एम जे अकबर मामले में कांग्रेस उतनी आक्रामक क्यों नहीं?

मी टू

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

एक के बाद एक कई महिलाएं सामने आकर अपने साथ हुए शोषण के बारे में बता रही हैं और प्रताड़ित करने वालों का नाम उजाकर कर रही हैं. मगर इतनी आवाज़ों के बावजूद उत्पीड़न के अभियुक्तों पर कोई राजनीतिक दबाव नहीं बन पाया है.

लगभग सभी प्रमुख विपक्षी राजनीतिक दलों की चुप्पी से सामाजिक कार्यकर्ता और पीड़ित हैरानी में हैं.

मी टू में ज़्यादा रहस्योद्घाटन बॉलीवुड और मीडिया के लोगों के बारे में हुआ है. मीडिया में भी सबसे ज़्यादा आरोपों का सामना अगर किसी को करना पड़ा तो वो हैं पूर्व पत्रकार और केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर.

सोमवार को अकबर की तरफ से यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली अपनी पूर्व सहयोगी के ख़िलाफ़ अदालत में मानहानि का मामला दर्ज किया गया है.

कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी सोमवार को अकबर के सरकारी आवास के बाहर ज़ोरदार प्रदर्शन किया और उनके इस्तीफे की मांग की.

तो सवाल उठता है कि यह प्रदर्शन सिर्फ औपचारिक ही था या फिर कांग्रेस इस मामले को लेकर वाक़ई भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश को लेकर गंभीर है?

मैंने यह जानने के लिए कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी से बात की तो उन्होंने 'ज़्यादा कुछ' कहने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि वो अपनी बात सोशल मीडिया पर पहले ही कह चुकी हैं और उससे ज़्यादा कुछ और नहीं कहना चाहतीं.

दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के दतिया में एक सभा को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बलात्कार के आरोप में जेल में बंद भाजपा के विधायक की चर्चा तो की, मगर उन्होंने एमजे अकबर का एक बार भी नाम नहीं लिया और ना ही उनका इस्तीफ़ा माँगा.

अकबर साहब का क्या होगा?

एम जे अकबर

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मगर भारतीय जनता पार्टी के सांसद उदित राज अकबर के बचाव में आए और कहा कि बिना सबूत के इल्ज़ाम लगाना ठीक नहीं है. उनका कहना था, "पिछले दस साल या उससे भी ज़्यादा समय से ये महिलाएं अकबर के ख़िलाफ़ क्यों नहीं बोलीं. क्या इतने दिनों तक किसी ने उनकी कनपटी पर बंदूक़ तान रखी थी? अब अगर कल पता चलता है कि सभी आरोप निराधार हैं तो अकबर साहब का क्या होगा ? उनकी इज़्ज़त की तो धज्जियां उड़ गईं."

मगर जानकारों को लगता है कि दूसरे विपक्षी दलों की ख़ामोशी भी काफ़ी चौंकाने वाली है. ख़ासतौर पर वो दल जो बात बात पर भारतीय जनता पार्टी की आलोचना करते हैं, वो भी इस मामले में पूरी तरह चुप्पी साधे हुए हैं. खास तौर पर तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, बीजू जनता दल ( यूनाइटेड), समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी.

'हम्माम में सब एक जैसे'

आल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेंस एसोसिएशन की कविता कृष्णन कहती हैं कि 'हम्माम में सब एक जैसे' ही हैं. चाहे वो किसी भी राजनीतिक विचारधारा से क्यों ना हों. हर जगह एक जैसी कहानी है, इसलिए शायद नेता सामने आकर कुछ कहना नहीं चाहते.

विरोध प्रदर्शन

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बीबीसी से बात करते हुए कविता कहती हैं :"अकबर की तरफ़ से पत्रकार प्रिया रमणी के ख़िलाफ़ जो मानहानि का मामला दर्ज किया गया है, ये सिर्फ़ उन महिला पत्रकारों को धमकाने के लिए नहीं है जो उनके यानी अकबर के ख़िलाफ़ हिम्मत जुटाकर सामने आ रही हैं और अपनी आपबीती सुना रही हैं. ये उन तमाम महिलाओं के लिए धमकी है जिन्होंने बोलने का जोख़िम उठाया है. ये उन महिलाओं के लिए भी धमकी है जो शायद आगे आकर अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न को बयान करतीं."

हालांकि भाजपा के अंदर से कुछ आवाज़ें ज़रूर उठी हैं मगर वो उतनी शिद्दत के साथ नहीं जितनी कि उम्मीद की जा रही थी. मेनका गांधी और स्मृति इरानी ने बयान दिए, मगर बहुत संभलकर.

भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पार्टी के एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने जांच की मांग की और यह भी कहा कि अगर जांच नहीं होती है और अकबर अपने पद से इस्तीफा नहीं देते हैं तो भारतीय जनता पार्टी को आने वाले संसद के सत्र में सदस्यों को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा.

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