क्या मोदी सरकार ने CBI निदेशक को हटा ग़लती की है

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- Author, विकास त्रिवेदी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन यानी सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा को केंद्र की मोदी सरकार ने छुट्टी पर भेज दिया है. इससे पहले मंगलवार को आलोक वर्मा ने सीबीआई के विशेष निदेशक राकेश अस्थाना से सारी ज़िम्मेदारियां वापस ले ली थीं.
केंद्र सरकार ने 23 अक्टूबर को नोटिफिकेशन जारी कर नागेश्वर राव को सीबीआई का अंतरिम निदेशक बनाया है. नागेश्वर राव सीबीआई में संयुक्त निदेशक के पद पर थे.
अस्थाना गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं और पीएम मोदी के क़रीबी माने जाते हैं. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस मसले पर सरकार की भूमिका को लेकर विपक्ष के आरोपों को ख़ारिज किया और जांच के लिए एसआईटी बनाने की बात कही.
सीबीआई ने मांस निर्यातक मोइन क़ुरैशी के ख़िलाफ़ जांच में रिश्वत लेने के आरोप में राकेश अस्थाना पर एफ़आईआर दर्ज की थी तो दूसरी तरफ़ अस्थाना ने भी आलोक वर्मा पर रिश्वत लेने के आरोप लगाए हैं.
सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वक़ील प्रशांत भूषण ने आलोक वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से हटाने की कड़ी आलोचना की है. उन्होंने मोदी सरकार पर भ्रष्ट लोगों को बचाने का आरोप लगाया है.
उधर आलोक वर्मा ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया है. शुक्रवार को इस मामले में सुनवाई होगी.
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प्रशांत भूषण ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''आलोक वर्मा ने अस्थाना को हटाए जाने की सिफ़ारिश की थी. फिर भी इस सिफ़ारिश को निरस्त कर दिया गया और न जांच हुई न कोई एक्शन लिया गया. नागेश्वर राव को एक्टिंग डायरेक्टर बना दिया गया. इसको हम चुनौती देंगे. इस बीच ये भी पता चला है कि आलोक वर्मा ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. ''
लेकिन सीबीआई डायरेक्टर को क्या एक झटके में हटाया जा सकता है और अगर डायरेक्टर को नियुक्त करना है तो इसकी प्रक्रिया क्या है? हमने जानकारों से इन्हीं सवालों के जवाब जानने की कोशिश की.

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कैसे चुने जाते हैं सीबीआई डायरेक्टर?
सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति एक उच्च स्तरीय कमेटी करती है. इस कमेटी के सदस्य प्रधानमंत्री, चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष होते हैं. कमेटी अपनी सिफ़ारिश सरकार को भेजती है, जिसके बाद सीबीआई डायरेक्टर की नियुक्ति होती है.
लोकपाल एक्ट आने के बाद यही प्रक्रिया साल 2014 से लागू है. इससे पहले डायरेक्टर को चुनने के लिए पुराने तरीके़ का इस्तेमाल किया जाता था.
सीबीआई से जुड़े नियमों का उल्लेख दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम में है.
धारा 4(2) के मुताबिक़, अगर डायरेक्टर को चुने जाने वाली कमेटी का कोई सदस्य उपस्थित नहीं रहता है तो नियुक्ति को अवैध नहीं माना जाएगा. यानी कमेटी का कोई सदस्य भी किसी एक नाम पर मुहर लगा सकता है.
धारा 4 (B) के मुताबिक़, कार्यभार संभालने की तारीख़ से कम से कम दो साल तक डायरेक्टर पद से कोई हटा नहीं सकता है.
इसी क़ानून के मुताबिक़, अगर सीबीआई के भीतर ही कोई ऐसा भ्रष्टाचार का मामला आता है तो इसकी जांच अलग होगी.

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लोकपाल एक्ट 2014
सीबीआई के पूर्व जॉइंट डायरेक्टर एनके सिंह ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल कम से कम दो साल का होना चाहिए. सीबीआई के डायरेक्टर को कैसे नियुक्त किया जाना है, इस बारे में लोकपाल एक्ट में प्रावधान हैं. इसी प्रावधान के तहत बनी कमेटी सीबीआई डायरेक्टर को चुनती है. ये कमेटी ही फ़ैसला करती है कि किसको हटाया जाए और किसको नियुक्त किया जाए. ''
लेकिन इस कमेटी तक सीबीआई डायरेक्टर के नाम पहुंचने की भी एक प्रक्रिया और कुछ बारीकियां होती हैं.
अगर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया कमेटी में हिस्सा नहीं ले पा रहे हैं तो वो सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को अपनी जगह भेज सकते हैं.
- अगर लोकसभा में विपक्ष का नेता नहीं है तो सदन में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी सर्च कमेटी मीटिंग्स में हिस्सा लेती है.
- इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक़, सीबीआई डायरेक्टर को चुने जाने की प्रक्रिया गृह मंत्रालय से शुरू होती है.
- गृह मंत्रालय इस मामले में आईपीएस अधिकारियों की एक लिस्ट बनाती है. ये लिस्ट किसी क्षेत्र की जांच में अनुभव और वरिष्ठता के आधार पर तैयार की जाती है.
- गृह मंत्रालय इस लिस्ट को 'कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग' को भेजती है. इसके बाद अनुभव, वरिष्ठता और भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में अनुभव के आधार पर एक फाइनल लिस्ट बनाई जाती है.
- सर्च कमेटी इन नामों पर चर्चा करती है और अपनी सिफ़ारिशों को भेजती है. इसके बाद कमेटी नाम पर मुहर लगाती है.
प्रशांत भूषण कहते हैं, ''डायरेक्टर को चुनते वक़्त किस बैच के अधिकारी हैं, इस आधार पर भी फ़ैसला लिया जाता है.''
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सीबीआई निदेशक को हटाने की प्रक्रिया
प्रशांत भूषण कहते हैं, ''सीबीआई निदेशक को हटाने के लिए 'कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग' को हाई लेवल कमेटी के पास ही मामला ले जाना पड़ेगा. इसके लिए एक बैठक बुलाई जाएगी. ये बताया जाएगा कि ये आरोप हैं. आप बताइए कि इनको हटाना है या नहीं. ये फ़ैसला तीन सदस्यीय कमेटी ही करती है, जिसके सदस्य प्रधानमंत्री, चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया और नेता विपक्ष होते हैं. कैबिनेट कमेटी ऑफ अपॉइंटमेंट के पास भी इस बारे में कोई अधिकार नहीं है. सरकार के पास भी इस बारे में कोई अधिकार नहीं है.''
सुप्रीम कोर्ट के वक़ील सूरत सिंह ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''सीबीआई निदेशक के पद को संवैधानिक बनाना चाहिए ताकि आसानी से हटाया न जा सके. 2014 के बाद निदेशक को हटाने के लिए सिर्फ़ अपॉइंटमेंट कमेटी का ही नियम है. अगर आचरण में दिक्कत या आरोप नहीं हैं तो किसी को हटाया नहीं जा सकता.''
आलोक वर्मा का कार्यकाल 2019 तक था.
सूरत सिंह कहते हैं, ''आप इसे सरकार के चोर दरवाज़े के तौर पर देख सकते हैं. जो आप सीधे तौर पर नहीं कर सकते वो आप दूसरे तरीक़े से कर सकते हैं. ब्यूरोक्रेसी पर इसका क्या असर होगा कि कोई भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कुछ काम कर रहा है तो उसे छुट्टी पर भेजा जा सकता है. मोदी सरकार ने कई अच्छे काम किए, लेकिन कोई ईमानदार आदमी बेधड़क अपनी बात कह सके, ऐसा माहौल नहीं दे सके हैं. क्या किसी को बचाने के लिए आलोक वर्मा को छुट्टी पर क्यों भेजा गया?''
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सरकार का बचाव करते हुए कहा, ''सीवीसी ने अपनी बैठक में धारा 8 और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 4(1) के तहत ये सिफ़ारिश की. इन पर आरोपों की जांच न तो ये दो अधिकारी कर सकते हैं, क्योंकि दोनों पर आरोप हैं और न ही इनकी निगरानी में कोई एजेंसी कर सकती है. इसलिए जांच पूरी नहीं होने तक छुट्टी भेजने का फ़ैसला किया गया.''
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप भी कहते हैं कि सीबीआई डायरेक्टर को हटाने के मामले 'कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग' के ज़रिए ही आगे बढ़ाए जाते हैं.
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CBI विवाद में सरकार की भूमिका पर सवाल
प्रशांत भूषण कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट में बहुत साल पहले सीबीआई को स्वतंत्रता देने के लिए कुछ क़दम उठाए गए थे. पहला ये कि सीबीआई निदेशक का कार्यकाल दो साल से कम नहीं होगा. दूसरा डायरेक्टर को नियुक्त उच्चस्तरीय कमेटी करती है. हटाने की ताक़त सरकार के पास नहीं होती है. सरकार का ऐसे में डायरेक्टर्स की नियुक्ति और हटाया जाना सवालों में है. पहले भी हमने राकेश अस्थाना को नियुक्त जाने का विरोध किया था.''
प्रशांत ने कहा, ''ये सारी प्रक्रिया राकेश अस्थाना को बचाने के लिए की गई. हमने रफ़ाल सौदे में सीबीआई में जो शिकायत की थी, उसकी जांच न हो पाए इसलिए ये सब कराया गया.''
1993 में हवाला फंडिंग मामले में विनीत नारायण ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. ये केस विनीत नारायण बनाम भारत सरकार जजमेंट के नाम से जाना गया.
इसी फैसले के बाद सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल दो साल किया गया था.
इस मामले में याचिकाकर्ता विनीत नारायण ने बीबीसी हिंदी से कहा, ''सीबीआई डायरेक्टर का कार्यकाल दो साल फिक्स करने से कुछ नहीं बदला. ना पारदर्शिता आई न कुछ बदला. मैं इस पूरे मामले को सुप्रीम कोर्ट में फिर लेकर जाऊंगा कि इसका रिव्यू किया जाए. हर राजनीतिक पार्टी अपने विरोधियों पर हमले के लिए सीबीआई का इस्तेमाल करती है. अभी जो हो रहा है, ये पुराना सिस्टम पूरी तरह से फेल साबित हुआ. सीवीसी के पास शिकायत की गई. इसका समाधान नहीं निकला. सीबीआई की छवि ख़राब कर रहे हैं. अभी दोनों के ख़िलाफ़ जांच होनी चाहिए.''
सूरत सिंह कहते हैं, ''सरकार ने जो किया है वो क़ानूनी तौर पर सही नहीं है. मौजूदा क़ानून में ये सुविधा दी गई है ताकि लोग अपना काम बिना डरे कर सकें. सरकार एक तरफ भ्रष्टाचार ख़त्म करने की बात करती है. दूसरी तरह ऐसे मामले होते हैं तो सारा मक़सद ही फेल हो गया.''
राहुल गांधी ने राकेश अस्थाना के मोदी सरकार के क़रीबी होने का दावा किया है.
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अरुण जेटली से भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब इस बारे में सवाल पूछा गया तो वो बोले, ''मुझे लगता है कि इस तरह की बातें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए जूसी ख़बरें हैं. लेकिन आख़िर में सबूत ही काम करते हैं. जब निष्पक्ष जांच होती है तो कोई चहेते और नापसंद जैसी कोई बात मायने नहीं रखती. सिर्फ़ सबूत देखे जाते हैं.''
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