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वे पड़ाव जिनसे होकर इस मुकाम तक पहुंचे हैं एमजे अकबर
- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अतीत आपका पीछा नहीं छोड़ता. उसमें कोई दाग़ हो तो कभी भी पीछे पड़ सकता है और आपके चमकदार करियर पर ग्रहण लगा सकता है.
मोबाशर जावेद अकबर (एमजे अकबर) के साथ भी यही हुआ.
अलग-अलग शहरों की 20 महिलाओं के कथित डराने वाले अनुभवों के केंद्र में अकबर का जो चेहरा सामने आ रहा है, उसकी सत्यता को क़ानूनी चुनौती दी जा सकती है.
अकबर ने क़ानून का रास्ता पकड़ा भी है, लेकिन हर नए आरोप के साथ सामाजिक नैतिकता की कसौटी पर वो लगातार कमज़ोर हो रहे थे.
इसकी आंच केंद्र सरकार तक पहुंचने लगी थी. जाते-जाते अकबर ने दोहराया है कि उन पर लगे आरोप झूठे हैं और वे अपनी लड़ाई व्यक्तिगत तौर पर जारी रखेंगे.
क्या अकबर ने इस्तीफ़ा देने में देर कर दी? उनके साथ एशियन एज में काम कर चुकीं वरिष्ठ पत्रकार सीमा मुस्ताफ़ा बताती हैं, "जब उन पर आरोप लगने शुरू हुए थे, तभी इस्तीफ़ा दे देते तो थोड़ी इज्जत बच सकती थी."
"लेकिन वो कोर्ट में लड़ने गए और उसके बाद जिस तरह से लोग सामने आए, उसके बाद उन्होंने इस्तीफ़ा दिया. उनके ख़िलाफ़ सिविल सेवा के अधिकारियों ने राष्ट्रपति तक को शिकायत की है."
क़ानूनी लड़ाई में नतीजा चाहे जो भी हो, लेकिन इस इस्तीफ़े के बाद अकबर अपने करियर के सबसे 'लो प्वाइंट' पर ज़रूर पहुंच गए हैं.
देवानंद के दीवाने अकबर
अकबर के जन्म से पहले एक ज्योतिषी ने उनके पिता से कहा था कि उनका बेटा काफ़ी मशहूर होगा.
बिहार से पश्चिम बंगाल जा कर बसे हिंदू से मुसलमान बने परिवार में 11 जनवरी, 1951 को जब उनका जन्म हुआ था तो पिता ने नाम रखा मुबाश्शिर, यानी ख़ुशख़बरी लाने वाला. लेकिन स्कूली मास्टर ने नाम लिखते वक़्त नाम कर दिया मोबाशर, मोबाशर जावेद अकबर.
इसका ज़िक्र अकबर ने बेहद चर्चित किताब 'ब्लड ब्रदर्स' में किया है, जो उनके परिवार की तीन पीढ़ियों की कहानी के साथ-साथ हिंदू-मुसलमान के आपसी संबंधों का दिलचस्प ताना-बाना है. इसी पुस्तक में एमजे अकबर ने बताया है कि "देवानंद उनके पसंदीदा अभिनेता रहे हैं."
देवानंद की फ़िल्म 'हम दोनों' का गाना - "मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुएं में उड़ाता चला गया...", अकबर का पसंदीदा गाना रहा है.
यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना करने से पहले अकबर अब तक तो हर फ़िक्र को धुएं में भले उड़ाते रहे हों, लेकिन इस बार उनके सामने चुनौती कहीं बड़ी है.
'ब्लड ब्रदर्स' में अकबर ने लिखा है कि 'गाइड' की वहीदा रहमान ने उन्हें प्रेम और व्याभिचार का पहला पाठ पढ़ाया था. ये फ़िल्म जब आई थी तब अकबर 14 साल के थे, उन्हें इस बात का दूर-दूर तक अहसास नहीं रहा होगा कि जबरन वाले व्याभिचार का घेरा उनके इर्द-गिर्द 67 साल की उम्र में जाकर कस जाएगा.
हालांकि इसी पुस्तक में उन्होंने एक पूरा चैप्टर बिकनी पर लिखा है कि किस तरह से 1967 का साल उन्होंने शर्मिला टैगोर की बिकनी देखकर काट लिया था. ये ही वही साल था जब 'एन इवनिंग इन पेरिस' फ़िल्म के रिलीज़ से पहले फ़िल्मफेयर के कवर पर शर्मिला की बिकनी में तस्वीर छपी थी.
अकबर ने पचास पैसे वाली मैगज़ीन पांच रुपए देकर ख़रीदी थी.
कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य की पढ़ाई पूरी करने के बाद एमजे अकबर ने पत्रकारिता में अपना करियर 1971 में टाइम्स समूह के ट्रेनी जर्नलिस्ट के तौर पर शुरू किया था.
महज दो सालों के अंदर एक फीचर राइटर के तौर पर वो ऐसे स्थापित हुए कि 'स्टारडस्ट' ने उन्हें अपनी पत्रिका का संपादक बना दिया, हालांकि वो मैग्ज़ीन निकली नहीं, इस दौरान वो 'ऑनलुकर' के संपादक रहे.
इतना ही नहीं टाइम्स समूह में पहले से काम कर रहीं मल्लिका जोसेफ़ से उनका प्यार भी परवान चढ़ा और दोनों ने 1975 में शादी भी कर ली.
इस शादी के बारे में एमजे अकबर ने सुरेंद्र प्रताप सिंह के निधन पर लिखे अपने लेख में बताया था कि एसपी जैसे दोस्तों की बदौलत शादी का जश्न 48 घंटे पहले शुरू हो गया था और उनके दोस्त नशे में भी शादी से जुड़े तमाम काम करते रहे थे. इन दोनों के दो बच्चे भी हैं- बेटा प्रयाग और बेटी मुकुलिका.
'संडे' की कमान
इसके बाद 1976 में वे कोलकाता पहुंचे 'आनंद बाज़ार' पत्रिका की समाचार मैगज़ीन संडे को शुरू करने. इस मैगज़ीन ने देखते-देखते अपनी खोजी ख़बरों और राजनीतिक विश्लेषणों के चलते सुर्खियां बटोरनी शुरू कर दीं. महज तीन साल के अंदर अकबर ने इसे भारत का नंबर वन वीकली बना दिया.
यही वजह है कि अकबर की एडिटरशिप की तारीफ़ करने वाले लोग अभी भी मौजूद हैं.
उनके साथ 'संडे' और 'टेलीग्राफ़' में लंबे समय तक काम कर चुके और 'संडे' के पूर्व संपादक शुभव्रत भट्टाचार्य कहते हैं, "मेरे ख्याल में अकबर जैसा इनोवेटिव एडिटर भारत में दूसरा नहीं हुआ है. देश की पत्रकारिता पर उस अकेले शख़्स का जितना योगदान है, उतना शायद ही किसी का होगा, आज अलग-अलग शहरों में उनसे तराशे गए लोग संपादक बने हुए हैं."
करियर के शुरुआती दिनों में उनकी दोस्ती टाइम्स समूह के उसी बैच के हिंदी पत्रकार सुरेंद्र प्रताप सिंह से हुई, जिसे बाद में अकबर ने 'संडे' के हिंदी संस्करण रविवार का संपादक बनाया था. एसपी सिंह के निधन के मौके पर लिखे अपने स्मरण लेख में अकबर ने दोनों की शुरुआती दोस्ती की कुछ बातें बताई थीं.
अकबर ने लिखा था, "जीवन थोड़ा बेहतर हुआ तो जुहू स्थित फ्लैट में रहना शुरू किया था. हमारे फ्लैट में ऐसे लोगों की काफ़ी आवाजाही थी जो स्लीपिंग बैग के साथ फ़िल्मों में संघर्ष करने आते थे."
"एसपी और मैंने अपने दो कमरों को हमेशा इन लोगों के लिए खुला रखा. हफ़्ते में एक दिन ज़रूर चिकन बनता और रम की क्वार्टर बोतल के साथ शुरू होती थी हमारी बौद्धिक कसरत."
हिंदी पत्रकारों की रिपोर्ट का अंग्रेज़ी में अनुवाद कराने का काम एमजे अकबर ने ही शुरू किया था, उनके जमाने में रविवार के रिपोर्टरों की ख़बर का अनुवाद संडे में छपा करता था.
इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में लंबे समय तक काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी कहते हैं, "अंग्रेज़ी पत्रकारों की रिपोर्ट का अनुवाद हिंदी मीडिया में होता रहा था, इस चलन को पहली बार अकबर ने ही बदला था और हम लोग देखते थे कि रविवार के रिपोर्टरों की ख़बरें संडे में छपती थीं."
'टेलीग्राफ़' से शिखर पर पहुंचे
'संडे' की कामयाबी को देखते हुए 'आनंद बाज़ार' पत्रिका समूह का अकबर पर भरोसा बढ़ता गया और 1982 में उन्होंने 'टेलीग्राफ़' के के रूप में भारत का पहला आधुनिक अख़बार शुरू किया. ये अख़बार अपने लेआउट और डिज़ाइन में एकदम नएपन से भरा था.
इस अख़बार की पहली बॉटम एंकर के बारे में शुभव्रत भट्टाचार्य बताते हैं, "जो पहला डमी अंक था, उसमें अकबर ने मुझे भेजकर एक ख़बर करवाई थी जो मेनका गांधी के लखनऊ में संजय राष्ट्र मंच के गठन वाले अधिवेशन से जुड़ी थी, उसकी टॉप लाइन थी इंदिरा गांधी के ख़िलाफ़ मेनका का बिगुल. अकबर ने डेस्क पर बैठे लोगों को बाइलाइन देने के चलन को ख़ूब बढ़ावा दिया."
'टेलीग्राफ़' ऐसा अख़बार था जिसके पहले पन्ने पर आधे पेज की फ़ोटो छपती थी, अकबर का एक कांट्रिब्यूशन ये भी रहा कि उन्होंने फ़ोटोग्राफरों को पत्रकारिता की मुख्यधारा में ला दिया.
इन सबके अलावा 'टेलीग्राफ़' में अकबर ने 600 शब्दों में बड़ी स्टोरी करने और 300 शब्दों में स्टोरी कराने का चलन शुरू किया था.
उस दौर में उनके साथ काम करने वाले कई पत्रकारों के मुताबिक़ अकबर अमूमन मीटिंग में कहा करते थे कि लोगों के पास 600 से ज़्यादा शब्द पढ़ने की फुरसत नहीं है और कहानी के शेष हिस्से को दूसरे पन्ने पर ले जाने पर उन्होंने पूरी तरह रोक लगा दी थी.
बतौर पत्रकार अकबर के करियर का एक शिखर तब आया जब उन्होंने दूरदर्शन पर 'न्यूज़लाइन' कार्यक्रम को होस्ट करना शुरू किया.
1986-87 के दौर में यह अपने तरह का बेहद चर्चित शो था, जिसमें अकबर किसी ना किसी केंद्रीय मंत्री को गेस्ट बनाते थे और आम लोग उनसे सीधे सवाल पूछते थे. इसी शो का हिंदी संस्करण विनोद दुआ 'जनवाणी' नाम से करते थे.
उस दौर को याद करते हुए क़मर वहीद नक़वी बताते हैं, "उस ज़माने में उस शो की बड़ी चर्चा रहती थी, केंद्रीय मंत्रियों को जिस तरह अकबर घेरते थे, वह देखने लायक होता था और आम आदमी मंत्रियों से सवाल-जवाब कर रहा है, इस पर तो विश्वास ही नहीं होता था."
ये वो दौर था जब एमजे अकबर राजीव गांधी के बेहद क़रीबी माने जाने लगे थे. उस दौर के बारे में राशीद किदवई बताते हैं, "अकबर उस ज़माने में राजीव की नज़रों में इसलिए भी उभरे थे, क्योंकि वे अपनी पत्रिकाओं और अख़बार में तो कांग्रेस की आलोचना करते रहते थे, लेकिन राजीव गांधी की हमेशा तारीफ़ किया करते थे."
जब राजनीति में क़दम रखा
उनके साथ एशियन एज में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई कहते हैं, "वे एक शानदार संपादक हैं, लेकिन उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी रहीं. सत्ता के ताक़तवर लोगों के बीच उनका उठना बैठना हमेशा रहा है और एक दिन वे राजनीति में चले गए."
कांग्रेस से बढ़ती नज़दीकी का ऐसा असर हुआ कि एमजे अकबर कांग्रेस के टिकट पर बिहार के किशनगंज से 1989 का चुनाव लड़े और मुस्लिम बहुल्य इलाक़े में अकबर 35 हज़ार वोटों से चुनाव जीतने में कामयाब रहे.
वो राजीव गांधी के प्रवक्ता भी रहे. हालांकि 1991 में उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा. बावजूद इसके सेक्युलर पॉलिटिक्स के चेहरों में एमजे अकबर का नाम शुमार होने लगा था.
ये वो दौर था जब अकबर पत्रकारिता से अलग राजनीति में और बतौर लेखक ख़ुद को स्थापित कर रहे थे. 1990 में 'नेहरू- द मेकिंग ऑफ़ इंडिया' और 1991 में प्रकाशित 'राइट ऑफ़्टर राइट' जैसी किताबों के जरिए वे बेस्टसेलर हो चुके थे.
लेकिन अकबर यहीं थमे नहीं, वे पत्रकारिता की दुनिया में लौटे. एक नए अख़बार के साथ. 1993 में उन्होंने दिल्ली से एक इंटरनेशनल स्तर का अख़बार एशियन एज शुरू किया. ये भारत का पहला अख़बार था, जिसका लंदन से एडिशन शुरू हुआ था.
'एशियन एज' का #Metoo कनेक्शन
अकबर पर जिन महिलाओं ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं, उनमें से ज़्यादातर 'एशियन एज' में ही काम करने वाली हैं.
यही वजह है कि 'एशियन एज' से पहले के ज़माने में उनके साथ कम कर चुके पत्रकारों के लिए ये सारे मामले अचरज पैदा करने वाले हैं.
शुभव्रत भट्टाचार्य कहते हैं, "जिस दौर में हमने अकबर के साथ काम किया था, उस ज़माने में कभी ऐसा मामला नहीं देखा. 'स्टारडस्ट' की जो न्यूज़ मैगज़ीन नहीं निकली उसमें अकबर का केबिन शोभा डे के साथ ही था, लेकिन वहां ऐसी कोई बात नहीं हुई. तवलीन सिंह और मधु जैन जैसी पत्रकार उस दौर में साथ में थीं. इन लोगों ने भी ऐसी कोई बात कभी नहीं कही."
'एशियन एज' के दौरान भी अकबर किस तरह की पत्रकारिता को बढ़ावा देते थे कि इसका ज़िक्र राशीद किदवई करते हैं, "1993 में जैन हवाला डायरी में अकबर का नाम था कि उन्होंने दस लाख रुपए लिए हैं. जिस दिन ख़बर ब्रेक हुई उस दिन वो शहर में नहीं थे तो एशियन एज में वो ख़बर नहीं छपी."
"अगले दिन आए तो भड़क गए कि ये ख़बर कहां हैं, तो उन्हें कहा गया कि आपका भी नाम था, तो वो बोले अरे तो क्या ख़बर नहीं छापोगे. वो बहुत नाराज़ हुए थे. ये उनका पैशन था ख़बरों के प्रति."
लेकिन इस दौर में अकबर में एक तरह का बदलाव भी लोग देखने लगे थे, ये बदलाव पावर कॉरिडोर के नेटवर्क के चलते ही आया था, उनके साथ काम कर चुके एक पत्रकार की मानें तो वो ये समझने लगे थे कि वो जो चाहेंगे, जैसा चाहेंगे वैसा हो सकता है, क्योंकि सिस्टम में हर जगह उनकी पहुंच है.
सीमा मुस्ताफ़ा 'एशियन एज' के उसी दौर को याद करते हुए कहती हैं, "सेक्सुअल असॉल्ट के हम लोग गवाह तो नहीं थे, लेकिन ऑफ़िस में एक तरह का माहौल था जो टॉक्सिक हो गया था, सब लोग इसके बारे में जानते थे, लेकिन उस वक़्त कोई ऐसी शिकायत लेकर सामने भी नहीं आता था."
2008 में अकबर 'एशियन एज' समूह को छोड़ना पड़ा और इसके बाद उन्होंने 2008 में ही 'कोवर्ट' मैगज़ीन शुरू की और 2010 में वीकली ब्रॉडशीट 'संडे गार्डियन' भी शुरू किया. 2010 में वे 'इंडिया टुडे' समूह के संपादकीय निदेशक बने.
लेकिन उनके करियर में अभी ऐसा टर्न आना था जो चौंकाने वाला था. 22 मार्च, 2014 को वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह उनके बीजेपी में आने की घोषणा करते हुए कहा था, "कहने की आवश्यकता नहीं है, जब भी आप कुछ लिखते हैं उसे देश ही नहीं विदेशों में भी पढ़ा जाता है."
अकबर पहले प्रवक्ता बनाए गए और बाद में मोदी सरकार में वे विदेश मामलों के जूनियर मंत्री बन गए. अकबर के बीजेपी में जाने को लेकर सीमा मुस्ताफ़ा कहती हैं, "अकबर ने अपने जीवन के 30-40 सालों में जो सेक्युलर डेमोक्रेसी और एंटी बीजेपी, एंटी आरएसएस वाली राजनीति की थी, उस सबको छोड़कर वो मंत्री बनने के लिए बीजेपी में चले गए."
हालांकि राशीद किदवई मानते हैं कि उनका बीजेपी प्रेम इतना नया भी नहीं था. उनके मुताबिक़ अकबर एक दौर में लालकृष्ण आडवाणी के पंडारा क्लब के भी नियमित सदस्य रहे हैं.
कुछ विश्लेषकों के मुताबिक़ मोदी सरकार में अकबर की मौजूदगी और उन पर लगे आरोपों पर सरकार की ओर से पहले बचाव की मुद्रा, इन सबके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल हैं, जिनसे अकबर के बहुत अच्छे संबंध रहे हैं.
हालांकि 20 महिलाओं के यौन उत्पीड़न आरोपों के दबाव के सामने ना तो डोभल से अच्छे संबंध काम आए और ना ही मोदी सरकार में इस्तीफ़े नहीं होते, का दावा टिक पाया.
उनके संपादन में काम कर चुके एक पत्रकार का कहना है, "काश वे राजनीति में कभी नहीं गए होते, राजनीति में जिस तरह की सुख सुविधाएं लोगों को मिल जाती हैं कि वो ख़ुद को सर्वेसर्वा समझने लगते हैं, ऐसा ही अकबर के साथ भी हुआ वरना वे एक जीनियस संपादक थे नहीं, हमेशा रहेंगे."
हालांकि उनकी पत्रकारिता पर कभी सवाल नहीं उठे हों ऐसा भी नहीं था.
पावर सेंटर रहे चरण सिंह हों या फिर राजीव गांधी रहे हों या फिर पीवी नरसिम्हाराव या नरेंद्र मोदी, इन लोगों की तारीफ़ अकबर करते रहे और जब ज़रूरत महसूस की गई तो सेंट किट्स कांड में वीपी सिंह की छवि को धूमिल भी कर दिया.
बाद में इस मामले में वीपी सिंह के ख़िलाफ़ कुछ भी सामने नहीं आया, लेकिन उनके बेटे अजेय सिंह के बहाने वीपी सिंह की राजनीतिक छवि को नुक़सान ज़रूर पहुंचा था. इस ख़बर को जिस तरह से प्लांट किया गया था उसमें टेलीग्राफ़ की भी अहम भूमिका रही थी.
हालांकि पहले ये ख़बर 20 अगस्त, 1989 को कुवैत के 'अरब टाइम्स' में छपी थी जिसे बाद में टेलीग्राफ़ ने प्रमुखता से जगह देनी शुरू की थी. यही वजह है कि राशीद किदवई कहते हैं कि सेंट किट्स प्रकरण में अकबर अकेले नहीं थे, कई और भी लोग थे.
अकबर को नज़दीक से जानने वाले लोगों के मुताबिक़ अकबर अब तक सेल्फ मेड शख्सियत रहे हैं, पढ़ने लिखने और देश दुनिया की राजनीतिक विमर्शों के प्रति उनमें दीवानगी का भाव रहा है.
लेकिन आज अकबर उस दरबार में खड़े हैं, जिसे ताक़त और रसूख के नशे में उन्होंने ख़ुद बनाया था और बहुत संभव है कि इस्तीफ़े के बाद वे ज़ौक़ की दो पंक्तियों को गुनगुना रहे हों-
"किस्मत (आदत कह सकते हैं) से ही लाचार हूं, ये ज़ौक़ वगरना
हर फ़न में हूं मैं ताक़, मुझे क्या नहीं आता. "
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