क्या अंधविश्वास से लड़ना ही नरेंद्र दाभोलकर की ग़लती थी?

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- Author, अभय नवेगी
- पदनाम, दाभोलकर परिवार के वकील
शरीर को ऑक्सीज़न की जितनी जरूरत होती है उतनी ही लोकतंत्र को मौलिक अधिकारों की. इन मौलक अधिकारो में प्रमुख है अपनी बात रखने की आज़ादी.
मौलिक अधिकारों के लिए न्यायपालिका का सत्ता पर बैठे लोगों के साथ किया संघर्ष न्यायिक लड़ाइयों में एक अहम विषय रहा है. मौलिक अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, ये दोनों ही लोकतंत्र की नींव हैं.
अगर इस नींव पर प्रहार हुआ तो पूरा लोकतंत्र ढह सकता है. संविधान निर्माताओं ने संविधान बनाते वक़्त ये बताया था कि अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता इतनी महत्वपूर्ण क्यों है.
भारत में मौलिक अधिकार रोज़मर्रा की ज़िंदगी का अभिन्न अंग बने हुए हैं.
डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या को 20 अगस्त 2018 को पांच साल पूरे हो गए हैं. हमारे देश में पूरे षड्यंत्र के तहत एक के बाद एक चार लोगों की हत्या हुई.

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उनका क्या दोष था?
उनका क्या दोष था? उनका दोष ये था कि वो क़ानून की चौखट पर सही बातों को लोगों के सामने रख रहे थे. कुछ लोगों को जब उनकी ये भूमिका पसंद नहीं आई तो उन्होंने विचारों का मुकाबला करने की बजाय उनपर गोलियां चला दी.
हाल ही में पुलिस ने कुछ लोगों को इस हत्या के आरोप में गिरफ़्तार किया है. भारत जैसा देश जो विश्व को एक न्यायपूर्ण देश होने का उदाहरण देता रहा है, ऐसे देश में इस एक मामले को सुलझाने में पांच साल लगते हैं, यह दुख की बात है.
बड़े दुख की बात है कि विश्व के प्रमुख देशों में से एक माने जाने वाले हमारे देश के पास ऐसे गुनहगारों को खोजने के लिए कोई ऐसी आधुनिक व्यवस्था नहीं है.

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दाभोलकर मामले में सीबीआई हाईकोर्ट को बताती है कि जो गोलियां दागी गई हैं, उन्हें जांच के लिए स्कॉटलैंड यार्ड के पास भेजा जाएगा. कुछ महीनों बाद न्यायालय को बताया जाता है कि दोनों देशों में इस बात पर कोई करार न होने की वजह से गोलियों की जांच गुजरात में होगी.
डॉक्टर दाभोलकर की हत्या की जांच हाईकोर्ट की निगरानी में शुरू हुई. इसमें अब तक 18 बार मुक़दमे की तारीखें पड़ चुकी हैं, 125 से ज़्यादा पन्नों का ऑर्डर हो चुका है. लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला है.
हाईकोर्ट ने जांच को लेकर अपना असंतोष बार-बार जाहिर किया है. वरिष्ठ अधिकारियों को कोर्ट ने तलब किया है, लेकिन जांच अब भी पूरे मामले को उजागर कर पाई, ऐसा नहीं कह सकते.

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अदालत के आदेश पर भी ग़ौर नहीं
इस मामले में कोर्ट के आदेश पर भी ग़ौर नहीं किया जाता, ये लोकतंत्र का मज़ाक उड़ाने जैसा है. आम लोगों की रक्षा करना पुलिस का कर्तव्य है.
ऐसा भी कहा जा सकता है कि का आदर्श वाक्य (Motto) 'सदरक्षणाय खलनिग्रहणाय' सिर्फ़ दीवार पर टांगने भर को रह गया है.
देश में छोटी-छोटी बातों पर क़ानून हाथ में लिया जाता है. देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई से ख़बर आती है कि किसी ख़ास विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने के लिए तैयार किए गए बमों का ज़खीरा बरामद हुआ है.

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युवाओं को इस ख़ास विचारधारा से प्रेरित करके उन्हें ग़ुनाह करने के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया जाता है. इन विचारों को समर्थन देने वाले लोगों को सामाजिक मान्यता देने की पुरज़ोर कोशिश है. पुलिस दबाव में है. जांच करने वाले अधिकारियों की सोशल मीडिया पर निंदा करके उन पर दबाव बनाया जाता है.
लोकतंत्र का स्तंभ माने जाने वाले मीडिया पर दबाव बनाया जा रहा है. अगर लोकतंत्र को बचाना है तो न्यायपालिका अकेले कुछ नहीं कर सकती. हो सकता है कि न्यायपालिका कमज़ोर हो जाए. अगर न्यायपालिक कमज़ोर होती है तो देश में क़ानून का राज्य नहीं रहेगा.
अगर लोकतंत्र को ज़िंदा रखना है तो विचारों का मुकाबला बंदूक़ की गोली से करने वालों पर ठोस कार्रवाई करनी होगी, उनका विरोध करना होगा. उनकी प्रवृत्तियों के लिए यही जवाब होगा.

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कौन थे नरेंद्र दाभोलकर
डॉक्टर नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर का जन्म एक नवंबर 1945 में महाराष्ट्र के सतारा ज़िले में हुआ था.
एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद डॉक्टर बनने की बजाए उन्होंने ख़ुद को सामाजिक कार्यों में लगाया.
साल 1982 से वो अंधविश्वास निर्मूलन आंदोलन में पूरी तरह से जुट गए थे. साल 1989 में उन्होंने महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना की. यह संस्था किसी भी तरह के सरकारी अथवा विदेशी सहायता के बिना काम करती है.
हालांकि कई कट्टर दक्षिणपंथी संगठन उन्हें हिंदूविरोधी मानते थे. अगस्त, 2013 में दो अज्ञात बंदूकधारियों ने उनकी उस वक़्त गोली मारकर हत्या कर दी थी, जब वो सुबह टहल रहे थे.
(नरेंद्र दाभोलकर की हत्या को आज 5 साल पूरे हुए. उनकी हत्या के बाद गोविंद पानसरे और कर्नाटक में प्रोफ़ेसर एमएम कलबुर्गी और पत्रकार गौरी लंकेश की हत्याएं हुईं. इसी विषय पर दाभोलकर परिवार के वकील अभय नेवगी ने यह लेख लिखा है. ये उनके निजी विचार हैं.)
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