20 रुपये में झाड़ू-पोछा करने को मजबूर 71 साल की ताजा बेगम

ताजा बेगम

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    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

बीस रुपये महीने की सैलरी पर कोई कैसे काम कर सकता है, और वो भी एक सरकारी स्कूल में?

आप शायद यक़ीन न करें पर एक बार ताजा बेगम से पूछ लीजिए. उनकी उम्र 71 साल हो चुकी है.

वो बीते 36 सालों से भारत प्रशासित कश्मीर के कुलगाम ज़िले के गार्ड हांजी गांव के एक सरकारी प्राइमरी स्कूल में काम कर रही हैं.

ताजा बेगम यहां साल 1982 में बतौर स्वीपर बहाल हुई थीं.

उनकी बहाली की चिट्ठी में लिखा है कि ताजा बेगम को CPW यानी 'कंटींजेंट पेड वर्कर' के रूप में बहाल किया जा रहा है और हर महीने उन्हें स्कूल लोकल फ़ंड से दस रुपया दिया जाएगा.

क़िस्मत नहीं बदली

ताजा बेगम हर दिन स्कूल जाकर साफ़-सफ़ाई का काम करती हैं.

पूरी ज़िंदगी स्कूल में झाड़ू-पोंछा करने के बाद उन्हें इस बात का इंतज़ार है कि बुढ़ापे में कुछ तो मुआवज़ा मिलेगा.

ताजा बेगम

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वो कहती हैं, "मैंने पूरी ज़िंदगी स्कूल की गर्द खाई है. अब बीमार रहने लगी हूं. खांसी की मरीज़ बन गई हूं. दुनिया बदल गई, लेकिन मेरी क़िस्मत नहीं बदली. मुझे आज भी वही 20 रुपया मिलता है. जब मैंने स्कूल में स्वीपर के तौर पर काम शुरू किया था तो उस वक्त मुझे एक रुपये की तनख्वाह दी जाती थी."

ताजा बेगम कहती हैं कि जो 20 रुपया उन्हें स्कूल से मिलता है, उस पैसे से तो वो दवाई भी नहीं खरीद पाती हैं.

ताजा बेगम की कहानी

ताजा बेगम बताती हैं, "पहले मुझे यहां एक रुपया मिलता था, फिर पांच रुपये मिलने लगे, फिर दस और अब बीस रुपया मिलता है. मुझे ख़ुद ही स्कूल के लिए झाड़ू भी खरीदना पड़ता है."

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इमेज कैप्शन, स्कूल परिसर में झाड़ू लगातीं ताजा बेगम

उन्होंने कहा, "मैं अपने लिए कपड़े भी नहीं ख़रीद सकती हूँ और न कोई चीज़. कभी मेरी भी ख़्वाहिश होती है, कोई अच्छी चीज़ खाऊं, लेकिन मेरे पास पैसे नहीं होते. कभी दिल ही दिल में सोचती हूँ कि मैं अपने लिए गोश्त खरीदूं पर मेरे पास पैसे नहीं होते. ज़िंदगी इस स्कूल के लिए लगा दी, लेकिन हासिल कुछ भी नहीं हुआ. कई बार अपनी फ़ाइल लेकर शिक्षा विभाग गई, लेकिन वहां सिर्फ़ एक ही जवाब मिलता है - 'देखते हैं' और 'आपका काम हो जाएगा'."

ताजा बेगम के पति और बेटे का बहुत पहले निधन हो गया था. अब वह बेटी के घर में रहती हैं.

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इमेज कैप्शन, ताजा बेगम के पेमेंट का रिक़र्ड

ताजा बेगम को जो पैसा मिलता है वह स्कूल में उनको नकदी दिया जाता है.

स्कूल की प्रिंसिपल का कहना है कि ताजा बेगम की सैलरी का पैसा स्कूल के लोकल फ़ंड से आता है. जुलाई, 2018 में उन्हें 45 रुपया दिया गया है.

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प्रिंसिपल मारूफ़ जान कहती हैं, "बीते बारह सालों से मैं यहां काम कर रही हूँ. ताजा बेगम यहां बराबर सफ़ाई का काम करती रही हैं. वो हर दिन स्कूल आती हैं. हम उनको स्कूल के लोकल फ़ंड से पैसे देते हैं. उनकी सैलरी इस बात पर निर्भर करती है कि हमारे स्कूल में कितने बच्चों का दाखिला होगा."

ज़िला कुलगाम के डिप्टी एजुकेशन ऑफ़िसर बशीर अहमद कहते हैं कि 'हमारी नोटिस में ये मामला आने के बाद विभाग ने फ़ैसला किया है कि ताजा बेगम की सैलरी बढ़ा दी जाएगी.'

सैलरी बढ़ी

उप शिक्षा पदाधिकारी बशीर अहमद ने बताया, "दरअसल ताजा बेगम के पैसे बढ़ाने में इतना समय इसलिए लगा क्योंकि हमारे पास उस गांव में स्कूल के लिए कोई प्रॉपर बिल्डिंग नहीं थी. हमने गांव वालों से कई बार कहा कि स्कूल के लिए ज़मीन मुहैया की जाए, लेकिन किसी ने ज़मीन नहीं दी. जो स्कूल हमारे पास वहां है, वह एक खस्ताहाल कमरे जैसा है."

चिट्ठी

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वो कहते हैं, "ताजा बेगम हमारे पास आज तक कभी आई भी नहीं. अब हमने उनके पैसे बढ़ा दिए हैं. अब हमने ये रकम 500 रुपये कर दी है."

हालांकि ताजा बेगम को अभी तक ये बढ़ी हुई सैलरी मिलनी शुरू नहीं हुई है.

'कुछ हासिल नहीं हुआ'

इसी गांव के रहने वाले मोहम्मद यूसुफ़ कहते हैं कि 'जबसे ये स्कूल बना है तब से ताजा बेगम को हम यहां झाड़ू लगाते देख रहे हैं.'

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इमेज कैप्शन, अपनी बेटी शहज़ादी के साथ ताजा बेगम

ताजा बेगम की बेटी शहज़ादी कहती हैं कि अम्मी लंबे समय से स्कूल में सफ़ाई का काम कर रही हैं, लेकिन आज तक उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ.

उन्होंने कहा, "मेरी माँ का इस दुनिया में कोई सहारा नहीं है. गर्द साफ़ करने से वो बीमार भी हो गई हैं. कभी-कभी उनके लिए तमाम दवाइयां भी लानी पड़ती है. जो 20 रुपया मिलता है, वह अफ़सरों के पास जाने के लिए किराये में खर्च हो जाता है. आने के दस और जाने के दस. घर तो खाली हाथ वापस लौटती हैं."

अली मोहम्मद लोन की कहानी

जो कहानी ताजा बेगम की है, वही अली मोहम्मद लोन की भी है.

अली मोहम्मद लोन

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इमेज कैप्शन, अली मोहम्मद लोन

उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा ज़िले के चौकीबल के जूणीऋषि प्राइमरी स्कूल में 70 वर्षीय लोन साल 1982 से चपरासी के तौर में काम कर रहे हैं.

उन्हें तबसे सिर्फ़ 55 रुपये सैलरी मिल रही है. शिक्षा विभाग से मिलने वाली ये सैलरी उनके बैंक खाते में आती है.

अली का कहना है कि स्कूल के लिए उन्होंने अपनी ज़मीन भी दी, लेकिन उसके बावजूद उनकी तनख़्वाह बढ़ाई नहीं गई.

अली मोहम्मद लोन

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वो कहते हैं, "आप ख़ुद सोच सकते हैं कि इस पैसे का में क्या कर सकता हूँ? कोई मेरी फ़रियाद नहीं सुन रहा है. मैंने अफ़सरों को कई बार अपनी इस हालत के बारे में कहा, लेकिन हुआ कुछ भी नहीं. मेरी ज़िंदगी भी जाया हो गई और मेरी ज़मीन भी. जब कमाने का समय था तब मैं इसी खुशफहमी में रहा कि मेरी तनख़्वाह बढ़ा दी जाएगी, लेकिन आज तक ऐसा नहीं हुआ."

उन्होंने कहा, "मैंने शिक्षा विभाग वालों से कहा था कि या तो इस तनख़्वाह पर आपको शर्म आनी चाहिए या मुझे आनी चाहिए."

अली मोहम्मद लोन

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इमेज कैप्शन, अली मोहम्मद लोन के पासबुक की कॉपी

अली मोहम्मद की तनख़्वाह क्यों नहीं बढ़ी?

इस सवाल पर कुपवाड़ा के चीफ एजुकेशन अफ़सर मोहम्मद शफी वार का कहना था, "ये लोग कंटींजेंट पेड वर्कर होते हैं. जो भी पैसा स्कूल में बच्चों के दाखिले और फ़ीस से जमा होता है, उसी पैसे में से इनको भी दिया जाता है."

उन्होंने कहा, "ये सैलरी नहीं होती है. 55 रुपया कोई सैलरी नहीं होती है. ये तो इस बात पर निर्भर करता है कि स्कूल के पास पैसा कितना है. अब इन कंटींजेंट पेड वालों का एक फ़ायदा ये होता है कि सीनियोरिटी की बुनियाद पर हम ऐसे लोगों को कन्फ़र्म करते हैं."

सवाल और भी हैं...

70 साल के व्यक्ति को सरकार ने कैसे नौकरी पर रखा है? इसके जवाब में मोहमद शफ़ी वार कहते हैं, "ये तो सही है कि नहीं रख सकते हैं. हम इसमें देखते हैं कि क्या कर सकते हैं."

अली मोहम्मद की तरफ़ से स्कूल के लिए दी गई ज़मीन के बारे उनका कहना था, "स्कूल के लिए ज़मीन दान देने पर मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है."

लेकिन मोहम्मद लोन का दावा है कि उन्हें ज़मीन देने के एवज में नौकरी का वादा किया गया था.

इस बात पर मोहम्मद शफ़ी कहते हैं, "हमने ऐसे सभी मामले अपने ज़ोनल एजुकेशन कार्यालयों को भेजे हैं. हम ऐसे सारे मामले देख रहे हैं."

जम्मू और कश्मीर लेबर एंड एम्प्लॉयमेंट विभाग की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक़ स्किल्ड मज़दूरों को एक दिन का 225 रुपया दिया जाता है.

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