है.


कांग्रेस क्या चाहती थी?
मूलतः कांग्रेस पार्टी की मांग थी कि संसद की संयुक्त समिति इसकी जाँच करे. जाँच चलते रहने पर ही इसका राजनीतिक लाभ मिल सकता था.
प्रशांत भूषण और उनके साथी सीबीआई के पास जांच के लिए ही गए थे. बाद में उन्होंने भी पीआईएल दायर की.
कुछ लोगों को उम्मीद थी कि शायद अदालत से कोई ऐसी बात निकले, जिससे सरकार दबाव में आती हो. बहरहाल ऐसा नहीं हुआ.

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अदालत ने कहा है कि रफ़ाल विमान ख़रीद प्रक्रिया को लेकर किसी तरह का संदेह करने का कोई आधार नहीं है.
इस मोड़ पर आकर ये मामला अब बीजेपी के राजनीतिक फायदे का बन जाएगा. कांग्रेस को या तो अब इस मामले को भुलाना होगा या फिर कोई और मोड़ देना होगा.
इतना तय है कि अब नरेंद्र मोदी के भाषणों में रफ़ाल भी एक बड़ा मुद्दा होगा.


आरोपों में कितना दम
कांग्रेस पार्टी पर पहले से आरोप है कि वह एनडीए सरकार को बदनाम करने के लिए रक्षा सौदों के फर्जी घोटालों के आरोप लगाती रही है.
करगिल युद्ध के बाद एनडीए सरकार ने कफन खरीद की थी, जिसमें घोटाले का आरोप लगा था. इसे लेकर भी कांग्रेस ने घोटालों का प्रचार किया. उसमें निशाना जॉर्ज फर्नांडिस बने थे.
यूपीए के कार्यकाल में सन 2009 में सीबीआई ने उस मामले में आरोप पत्र दायर किए और दिसम्बर 2013 में आरोप खारिज हो गए.

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इसी तरह सन 2006 में बराक मिसाइल घोटाले की खबरें आईं. उस मामले में कुछ गिरफ्तारियाँ भी हुईं और फिर सात साल की तफतीश के बाद सीबीआई ने मान लिया कि कोई घोटाला नहीं हुआ.
इसके बाद यूपीए सरकार ने खुद फिर बराक मिसाइलों की खरीद का फैसला किया. रफ़ाल रक्षा सौदे को मीडिया में बहस का विषय बनाने के बजाय सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने वालों के उद्देश्य को लेकर अब सवाल किए जाएंगे.
व्यावहारिक सच यह है कि कांग्रेस ने केन्द्र सरकार को दबाव में लेने की जो कोशिश की थी, वह न केवल विफल हुई, बल्कि बाजी अब उलटी पड़ने वाली है.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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