परंपरा और आधुनिकता की 'जंग' बना सबरीमला विवाद थम क्यों नहीं रहा: नज़रिया

Women protesting with billboards saying, "Save Sabarimala"

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    • Author, श्याम कृष्ण कुमार
    • पदनाम, मुख्य सलाहकार, विज़न इंडिया फ़ाउंडेशन

सबरीमला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को महिलावादी समूहों ने अपनी बड़ी जीत घोषित किया था. लेकिन कोर्ट के इस फ़ैसले ने बहुत सी महिलाओं को नाराज़ भी किया है.

कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद भी केरल के सबरीमला मंदिर के बाहर विरोध प्रदर्शन जारी हैं. शुक्रवार और शनिवार को सबरीमला मंदिर के बाहर तनाव की स्थिति रही.

यहाँ वो महिलाएं पहुंचने की कोशिश कर रही हैं जिन्होंने ये दृढ़ संकल्प किया है कि वो सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद मंदिर परिसर में दाखिल होकर रहेंगी.

जबकि दूसरी तरफ़ श्रद्धालुओं का एक बड़ा समूह है. इसमें महिलाएं भी शामिल हैं. वो हर संभव कोशिश कर रही हैं कि उनके भगवान से जुड़ी पुरानी परंपराओं की अखंडता बनी रहे.

ये सारा विवाद सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले से शुरू हुआ है जिसमें कोर्ट ने 10 से 50 साल की उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश देने की बात कही है.

जबकि मंदिर के जो नियम हैं वो इसके विपरीत हैं. मंदिर के संचालक भगवान अयप्पा का हवाला देकर कहते हैं कि वो ब्रह्मचारी थे, इसलिए जिन महिलाओं को मासिक धर्म होता है, वो मंदिर में दाखिल नहीं हो सकतीं.

जब सुप्रीम कोर्ट ये कह रहा है कि महिलाओं को सबरीमला मंदिर में दाख़िल होने का पूरा अधिकार है, तो क्यों शहरी महिलाओं का एक बड़ा समूह कोर्ट के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ भी खड़ा है?

दक्षिण भारत में सबरीमला मंदिर की बड़ी मान्यता है. लोग जाति, लिंग और भाषा का विचार किये बिना सबरीमला मंदिर के दर्शन करने पहुँचते हैं.

हर साल लाखों की संख्या में आदिवासी समूह के लोग, मुसलमान और ईसाई भी इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं.

मंदिर में दाखिल होने से 41 दिन पहले से खाने-पीने से जुड़े तमाम सख़्त नियमों का श्रद्धालुओं को पालन करना पड़ता है.

इसके बाद पश्चिमी घाट के घने जंगल से गुज़रने वाले कठिन रास्ते से होकर श्रद्धालु नंगे पाँव सबरीमला मंदिर तक पहुँचते हैं.

Hindu devotees

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'प्रगतिशील क़दम' और आलोचना

सबरीमला मंदिर के दर्शन करने के लिए जो नियम बनाये गए हैं वो वाक़ई बहुत कठिन हैं. इसलिए बहुत से श्रद्धालु कहते भी हैं कि ये पूरी प्रक्रिया महिलाओं के लिए बहुत ज़्यादा मुश्किल है.

शायद यही वजह भी रही है कि श्रद्धालु परिवारों में से घर के मर्द इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं.

लेकिन मासिक धर्म जिन महिलाओं को होता है वो महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकतीं, इसे लेकर सबसे ज़्यादा विवाद था. सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच ने इस बंदिश को भी ख़त्म कर दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये भेदभाव है इसलिए उम्र और लिंग के आधार पर किसी को मंदिर में प्रवेश से नहीं रोका जा सकता.

सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की बेंच में इंदू मल्होत्रा अकेली ऐसी जज थीं जिन्होंने कहा कि सबरीमला पर बहुमत के फ़ैसले से वो सहमत नहीं हैं.

सड़कों पर हज़ारों लोग

उनकी राय थी कि ये एक धार्मिक मामला है. इससे लोगों की धार्मिक भावना जुड़ी है. इसलिए कोर्ट को इसमें दख़ल नहीं देना चाहिए.

जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर अपनी राय पेश करते हुए कहा था कि धर्म के मामलों में तर्कसंगतता के विचारों को शामिल नहीं किया जा सकता.

उनका तो ये भी कहना था कि जब तक भगवान अयप्पा को मानने वाले समुदाय में से कोई पीड़ित आकर न कहे, कोर्ट को इसपर सुनवाई नहीं करनी चाहिए.

बहरहाल, सबरीमला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को एक प्रगतिशील क़दम के रूप में सेलिब्रेट किया गया.

लेकिन इसके बाद जो हुआ वो वाक़ई अप्रत्याशित था.

केरल के लगभग सभी कस्बों में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आये. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिये.

इसके बाद दिल्ली, बेंगलुरू, चेन्नई समेत यूके, अमरीका और कनाडा में भी सबरीमला मंदिर को लेकर प्रदर्शन हुए.

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स्थानीय लोगों का नज़रिया अलग

भारत के अग्रणी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने नब्ज़ को एकदम सही वक़्त पर पकड़ा.

पहले तो वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के पक्ष में ही थे. लेकिन अचानक उन्होंने अपनी राय बदल ली और कोर्ट के फ़ैसले के विरोध में हो रहे प्रदर्शनों के समर्थन में खड़े होने को उत्सुक दिखे.

केरल में ऐसे कई विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं जिनमें स्थानीय लोगों के साथ न सिर्फ़ भाजपा, बल्कि कांग्रेस के नेता भी दिखाई दिये.

लेकिन इस बात को समझना होगा कि केरल ऐसा राज्य नहीं है जहाँ महिलाओं के पास अपनी बात रखने का अधिकार न हो.

इतिहास इस बात का गवाह है कि केरल के समाज का एक बड़ा हिस्सा मातृप्रधान है जहाँ महिलाओं ने सदियों तक विरासत में मिलने वाली संपत्ति पर नियंत्रण रखा.

केरल भारत में 'सर्वोच्च साक्षरता दर' वाला राज्य भी है और केरल के सामाजिक संकेतक विकसित देशों के समान हैं.

विरोध प्रदर्शन कर रही केरल की महिलाओं का मानना है कि किसी ने भी उनके नज़रिये की परवाह नहीं की.

'आज़ादी थोपी जा रही है'

ये महिलाएं महसूस करती हैं कि जो महिलाएं कथित तौर पर महिलावादी हैं और जिन महिलाओं के पास असामान्य अधिकार हैं, वो उनपर 'आज़ादी' (liberation) का विचार थोप रही हैं जिसकी उन्हें ज़रूरत नहीं है.

अंजलि जॉर्ज नाम की एक महिला ने ही सबरीमला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया कैंपेन शुरू किया है और महिलाओं पर लगे बैन को सही माना है.

उनका कहना है कि स्थानीय प्रशासन का नज़रिया औपनिवेशिक था, इसीलिए वो सबरीमला मंदिर पर बन रही स्थिति का सही जायज़ा नहीं ले पाये.

वो कहती हैं, "प्रशासन ने ये बहुत बड़ी ग़लती की है. मैं ऐसा इसलिए कह सकती हूँ क्योंकि लोगों के मन में सबरीमला मामले के बाद ये बात घर कर जाएगी कि सिस्टम उनकी धार्मिक आस्था और परंपराओं की सुरक्षा करने में अक्षम है."

हिंदू धर्म सांस्कृतिक प्रथाओं, परंपराओं और पूजा की विभिन्न प्रणालियों का समावेश है. इसमें भारी विविधता है.

मसलन, जिस भगवान अयप्पा के मंदिर में महिलाओं का जाना वर्जित है. जो भगवान महिला श्रद्धालुओं को अपने पास नहीं देखना चाहते, उनका विवाहित रूप एक अन्य मंदिर में महिलाओं और पुरुषों, दोनों के द्वारा पूजा जाता है. और ऐसा भी नहीं है कि मंदिरों में सिर्फ़ महिलाओं के प्रवेश पर शर्तें लगाई गई हैं.

पूर्वोत्तर राज्य असम में भी कामाख्या देवी के मंदिर में पुरुषों का प्रवेश कुछ वक़्त के लिए बंद कर दिया जाता है. वहाँ स्थानीय मान्यता है कि देवी कामाख्या उन दिनों मासिक धर्म में होती हैं इसलिए पुरुषों को उनके मंदिर में नहीं जाने दिया जाता.

A woman holding a framed poster of a Hindu god followed by another woman

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कृत्रिम एकरूपता बनाना

कहा जाता है कि भारत में करोड़ों देवी-देवता हैं. देश में लाखों मंदिर हैं और शायद दर्जन भर मंदिरों में ही लिंग-आधारित प्रवेश प्रतिबंधित है.

ऐसे में समानता को आधार बनाकर इस समाज में एक तरह से कृत्रिम एकरूपता नहीं बनाई जा सकती. इससे हमारे समाज की विविधता और कई पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का नुकसान होगा.

सच्चाई ये भी है कि किसी भी वास्तविक हितधारक से ये समझने की ईमानदार कोशिश ही नहीं की गई कि असल में मंदिर की परंपराएं क्या हैं.

सुधार के नाम पर स्थानीय परंपराओं को दबाकर आधुनिकता को लोगों पर थोपा जा रहा है. इसके लिए चाहे वो लोग अब कोर्ट के आदेश का हवाला दें या राज्य की पुलिस की मदद लें.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से एक और परेशान करने वाला सवाल खड़ा होता है और वो सवाल ये है कि धर्म और भारत देश के बीच रिश्ता क्या है?

धार्मिक संस्थानों को व्यवस्थित करने में सरकार अब ज़्यादा लिप्त है और देश की न्यायपालिका ये बताने में जुटी है कि सही धार्मिक परंपरा क्या होनी चाहिए.

नामी वकील फ़ली नरीमन और राजीव धवन इस मामले में कुछ गंभीर आरोप लगा चुके हैं कि न्यायाधीशों ने ये निर्धारित करना अपना अधिकार मान लिया है कि कौन से धार्मिक विश्वास और सिद्धांत 'आवश्यक' हैं.

सबरीमला मंदिर का विवाद इन्हीं सबके बीच खड़ा किया गया एक विवाद है जो हमारे समाज के कठोर विरोधाभासों को सामने लाता है.

इसमें एक तरफ हैं महानगरीय अभिजात्य वर्ग के लोग जो महिलाओं की कथित आज़ादी का जश्न मना रहे हैं.

वहीं दूसरी तरफ हैं ज़मीन से जुड़ी लाखों महिला श्रद्धालु जिन्हें महसूस हो रहा है कि उनकी आवाज़ की आज के भारत में कोई सुनवाई नहीं हो रही.

(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)

(ये नज़रिया श्याम कृष्ण कुमार ने लिखा है जो कि विज़न इंडिया फ़ाउंडेशन के मुख्य सलाहकार होने के साथ-साथ अनादि फ़ाउंडेशन के सदस्य भी हैं. संस्कृति और नीति निर्माण पर उन्होंने विशेष तौर पर काम किया है.)

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