जब देश का कर्ज़ उतारने के लिए लोगों ने दिया सोना

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मई 2018 का आखिरी हफ़्ता
पूरी दुनिया उत्तर और दक्षिण कोरिया के नेताओं के बीच दूसरी मुलाक़ात के मायने तलाश रही थी लेकिन कोरियाई पॉप के दीवाने एक अलग इतिहास रचे जाने की खुशी में डूबे थे.
उस हफ़्ते दक्षिण कोरिया के पॉप ग्रुप बीटीएस का म्यूजिक एल्बम अमरीकी पॉपुलरिटी चार्ट में पहले नंबर पर था.

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बीते 12 साल में ये पहला मौका था, जब कोई ऐसा एलबम अमरीका में धूम मचा रहा था जिसकी भाषा अंग्रेज़ी नहीं थी.
कूटनीतिक व्यस्तताओं के बीच भी दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे इन 'बीटीएस ग्रुप' को बधाई देना नहीं भूले.

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कई मोर्चों पर अव्वल कोरिया
ये कामयाबी कोई अजूबा नहीं. मौजूदा दशक के शुरुआती सालों में रिलीज़ हुए कोरियाई गायक साई के गंगनम स्टाइल वीडियो ने भी इतिहास रचा था. एक वक्त ये यू-ट्यूब पर सबसे ज़्यादा देखे जाने वाला वीडियो था.
लेकिन दक्षिण कोरिया की बादशाहत सिर्फ़ कोरियाई पॉप यानी के-पॉप तक ही सीमित नहीं है.
साल 1948 में आज़ादी पाने वाला और 1953 तक उत्तर कोरिया के साथ संघर्ष में उलझा रहा ये मुल्क तकनीक और विकास के कई पैमानों पर अव्वल है. कई क्षेत्रों में ये ताक़तवर पश्चिमी देशों को टक्कर दे रहा है.

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काम करने का जुनून
साल 2008 से 2011 तक दक्षिण कोरिया में भारत के राजदूत रहे स्कंद रंजन तायल इसे कोरियाई लोगों के जीवट से जोड़कर देखते हैं.
वो कहते हैं, "कोरिया के लोगों में एक जुनून है, एक आग है. वो जो करते हैं, उसे अपनी पूरी ताक़त और लगन से करते हैं."
इस जुनून का असर आंकड़ों में दिखता है. जहाज और कंप्यूटर चिप बनाने में ये मुल्क पहली पायदान पर है. मोबाइल निर्माण के लिहाज से दूसरे और कार बनाने में पांचवें नंबर पर है.
दक्षिण कोरिया की अर्थव्यवस्था निर्यात पर आधारित है. यहां की कंपनियां पूरी दुनिया में कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक्स का सामान, मोबाइल फ़ोन और कारें निर्यात कर रही हैं. निर्यात में वो दुनिया में सातवें नंबर पर है.



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कैसे लिखी कामयाबी की कहानी?
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को नोएडा में कोरियाई विकास की इस गाथा का बखान करते हुए कहा, "एक बात में अक्सर कहता हूं. भारत में शायद ही कोई ऐसा मिडिल क्लास घर होगा, जहां कम से कम एक कोरियाई प्रोडक्ट नज़र न आए. "
तरक्की की ये कहानी जादुई लगती है तो इसकी वजह ये है कि आकार में दक्षिण कोरिया भारत के राज्य गुजरात से भी छोटा है.
इसकी आबादी पांच करोड़ से भी कम है. साल 1945 तक ये देश जापान की गरीब उपनिवेश था और आज़ादी के बाद भी तमाम मुश्किलें इसे घेरे रहीं. उसके पास प्राकृतिक संसाधनों की भी कमी है.
1960 के दशक तक इसकी 72 फ़ीसदी आबादी गांवों में थी और अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी. फिर, उसने तकनीक, आईटी और ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में बेमिसाल कामयाबी कैसे हासिल की?
इस सवाल का जवाब देते हैं डा. रामा सुंदरम, जो साल 2006 से दक्षिण कोरिया में रह रहे हैं और कोरिया इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी में विजिटिंग साइंटिस्ट रह चुके हैं.
वो कहते हैं, "कोरियाई लोग हमेशा अपने देश के बारे में सोचते हैं. यहां का विकास नेताओं और देश के लोगों के साझा प्रयास का नतीजा है. जब भी आप कोरियाई लोगों से बात करें तो वो कहते हैं, 'वूरीनारा' जिसका मतलब है कि मेरा देश."

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एक देश-एक लक्ष्य
बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव कुछ महीने पहले दक्षिण कोरिया में थे. उन्होंने तकनीक और आईटी के क्षेत्र में इस देश की तरक्की को करीब से देखा.
उनका आकलन है, "कोरिया की ताकत वहां की काम करने की संस्कृति है. सोल समेत जिन शहरों में हम गए, वहां तमाम ऐसे लोग मिले जिनके लिए 12 से 14 घंटे काम करना रोजमर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है."
कोरिया में राजदूत रहे तायल कोरिया की तरक्की की कई वजह गिनाते हैं. वो कहते हैं कि कोरिया ने आज़ाद होने के बाद शिक्षा पर बहुत काम किया.
"पूरा देश एक दिशा में काम करता है. पहले तो जबरन करता था क्योंकि प्रजातंत्र वहां था नहीं. शुरू में उन्होंने बहुत मुसीबतें झेलीं. कोई मानवाधिकार नहीं थे न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी. न प्रेस थी. एक पीढ़ी ने बहुत दुख उठाया. बहुत ज़्यादा मेहनत की और बाद की पीढ़ियों ने उसका लाभ उठाया."
स्कंद रंजन तायल ये भी कहते हैं कि जिस दौर में दक्षिण कोरिया में लोकतंत्र नहीं था, तब भी वहां के नेता देश की प्रगति के बारे में सोचते थे.
"वहां सत्ता का दुरपयोग नहीं हुआ. वहां के नेता पार्क चुंग ही स्विस बैंक में अकाउंट नहीं रखते थे. वहां जब बदलाव आया तो सब लोगों में कुछ करने की इच्छा दिखी. चाहे वो कंपनी के स्तर पर हो या फिर वर्कर के स्तर पर हो. अगर कोई लक्ष्य हासिल करना हो तो लोग रोज़ 18-18 घंटे भी काम करने को तैयार रहते हैं."

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'इमीटेट एंड इनोवेट'
दक्षिण कोरिया में बदलाव की शुरुआत हुई तो इस मुल्क की छवि 'कॉपी कैट' यानी नकल करने वाले देश की थी. हालांकि, वहां के नीति निर्माता कभी ऐसी इमेज को लेकर परेशान नहीं हुए.
रिसर्च के काम जुटे डा. रामा सुंदरम कहते हैं कि कोरिया ने नकल और नए प्रयोगों को विकास का नारा बना दिया.
"किसी दूसरे विकसित देश में अगर कोई तकनीक है तो यहां उसी तरह की तकनीक विकसित करने की कोशिश की जाती है. उस समय तक जब तक कि वो ख़ुद की तकनीक न विकसित कर लें. कोरिया इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी ने एक किताब जारी की है. अगर आप उस किताब को देखें तो उसमें कहा गया है, 'इमीटेट एंड इनोवेट'. ये विकास के लिए कोरिया का नारा है."
दक्षिण कोरिया में नई तकनीक विकसित करने पर बहुत ज़ोर है. रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए सकल घरेलू उत्पादन यानी जीडीपी का कुल 4 फीसद हिस्सा तय है.
डा. रामा सुंदरम बताते हैं, " कई संस्थान और कई प्रोफेसर रिसर्च कर रहे हैं. वो कंपनियों को तकनीक देते हैं. यकीनन रिसर्च और डेवलपमेंट से कोरिया के विकास में मदद मिल रही है."

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देश के नाम सोना
लेकिन, कई विश्लेषकों की राय है कि दक्षिण कोरिया और उसके एलजी, सैमसंग और ह्युंदे जैसे ब्रांडों के पूरी दुनिया में धूम मचाने की सबसे बड़ी वजह है कोरियाई लोगों का चुनौतियों के आगे न झुकने का जज़्बा.
बीसवीं सदी के आखिरी दशक तक कोरिया आर्थिक मोर्चे पर लंबी छलांग लगा चुका था लेकिन साल 1997 की मंदी ने उसे दीवालिया होने की कगार पर ला दिया.
विदेशी निवेशकों ने देश की अर्थव्यवस्था से करीब 18 अरब डॉलर निकाल लिए. लाखों लोग बेरोजगार हो गए.
दक्षिण कोरिया ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ से मदद मांगी. उसे दिसंबर 1997 में 58 अरब डॉलर का बेल आउट पैकेज मिला.
इसके तहत दक्षिण कोरिया पर कई शर्तें लगाई गईं.

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वक्त से पहले चुकाया कर्ज़
कर्ज़ में डूबे अपने देश को बचाने के लिए कोरियाई लोग आगे आए. सैमसंग और दूसरी कंपनियों ने लोगों से सोना जुटाने की मुहिम शुरू की. कोरिया के करीब 35 लाख लोगों ने घरों में जमा सोना देश के नाम कर दिया. करीब 227 मीट्रिक टन सोना जुटाया गया.
स्कंद रंजन तायल बताते हैं, " वहां बूढ़ी औरतें, गरीब औरतें अपने गहने, शादी की अंगूठी लेकर आ गईं कि देश को जरूरत है. उनको विदेशी मुद्रा की जरूरत थी. तब इतना सोना इकट्ठा हुआ."
एक मुल्क की एकजुट कोशिश का नतीजा ये हुआ कि पूरी दुनिया में सोने का भाव कम हो गया. जमा हुए सोने की कीमत करीब 2.2 अरब डॉलर थी जो कर्ज़ के मुकाबले काफी कम थी. लेकिन लोगों ने जो जज़्बा दिखाया, उसने दक्षिण कोरिया की तकदीर बदलने की गारंटी दी. तय वक्त से करीब तीन साल पहले यानी साल 2001 में दक्षिण कोरिया ने आईएमएफ का लोन चुका दिया.

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रफ़्तार ही पहचान
दक्षिण कोरिया ने व्यापार के माकूल माहौल तैयार किया. नए अनुसंधानों को प्राथमिकता दी. तब से इस देश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है.
वर्ल्ड बैंक के 2018 के आंकड़ों के मुताबिक व्यापार करने की आसानी को लेकर दक्षिण कोरिया दुनिया में चौथे नंबर पर है. इस लिस्ट में अमरीका छठे और भारत सौवें नंबर पर है.
सबसे तेज़ इंटरनेट, सबसे ज़्यादा स्मार्ट फोन इस्तेमाल करने वाले लोगों का मुल्क दक्षिण कोरिया सबसे ज़्यादा पेटेंट के लिए आवेदन भी करता है.
उसे प्लास्टिक सर्जरी की राजधानी कहा जाता है. लेकिन कम वक़्त में दुनिया जीत लेने की चाहत ने कोरिया में हड़बड़ी की संस्कृति विकसित कर दी है. नई पीढ़ी में हर कोई, हर वक़्त तेज़ी में दिखता है.
नितिन श्रीवास्तव कहते हैं, "दक्षिण कोरिया में पीढ़ियों के बीच अंतर है. 50 साल की उम्र का पड़ाव पार कर चुके पुरानी पीढ़ी के लोगों में उत्तर कोरिया को लेकर सहानुभूति रखती है. जो नई पीढ़ी है, वो जल्दी में है."

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दबदबा बनाने की चाहत
दक्षिण कोरिया दुनिया में दबदबा बनाने के लिए स्पोर्ट्स और कॉन्फ्रेंस डिप्लोमेसी का भी सहारा लेता है. साल 1988 में यहां ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ. कोरिया ने साल 2002 में जापान के साथ मिलकर फुटबॉल वर्ल्ड कप की मेजबानी की और साल 2010 में एशिया में जी-20 का आयोजन करने वाला पहला देश बना.
डा. रामा सुंदरम कहते हैं कि तरक्की के तमाम मुकाम हासिल करने के बाद भी कोरियाई लोगों ने अपनी सांस्कृतिक धरोहर को बड़े जतन से संजोया है.
"वो अपनी संस्कृति को बहुत अहमियत देते हैं. तमाम विदेशी विश्लेषक कहते हैं कि पहनावे के आधार पर वो पश्चिमी देशों के लगते हैं लेकिन दिल से वो सौ फीसद कोरियाई हैं. आप जहां कहीं जाएं आपको कोरियाई डिश किंची मिलेगी."
दक्षिण कोरिया एक दशक पहले ही ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था वाले देशों के क्लब में शामिल हो चुका है.
लेकिन कई चुनौतियां अब भी सामने हैं. आबादी छोटी है और एक हिस्सा तेज़ी से उम्रदराज़ हो रहा है. तकनीक के विकास और निर्यात में चीन से कड़ी चुनौती मिलने लगी है.
लेकिन फिर भी दक्षिण कोरिया को भरोसा है कि विकास का उसका पहिया थमेगा नहीं. उसे चुनौतियों को चित करने का हुनर आता है.


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