गिरफ़्तार लोग माओवादियों से सीधे संपर्क में थे: महाराष्ट्र पुलिस

वरवर राव

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महाराष्ट्र पुलिस ने कहा है कि उसके पास मंगलवार को छापेमारी के बाद गिरफ़्तार किए गए लोगों के ख़िलाफ़ पुख़्ता सबूत हैं.

ये हैं वामपंथी विचारक और कवि वरवर राव, वकील सुधा भारद्वाज, मानवाधिकार कार्यकर्ता अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस.

फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इन सभी लोगों को उनके घर में ही नज़रबंद रखा गया है. अब इस मामले की अगली सुनवाई छह सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में होगी.

मुंबई में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में महाराष्ट्र पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (लॉ एंड ऑर्डर) पीबी सिंह ने कहा कि जाँच से यह पता चला है कि माओवादी संगठन एक बड़ी साज़िश रच रहे थे.

उन्होंने कहा कि गिरफ़्तार किए गए लोग माओवादी संगठन को मदद पहुँचा रहे थे और सेंट्रल कमेटी के सदस्यों से लगातार संपर्क में थे.

पीबी सिंह ने दावा किया कि ईमेल में कई विस्फोटक जानकारियाँ सामने आई हैं, जिनमें हथियारों की सप्लाई, आर्थिक मदद की बात की गई है.

सुधा भारद्वाज (बाएं)

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इमेज कैप्शन, सुधा भारद्वाज (बाएं) द्वारा सेंट्रल कमिटी को लिखे गए पत्र को भी जारी किया गया है

'अलगाववादियों से भी संपर्क'

कई पत्रों को मीडिया के सामने पढ़ते हुए पीबी सिंह ने बताया कि वह कुछ ही पत्रों का यहां ज़िक्र करेंगे जिसमें सीधे माओवादी सेंट्रल कमेटी से संपर्क किया गया.

उन्होंने बताया कि माओवादी की सेंट्रल कमेटी की ओर से इन लोगों से कॉमरेड प्रकाश (असली नाम ऋतुपर्ण गोस्वामी) बात करते थे. उनका कहना है कि ये लोग माओवादियों के साथ-साथ कश्मीर में अलगाववादियों के साथ भी संपर्क में थे.

भीमा कोरेगांव हिंसा में पहले ही गिरफ़्तार किए जा चुके रोना विल्सन और सुरेंद्र गाडलिंग का भी ज़िक्र पीबी सिंह ने किया.

उन्होंने ख़ास तौर पर रोना विल्सन के एक ईमेल का ज़िक्र किया, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर राजीव गांधी जैसी घटना के बारे में कहा था.

उन्होंने बताया कि रोना विल्सन के लैपटॉप से रूसी और चीनी हैंड ग्रेनेड के कैटेलॉग मिले हैं और इनको ख़रीदा जाना था. इन हथियारों की ख़रीद वरवर राव के ज़िम्मे थी. पीबी सिंह ने कहा कि यह अभी साफ़ नहीं है कि वह कितने हथियार ख़रीद पाए या नहीं. इसके लिए उनकी पुलिस हिरासत की आवश्यकता है.

महाराष्ट्र पुलिस के एडीजी ने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट उन्हें गिरफ़्तार लोगों का रिमांड देगा ताकि उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए.

पुलिस अधिकारी गिरफ़्तार लोगों को 'माओवादी हिंसा का दिमाग़' बता रहे हैं. पुलिस का ये भी कहना है कि भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा के लिए भी इन लोगों की भूमिका की जाँच की जा रही है.

पुलिस का आरोप है कि 31 दिसंबर 2017 को भीमा कोरेगाँव में भड़काने वाले भाषण दिए गए थे. इस मामले में आठ जनवरी को केस दर्ज किया गया था. पीबी सिंह ने कहा कि गिरफ़्तार लोग कबीर कला मंच से जुड़े हुए हैं.

गौतम नवलखा

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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि गिरफ़्तार किए गए पाँचों लोगों को फ़िलहाल रिमांड पर नहीं भेजा जाएगा.

इतिहासकार रोमिला थापर, प्रभात पटनायक, सतीश देशपांडे, देवकी जैन और माया दारुवाला की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार को नोटिस जारी किया है. इस मामले की अगली सुनवाई छह सितंबर को होगी.

इन लोगों की ओर से पेश हुए वकील प्रशांत भूषण ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "जस्टिस वाईएस चंद्रचूड़ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ये बहुत दुर्भाग्य की बात है. ऐसे लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है. जो दूसरों के अधिकार की बचाने की कोशिश कर रहे हैं, उनका मुँह बंद करना चाहते हैं. ये लोकतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक है."

वरिष्ठ वकील वृंदा ग्रोवर के मुताबिक़ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि विरोध की आवाज़ लोकतंत्र के लिए सेफ़्टी वॉल्व है और अगर आप सेफ्टी वाल्व को अनुमति नहीं देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएगा.

भाजपा का रुख़

भारतीय जनता पार्टी ने गिरफ़्तारी के फ़ैसला का बचाव किया है. पार्टी प्रवक्ता संबित पात्रा ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बयान की आलोचना की.

उन्होंने कहा, "ये दुःख का विषय है कि राहुल गांधी जी नक्सलियों को मानवाधिकार कार्यकर्ता मानते हैं, जो लोग दूसरों का खून बहाते हैं वो कैसे मानवाधिकार कार्यकर्ता हो सकते हैं यह सोचने का विषय है. जब नक्सलियों को आप गिरफ्तार करते हैं, तो वो नक्सली हैं और जब हम गिरफ्तार करते हैं तो वे मानवाधिकार के लिए काम करने वाले हैं."

बीजेपी प्रवक्ता ने वरवर राव और वरनॉन गोंज़ाल्विस का उदाहरण देते हुए कहा कि इन दोनों की गिरफ़्तारी कांग्रेस के समय में हुई थी और उन्हें जेल भी भेजा गया था.

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा था, "भारत में सिर्फ़ एक एनजीओ के लिए जगह है और इसका नाम है आरएसएस. बाकी सभी एनजीओ बंद कर दो. सभी ऐक्टिविस्टों को जेल में भेज दो और जो लोग शिक़ायत करें उन्हें गोली मार दो. न्यू इंडिया में आपका स्वागत है."

भीमा कोरेगांव

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क्या हुआ था भीमा कोरेगाँव में

पिछले साल 31 दिसंबर को यलगार परिषद का आयोजन किया गया था. इस परिषद में माओवादियों की कथित भूमिका की जांच में लगी पुलिस ने कई राज्यों में सात कार्यकर्ताओं के घरों पर छापेमारी की और पांच कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार कर लिया गया.

इस परिषद का आयोजन पुणे में 31 दिसंबर 2017 को किया गया था और अगले दिन 1 जनवरी को भीमा कोरेगांव में दलितों को निशाना बनाकर बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी. महाराष्ट्र में पुणे के क़रीब भीमा कोरेगांव गांव में दलित और अगड़ी जाति के मराठाओं के बीच टकराव हुआ था.

भीमा कोरेगांव में दलितों पर हुए कथित हमले के बाद महाराष्ट्र के कई इलाकों में विरोध-प्रदर्शन किए गए. दलित समुदाय भीमा कोरेगांव में हर साल बड़ी संख्या में जुटकर उन दलितों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने 1817 में पेशवा की सेना के ख़िलाफ़ लड़ते हुए अपने प्राण गंवाए थे.

ऐसा माना जाता है कि ब्रिटिश सेना में शामिल दलितों (महार) ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों (पेशवा) को हराया था. बाबा साहेब आंबेडकर खुद 1927 में इन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने वहां गए थे.

कार्रवाई

वरवर राव, सुधा भारद्वाज, अरुण फ़रेरा, गौतम नवलखा और वरनॉन गोंज़ाल्विस के ख़िलाफ़ UAPA या अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट के तहत कार्रवाई की गई.

1967 में ये कानून पेश किया गया था जिसका मक़सद 'भारत की अखंडता और संप्रभुता की रक्षा है.' इसके तहत पुलिस 'आतंकी गतिविधियों या गैरकानूनी हरकतों का साथ देने वालों' को बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है या उनके यहां छापेमारी कर सकती है.

छापे के दौरान कोई भी अधिकारी कोई भी सामान ज़ब्त कर सकता है. जिस पर आरोप लगा है, वो ज़मानत के लिए आवेदन नहीं कर सकता और पुलिस के पास चार्जशीट दाख़िल कराने के लिए 90 के बजाय 180 दिनों का वक़्त होता है.

संविधान के आर्टिकल 22 में हिरासत में लिए गए या गिरफ़्तार किए गए व्यक्ति के अधिकारों का ज़िक्र है. पहला, जैसे ही किसी व्यक्ति को हिरासत में लिया जाता है, उसे इसका कारण बताया जाता है.

हिरासत में लिए जाने या गिरफ़्तारी के 24 घंटों के भीतर अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होता है. साथ ही पैरवी करने के लिए वक़ील की सेवाएं लेने का अधिकार भी दिया गया.

अरुण फ़रेरा

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जो फ़िलहाल घर में हैं नज़रबंद

गौतम नवलखा: मशहूर ऐक्टिविस्ट हैं, जिन्होंने नागरिक अधिकार, मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकार के मुद्दों पर काम किया है. वे अंग्रेज़ी पत्रिका इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली (ईपीडब्ल्यू) में सलाहकार संपादक के तौर पर भी काम करते हैं.

सुधा भारद्वाज: वकील और ऐक्टिविस्ट हैं. दिल्ली के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में गेस्ट फ़ैकल्टी के तौर पर पढ़ाती हैं. सुधा ट्रेड यूनियन में भी शामिल हैं और मज़दूरों के मुद्दों पर काम करती हैं.

वरवर पेंड्याला राव: वामपंथ की तरफ़ झुकाव रखने वाले कवि और लेखक हैं. वो 'रेवोल्यूशनरी राइटर्स असोसिएशन' के संस्थापक भी हैं. वरवर वारंगल जिले के चिन्ना पेंड्याला गांव से ताल्लुक रखते हैं.

अरुण फ़रेरा: मुंबई के बांद्रा में जन्मे अरुण फ़रेरा मुंबई सेशंस कोर्ट और मुंबई हाई कोर्ट में प्रैक्टिस करते हैं. वो अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट और देशद्रोह के अभियोग में चार साल जेल में रह चुके हैं.

वरनॉन गोंज़ाल्विस: मुंबई में रहने वाले वरनॉन गोंज़ाल्विस लेखक-कार्यकर्ता हैं. वो मुंबई विश्वविद्यालय से गोल्ड मेडलिस्ट हैं और मुंबई के कई कॉलेजों में कॉमर्स पढ़ाते रहे हैं. उन्हें 2007 में अनलॉफ़ुल एक्टिविटीज़ प्रिवेंशन एक्ट के तहत गिरफ़्तार किया गया था. वो छह साल तक जेल में रहे थे.

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