चेनाब नदी पर भारत के बांध से पाकिस्तान चिंतित क्यों?

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- Author, टीम बीबीसी हिन्दी
- पदनाम, दिल्ली
पाकिस्तान ने भारत में चेनाब नदी पर बन रही दो परियोजनाओं में से एक पर आपत्ति जताई है.
भारत चेनाब पर पनबिजली परियोजना के लिए दो बांध बना रहा है- 48 मेगावाट क्षमता की लोअर कालनाई और 1,500 मेगावाट क्षमता का पाकल दुल. पाकिस्तान पाकल दुल बांध को लेकर चिंतित है और आरोप लगा रहा है कि यह सिंधु जल समझौते का उल्लंघन है.
पाकिस्तान के अनुसार पाकल दुल बांध की ऊंचाई 1,708 मीटर हो सकती है, जिससे पाकिस्तान में आने वाले पानी की मात्रा कम हो सकती है. पाकिस्तान का कहना है कि इससे भारत अपनी इच्छासनुसार पानी रोकने या छोड़ने में सक्षम हो जाएगा.

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सिंधु जल समझौते के अनुसार भारत अगर चेनाब पर बांध बनाने की योजना बनाता है, तो उसे काम शुरू करने से क़रीब छह महीने पहले पाकिस्तान को इसके बारे में जानकारी देनी होगी.
सिंधु जल समझौते से जुड़े मुद्दों पर बातचीत करने के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल फिलहाल पाकिस्तान के लाहौर में है. नदी जल बंटवारे को ले कर दोनों देशों के बीच ये 115वीं द्विपक्षीय वार्ता है.
इस दो दिवसीय वार्ता में नौ सदस्यीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाटर कमिश्नर पीके सक्सेना कर रहे हैं. पाकिस्तान की तरफ से प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व वाटर कमिश्नर सैयद मेहर अली शाह कर रहे हैं.
इससे पहले इसी साल 20-30 मार्च को भारत में दोनों पक्षों के अधिकारियों ने मुलाक़ात की थी.



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कैसे हुआ था सिंधु जल समझौता?
सिंधु जल संधि को दो देशों के बीच जल विवाद पर एक सफल अंतरराष्ट्रीय उदाहरण बताया जाता है.
बंटवारे के बाद सिंधु घाटी से गुजरने वाली छह नदियों पर नियंत्रण को लेकर उपजे विवाद की मध्यस्थता विश्व बैंक ने की थी.
1960 में भारत और पाकिस्तान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. इसके अनुसार समझौते के तहत क्षेत्र की तीन नदियों के पानी पर भारत का नियंत्रण होगा, जबकि तीन नदियों- सिंधु, झेलम और चेनाब के बहाव पर पाकिस्तान का नियंत्रण होगा. ये नदियों का पानी प्राकृतिक रूप से पाकिस्तान की ओर ही बहता है.
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अमरीका की ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर इस समझौते की पीछे की कहानी है. ऐरॉन वोल्फ़ औऱ जोशुआ न्यूटन अपनी केस स्टडी में बताते हैं कि ये झगड़ा 1947 भारत के बंटवारे के पहले से ही शुरू हो गया था, खासकर पंजाब और सिंध प्रांतों के बीच.
1947 में भारत और पाकिस्तान के इंजीनियर मिले और उन्होंने पाकिस्तान की तरफ़ आने वाली दो प्रमुख नहरों पर एक 'स्टैंडस्टिल समझौते' पर हस्ताक्षर किए जिसके अनुसार पाकिस्तान को लगातार पानी मिलता रहा. ये समझौता 31 मार्च 1948 तक लागू था.

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सिंधु बेसिन ट्रीटी पर 1993 से 2011 तक पाकिस्तान के कमिश्नर रहे जमात अली शाह के अनुसार 1 अप्रैल 1948 को जब समझौता लागू नहीं था, तो भारत ने दो प्रमुख नहरों का पानी रोक दिया जिससे पाकिस्तानी पंजाब की 17 लाख एकड़ ज़मीन पर हालात खराब हो गए.
भारत के इस कदम के कई कारण बताए गए जिसमें एक था कि भारत कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान पर दबाव बनाना चाहता था. बाद में हुए समझौते के बाद भारत पानी की आपूर्ति जारी रखने पर राज़ी हो गया.
स्टडी के मुताबिक 1951 में प्रधानमंत्री नेहरू ने टेनसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलियंथल को भारत बुलाया. लिलियंथल पाकिस्तान भी गए और वापस अमरीका लौटकर उन्होंने सिंधु नदी के बंटवारे पर एक लेख लिखा.
ये लेख विश्व बैंक प्रमुख और लिलियंथल के दोस्त डेविड ब्लैक ने भी पढ़ा और ब्लैक ने भारत और पाकिस्तान के प्रमुखों से इस बारे में संपर्क किया. और फिर शुरू हुआ दोनो पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला.
ये बैठकें करीब एक दशक तक चलीं और आखिरकार 19 सितंबर 1960 को कराची में सिंधु नदी समझौते पर हस्ताक्षर हुए.
भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब ख़ान ने दस्तख़त किया था.
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सिंधु जल समझौते की प्रमुख बातें
- समझौते के अंतर्गत सिंधु नदी की सहायक नदियों को पूर्वी और पश्चिमी नदियों में विभाजित किया गया. सतलज, ब्यास और रावी नदियों को पूर्वी नदी बताया गया जबकि झेलम, चेनाब और सिंधु को पश्चिमी नदी बताया गया.
- समझौते के मुताबिक पूर्वी नदियों का पानी, कुछ अपवादों को छोड़े दें, तो भारत बिना रोकटोक के इस्तेमाल कर सकता है. पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के लिए होगा लेकिन समझौते के भीतर इन नदियों के पानी का कुछ सीमित इस्तेमाल का अधिकार भारत को दिया गया, जैसे बिजली बनाना, कृषि के लिए सीमित पानी. अनुबंध में बैठक, साइट इंस्पेक्शन आदि का प्रावधान है.
- समझौते के अंतर्गत एक स्थायी सिंधु आयोग की स्थापना की गई. इसमें दोनो देशों के कमिश्नरों के मिलने का प्रस्ताव था. ये कमिश्नर हर कुछ वक्त में एक दूसरे से मिलेंगे और किसी भी परेशानी पर बात करेंगे.
- अगर कोई देश किसी प्रोजेक्ट पर काम करता है और दूसरे देश को उसकी डिज़ाइन पर आपत्ति है तो दूसरा देश उसका जवाब देगा, दोनो पक्षों की बैठकें होंगी. अगर आयोग समस्या का हल नहीं ढूंढ़ पाती हैं तो सरकारें उसे सुलझाने की कोशिश करेंगी.
- इसके अलावा समझौते में विवादों का हल ढूंढने के लिए तटस्थ विशेषज्ञ की मदद लेने या कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन में जाने का भी रास्ता सुझाया गया है.


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