यूपी पुलिस के एनकाउंटर में ज़िंदा बचने के बाद भी ख़ौफ़ज़दा: BBC SPECIAL

- Author, प्रियंका दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश से लौटकर
उत्तर प्रदेश में बीते एक साल से जारी पुलिस मुठभेड़ों में से एक में ज़िंदा बच गए पंकज की कहानी में फ़र्क़ सिर्फ़ ज़िंदगी और मौत का नहीं है.
राज्य में इन एनकाउंटरों में 67 तथाकथित अपराधी मारे गए हैं. विपक्ष इन पर शंका ज़ाहिर करता रहा है जबकि सरकार और प्रशासन का कहना है कि अपराधी ही निशाने पर आए हैं.
अप्रैल 2018 में राज्य के आज़मगढ़ ज़िले में हुई ऐसी ही एक मुठभेड़ में पंकज ज़िंदा बच गए. लेकिन 20 साल के पंकज यादव की कहानी पर आने से पहले आपका ये जानना ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश के वाराणसी ज़ोन में बीते एक साल के दौरान 193 पुलिस मुठभेड़ें हुई हैं. इन पुलिस कार्रवाइयों में सात अभियुक्तों की जान गई जबकि 32 घायल हुए.
आज़मगढ़ ज़िला वाराणसी के इसी पुलिस ज़ोन के अंतर्गत आता है.
यहां हुई चर्चित पुलिस मुठभेड़ों में रामजी पासी, राकेश पासी और जयहिंद यादव जैसे दलित और पिछड़ी जातियों के 'तथाकथित अपराधियों' के एनकाउंटर शामिल हैं. इस पड़ताल के दौरान बीबीसी की टीम ने रामजी पासी और जयहिंद यादव के परिजनों से भी मुलाक़ात की.
पंकज यादव एनकाउंटर
पंकज यादव की कहानी शुरू होती है दिल्ली से तक़रीबन 830 किलोमीटर दूर मौजूद आज़मगढ़ ज़िले की मेहनगर तहसील के हटवा खालसा गांव से. यहां गांव के एक समृद्ध राजनीतिक परिवार में बड़े हुए 20 साल के पंकज का परिवार आज तक उनका 'एनकाउंटर' होने के सदमे से निकल नहीं पाया है.
15 अप्रैल 2018 को क्षेत्र के रसूलपुरा गांव के पास एक पुलिस मुठभेड़ में घायल हुए पंकज के घुटने में दो गोलियां लगी थीं. हालांकि जुलाई के आख़िरी हफ्ते में पंकज बेल पर रिहा तो हो गया, लेकिन उनके माता-पिता आज भी हर रात उनके किसी नए पुलिस एनकाउंटर में मार दिए जाने के ख़ौफ़ में गुज़ार रहे हैं.

लम्बे समय तक अपने गांव से ज़िला पंचायत के सदस्य रहे पंकज के पिता 50 वर्षीय रामवृक्ष यादव ने अपने बेटे के 'पुलिसया एनकाउंटर' को फ़र्ज़ी मुठभेड़ करार देते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में इंसाफ़ की गुहार भी लगाई है.
लेकिन परिवार में एक सीधे-सादे शरीफ़ लड़के के तौर पर देखे जाने वाले पंकज रातों-रात छह मुक़दमों में नामजद 20 हज़ार के इनामी बदमाश में कैसे तब्दील हो गया?
पंकज के एनकाउंटर के बारे में पुलिस और उनके परिवार का पक्ष एक दूसरे से बिल्कुल उलट है.
परिवार का पक्ष
पंकज के पिता रामवृक्ष यादव बताते हैं, "हम ज़िला पंचायत में रहे हैं और साथ ही हमारा ट्रकों का कारोबार है. पंकज हमारा छोटा लड़का है. अभी-अभी पढ़ाई ख़त्म किया था और बीते दिसम्बर में हमने उसकी शादी की थी. वह कारोबार में हाथ बँटाता था. आगे ब्लॉक का चुनाव लड़ने की तैयारी में था. हम खाते-पीते घर के लोग हैं. हमारा अपना घर-द्वार सब है. हमारे बच्चे कभी चोरी-चकारी में नहीं रहे."
लेकिन 14 अप्रैल 2018 को इस परिवार के साथ अजीब घटनाओं का एक अप्रत्याशित सिलसिला शुरू हुआ.
रामवृक्ष के अनुसार, "12 अप्रैल की सुबह हमारा बड़ा बेटा विनोद बिहार से ट्रक वापस लेकर आया. घर आकर हमसे बोला की उसकी सास की तबीयत ख़राब है. उसे अपनी मेहरारू (पत्नी) को लेकर अपनी सास को देखने ग़ाज़ीपुर जाना था. हमारी गाड़ी को अगले दिन लोड होने बनारस स्थित पारलेजी की फै़क्ट्री भेजा जाना था. उसने मुझसे कहा कि मैं गाड़ी लोड होने के लिए बनारस भिजवा दूं और वह वापसी में लेता आएगा."
उन्होंने बताया," हमारे साढ़ू का बेटा है, कमलेश यादव. ड्राइवर है और अक्सर हमारी गाड़ियां चलाता है. उसी को ट्रक बनारस भी ले जाना था. लेकिन इस बार उसने पंकज को भी अपने साथ बनारस ले जाने की ज़िद की तो पंकज भी चला गया."
रामवृक्ष बताते हैं कि दोनों लड़के बनारस पहुंचे, लेकिन उस शाम बिस्किट तैयार नहीं होने की वजह से ट्रक लोड नहीं हो पाया. कमलेश और पंकज को एक दिन इंतज़ार करना पड़ा. "14 अप्रैल की रात को माल लोड होना था. फैक्ट्री के रजिस्टर में माल की एंट्री भी हो गई थी. इस बीच 14 अप्रैल की दोपहर में ही हम अपनी पत्नी को लेकर अस्पताल जा रहे थे कि रास्ते में बड़ा बेटा विनोद ग़ाज़ीपुर से लौटकर आता हुआ दिखा. बहू की भी तबीयत कुछ ख़राब थी तो हमने कहा कि हम उसे भी दिखा लाते हैं. बहू को अपनी पत्नी के साथ गाड़ी में बिठाते हुए हमने बेटे विनोद को बाइक से आने के लिए कहा. फिर हमलोग चक्रपानपुर से आगे अस्पताल पहुंच गए, लेकिन विनोद नहीं आया. हम फ़ोन पर फ़ोन करते रहे पर उसका फ़ोन लगा ही नहीं."

इमेज स्रोत, Priyanka Dubey/BBC
इसी बीच दोपहर दो बजे के आस-पास रामवृक्ष को बनारस से एक फ़ोन आया. "मेरे भतीजे दीपक यादव का फ़ोन था. बोला, एसओजी (स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप) वाले आए थे और पंकज भैया को उठाकर ले गए हैं. एसओजी के सिपाहियों ने उसे मुझे कुछ न बताने की धमकी भी दी थी. कहा था अगर किसी को बताया तो उसे भी उठा ले जाएँगे और गाड़ी भी फूँक देंगे. लेकिन उसने बड़ी हिम्मत करके मुझे फ़ोन किया."
रामवृक्ष उस दिन को याद करके बताते जा रहे थे, "सूचना मिलते ही हम सब परेशान हो गए. दिमाग ही काम नहीं कर रहा था. लेकिन फिर मैंने तुरंत 100 नंबर पर फ़ोन करके पुलिस को सूचना दी कि मेरे लड़के को उठा ले गए हैं. दो घंटे बाद फिर फ़ोन किया तो उन्होंने कहा सम्बंधित थाने को सूचित कर दिया गया है. लेकिन कुछ ठोस नहीं हुआ. बड़ा लड़का तो हमारा गायब था ही, छोटे का भी कुछ मालूम नहीं चल रहा था. अगला सुबह पता चला कि रसूलपुर के पास पुलिस ने पंकज का एनकाउंटर कर दिया है."

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15 अप्रैल की सुबह ही रामवृक्ष को पहली बार मालूम चला कि उनके बेटे पर चोरी-डकैती और हत्या से जुड़े छह अज्ञात मुक़दमे लगे हैं और उसे बीस हज़ार का इनामी अपराधी घोषित किया गया है.
उनका दावा है कि पुलिस ने ऐसा रातोंरात कर दिया. हर मुक़दमे में पुलिस ही वादी थी. पंकज के साथ ही राज तिलक नाम के एक और तथाकथित अपराधी के पैर में भी इस पुलिस कार्रवाई में दो गोलियां मारी गई थीं.
मेहनगर थाने के बाहर खड़ी एंबुलेंस का पीछा करते करते रामवृक्ष बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सरकारी अस्पताल पहुंचे. वहां अस्पताल में उनकी पंकज से मुलाक़ात हुई. यहां पंकज ने उन्हें जो बताया, वो सबके लिए चौंकाने वाला था.
पंकज ने अपने पिता को बताया कि पुलिस ने पहले बोरे भिगाकर उसके घुटनों पर बांधे थे और फिर गोलियां मारी थीं. यह दूर से गोली के मारे जाने का आभास देने के लिए इस्तेमाल होने वाली एक पुरानी तकनीक है.
ऐसा करने से गोली के साथ निकालने वाले बारूदी शरपनेल को भीगा बोरा सोख लेता है और घाव के आस पास काला निशान नहीं बनता. इससे मेडिकल रिपोर्ट में यह साबित करने में आसानी होती है कि गोली दूर से मारी गई थी.
"पंकज ने यह भी बताया कि बीती रात रानी सराय थाने पर उसकी अपने बड़े भाई विनोद और उसके दोस्त अमरजीत से मुलाक़ात हुई थी. वो दोनों वहां पुलिस हिरासत में पहले से मौजूद थे. लेकिन जैसे ही उन्हें मालूम चला कि पंकज और विनोद सगे भाई हैं, वो पंकज को पुलिस की गाड़ी में बिठाकर ले गए और विनोद को वहीं थाने में रखा. जैसे ही मुझे ये पता चला मैंने 100 नम्बर पर वापस फ़ोन किया. जितने लोगों को पुलिस में जानता था सबको फ़ोन किया और बताया कि मेरे बड़े लड़के का अपहरण हो गया है पर कुछ नहीं हुआ", रामवृक्ष ने कहा.

कुछ घंटे बाद पिता को पुलिस की तरफ से फ़ोन करके इत्तिला दी गई कि उनका बड़ा बेटा विनोद ज़िले के निज़ामाबाद थाने में है.
वह आगे जोड़ते हैं, "मैं पंकज को अस्पताल से लेकर सीधे जेल में दाख़िल करवाया और विनोद को लेने निज़ामाबाद थाने पहुंचा. अब तक 15 (अप्रैल) तारीख़ की रात को 10 बज चुके थे. थाने में इंचार्ज ने मुझसे एक कागज़ पर साइन करवाए जिसपर लिखा था कि मुझे मेरा बेटा सौंपा जा रहा है और अब मैं आगे कोई शिकायत या कार्रवाई नहीं करूंगा. मैंने विनोद को लिया और चुपचाप वापस आ गया. एक ही दिन में अचानक इतना कुछ हो गया था... छोटे बेटे को एनकाउंटर में दो गोलियां मारी गई थीं. उस खाते-कमाते लड़के को पुलिस ने इनामी बदमाश घोषित कर दिया. बड़े बेटे को भी पुलिस ने अगवा कर लिया था. हमारी तो दुनिया ही लुट गई थी जैसे...हम बहुत डर गए थे."
विनोद की कहानी
घर लौटने के बाद विनोद ने पिता को बताया कि 14 अप्रैल की दोपहर जब वो उसके पीछे अस्पताल आने के लिए निकला तो चक्रपानपुर के पास ही एसओजी वालों की गाड़ी ने उसे ओवर टेक कर लिया और धक्का मार कर ज़मीन पर गिरा दिया. इसके बाद उसे पुलिस जीप में धकेल दिया गया और गाड़ी पूरी शाम उसे आस पास के क़स्बों में दौड़ाती रही. रात को जब उसे रानी सराय थाने ले जाया गया जहां उसने पंकज को देखा. विनोद के अनुसार इसके तुरंत बाद पुलिस ने उसे निज़ामाबाद थाने भेज दिया और पंकज को जीप में 'कहीं' ले गए.
एनकाउंटर के ढाई महीने बाद पंकज बेल पर रिहा तो हो गया लेकिन उसके पैर का इलाज अब भी जारी है.
ख़ौफ़ज़दा परिवार
पंकज की माँ सिर्मला बताती हैं कि मेहनगर थाने के प्रभारी प्रेमचंद यादव 17 सितम्बर को उनके घर आए थे और उनके बेटे को मारने की धमकियाँ देकर चले गए.
वह कहती हैं, "विश्वकर्मा पूजा के दिन दारोगा साहिब अपनी पूरी फ़ौज लेकर घर आए और पूरे मोहल्ले में गाली-गलौच करने लगे. मेरी बेटी को भी बाहर घसीट कर उससे पंकज के बारे में पूछने लगे. कहने लगे कि वो उसको मार डालेंगे. मैंने उनके हाथ जोड़े तो मुझसे बोले की मैं तैयारी कर लूं... बीस दिन में तेरही मनाऊंगी अपने लड़के की", इतना कहकर सिर्मला सिसक सिसक कर रोने लगीं.
रामवृक्ष को अब सिर्फ़ मानवाधिकार आयोग और उच्च न्यायालय से ही उम्मीदें हैं. वह जोड़ते हैं, "मैं धारा 156(3) के तहत स्थानीय पुलिस के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करवाना चाहता हूं और अपने बेटे के मामले में निष्पक्ष जांच चाहता हूं. पंकज आगे स्थानीय चुनाव लड़ना चाहता था. संभव है कि किसी ने रंजिश में हमें रास्ते से हटाने के लिए यह सब किया हो. पुलिस ने पहले तो फर्ज़ी मुठभेड़ में मेरे लड़के को मारा, अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज 6 मामले उस पर खोल दिए और फिर जब हमने उसकी ज़मानत करवाई तब उस पर रातों-रात गैंगस्टर ऐक्ट लगा दिया. यह लोग हमें घेर कर तोड़ देना चाहते हैं. मेरे लड़के निर्दोष हैं और अगर आज एक निर्दोष लड़के का एनकाउंटर हुआ है... तो कल औरों का भी होगा. इसलिए इन मामले में पुलिस कार्रवाई की जांच होनी ही चाहिए".
पुलिस का पक्ष
पंकज यादव के एनकाउंटर के वक़्त आजमगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रहे अजय साहनी से जब मैंने इस मुठभेड़ पर उठ रहे सवालों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि पंजक यादव इलाक़े में हुई कई बड़ी चोरियों में शामिल था. "मुठभेड़ के वक़्त उसने भागने की कोशिश की और पुलिस पर गोलियां चला दीं. उसके पास से दो देसी कट्टे भी बरामद हुए थे. आत्मरक्षा में पुलिस को भी जवाबी फ़ायर करना पड़ा."

पंकज यादव एनकाउंटर पर उठते सवालों के बारे में पूछने पर उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ओ.पी सिंह ने कहा, "मैं आजमगढ़ के इस विशेष मामले पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा. आप अभियुक्त के परिवार से बात करेंगे तो वो तो सवाल उठायेंगे ही. सवाल तो कोई भी किसी पर भी उठा सकता है. हर एनकाउंटर की मजिस्ट्रेट से जांच होगी और होती है! यही क़ानून है. और अगर जांच में कोई भी पुलिस अफ़सर दोषी पाया गया तो उस पर उचित कार्रवाई की जाएगी."
सरकार का पक्ष
उत्तरप्रदेश में पुलिस मुठभेड़ों के ख़िलाफ़ बढ़ती शिकायतें और सवालों पर राज्य सरकार की प्रतिक्रिया जानने के लिए हमने प्रदेश सरकार के ऊर्जा मंत्री और राज्य सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा से बात की.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "देखिए, सरकार की पहली प्राथमिकता प्रदेश में सुरक्षा का वातावरण बनाना है. पूर्व में जो यहां सपा-बसपा और कांग्रेस का कॉकटेल था - वह आपराधियों को संरक्षण देता था. हमारे काम करने का तरीका अलग है. इस सरकार में अपराधियों को कोई संरक्षण नहीं दिया जाएगा. अगर कोई अपराध करेगा... तो उसको उसी की भाषा में पुलिस जवाब देगी. साथ ही अगर कोई वर्दी पहनकर दादागिरी करेगा तो उसको भी बक्शा नहीं जाएगा."
विपक्ष की आवाज़
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हफ़ीज़ गांधी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की 'अपराध करेंगे तो ठोक दिए जाएंगे' वाले बयान की निंदा करते हुए कहा, "कोई अभियुक्त अपराधी है या नहीं, यह सिर्फ़ अदालत तय कर सकती है. पुलिस अपनी गोलियों से अपराध तय नहीं कर सकती. इस तरह पुलिस शक्तियों का अतिरेक में प्रयोग असंवैधानिक है. सरकार और पुलिस का काम लोगों को सुरक्षा देना और उन्हें महफ़ूज़ महसूस करवाना है - फ़र्ज़ी मुठभेड़ों से उनको आतंकित करना नहीं."


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