नज़रियाः भारत के तेज़ विकास की चाह में दक्षिण कोरिया इतना महत्वपूर्ण क्यों?

मून जे इन और नरेंद्र मोदी

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इमेज कैप्शन, दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून जे-इन और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
    • Author, प्रोफेसर स्वर्ण सिंह
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

उत्तर कोरिया के साथ द्विपक्षीय वार्ता और अमरीका-उत्तर कोरिया शिखर सम्मेलन शुरू करवाने की उनकी सफलता से तरोताजा दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति मून जे-इन भारत को शामिल करने की उनकी "नई दक्षिण नीति" के तहत अपना 'थ्री पी' (लोग, समृद्धि, शांति) एजेंडा लिए भारत आ रहे हैं.

भारत में दक्षिण कोरिया के राजदूत के हालिया न्यूज़पेपर इंटरव्यू के मुताबिक, 'लोग' का मतलब सांस्कृतिक और पर्यटन संबंधों से, 'समृद्धि' का आर्थिक साझेदारी के निर्माण से और 'शांति' उनकी क्षेत्रीय चुनौतियों खास कर कोरियाई प्रायद्वीप पर सुरक्षा की स्थिति को लेकर उनकी सोच को साझा करने का हवाला देती है, और दोनों कोरियाई देशों के साथ अपने ताल्लुकात को बनाए रखने में भारत की स्थायी रुचि का कारण भी यही है.

1945 में जापान से कोरिया की आज़ादी के तुरंत बाद भारत को संयुक्त राष्ट्र आयोग के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया गया, जिसने अंततः 15 अगस्त 1948 को कोरियाई गणराज्य की स्थापना की.

हालांकि, भारत के साथ उसके संबंधों में मजबूती 1997 के पूर्वी एशियाई वित्तीय संकट के बाद दक्षिण कोरिया में हुए अभूतपूर्व विकास की वजह से पिछले दो दशकों के दौरान आई.

कोरियाई तकनीक

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कोरियाई ब्रांड

कोरियाई ब्रांड आज भारत के घर घर में उपलब्ध हैं और उनकी कुछ कंपनियां पहले से ही मोदी के 'डिजिटल इंडिया' और 'मेक इन इंडिया' में योगदान दे रही हैं.

इस पृष्ठभूमि में, मोदी-मून शिखर सम्मेलन के साथ ही "विशेष रणनीतिक साझेदारी" के दूसरे चरण के शुरू होने की उम्मीद है, जिसे मोदी के "एक्ट ईस्ट" और मून की "नई दक्षिण नीति" ने और मजबूत किया है और अपनी वार्ता को द्विपक्षीय स्तर से आगे ले जाने का वादा किया है. उन्हें क्षेत्रीय और वैश्विक महत्व के विभिन्न मुद्दों को संबोधित करते हुए भी देखा जा सकता है.

भारत के तेज़ विकास की चाह में दक्षिण कोरिया का आज क्या महत्व है इसे एक बेहद आसान समीकरण से समझा जा सकता है- भारत की आबादी दक्षिण कोरिया से 24 गुना अधिक है जबकि प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में यह दक्षिण कोरिया का महज सोलहवां हिस्सा ही है.

इस प्रकार दोनों के रिश्ते एक दूसरे के बेहद पूरक हो जाते हैं क्योंकि जहां दक्षिण कोरिया के पास उन्नत तकनीक और विशेषज्ञों के साथ साथ पूंजी मौजूद है, वहीं भारत के पास बहुत बड़ा बाज़ार और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कच्चे माल तो हैं लेकिन यहां प्रत्यक्ष बुनियादी ढांचे की कमी है.

गुजरात जितना बड़ा यह छोटा सा देश (दक्षिण कोरिया) ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन दोनों ही ओलंपिक खेलों की मेजबानी कर चुका है और आज यहां की कंपनियां भारत समेत पूरी दुनिया में कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फ़ोन और ऑटोमोबाइल दे रही हैं और बुनियादी ढांचे का निर्माण कर रही हैं.

मून जे इन

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मून की 'नई दक्षिण रणनीति'

भारत के साथ मजबूत भागीदारी बनाने की राष्ट्रपति मून की प्रतिबद्धता पहले से दिख रही थी.

पिछले साल अप्रैल में सरकार के गठन के दौरान भारत में कोरिया के पूर्व राजदूत रहे चो ह्यून को शामिल कर उन्हें विदेश और बहुपक्षीय आर्थिक मामलों का जूनियर मंत्री बना दिया गया और फिर मई में राष्ट्रपति मून के खास दूत पूर्व सांस्कृतिक मंत्री चुंग दोंग-ची को भारत और ऑस्ट्रेलिया भेजा गया.

इसके बाद नवंबर में राष्ट्रपति मून के 'नई दक्षिण नीति' की घोषणा के साथ ही भारत-दक्षिण कोरिया के रिश्ते में एक नए पहलू की शुरुआत हुई है.

राष्ट्रपति मून की 'नई दक्षिण नीति' की पृष्ठभूमि में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मई 2015 में दक्षिण कोरिया गए थे. इससे दोनों देशों ने अपने संबंधों को 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' में बदल दिया और उसी दौरान दक्षिण कोरिया ने भारत में बुनियादी ढांचों के विकास के लिए 10 अरब डॉलर के क्रेडिट लाइन की बुनियाद रखी.

यह सब कोरियाई स्टील कंपनी पोस्को द्वारा उड़ीसा में 12 अरब डॉलर के स्टील संयत्र लगाने के लिए लौह अयस्क खदान को कंपनी को लीज पर दिए जाने के प्रोजेक्ट पर स्थानीय किसानों के विरोध के बाद विवादास्पद रूप से हट जाने के बावजूद हुआ.

मोदी

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दक्षिण कोरिया ने किया था CM मोदी का स्वागत

दक्षिण कोरिया उन कुछ चुनिंदा देशों में से एक था जिसने 2007 में बतौर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की मेजबानी तब की थी जब अमरीका की अगुवाई में कई पश्चिमी देशों में वो अस्वीकार्य व्यक्ति के रूप में देखे जाते थे.

भारत-कोरिया के बीच संबंधों को लेकर पौराणिक कथाएं तो दो हज़ार साल पहले से चल रही हैं और आज दक्षिण कोरिया में पीएचडी कर रहे करीब एक हज़ार शोधार्थियों समेत 11 हज़ार भारतीय रह रहे हैं. ऐसे में मोदी-मून की यह बैठक दक्षिण कोरिया के छह देशों की वार्ता के अलावा क्षेत्रीय खिलाड़ियों में दिलचस्पी लेने की शुरुआत के रूप में देखी जा सकती है.

भारत हमेशा बातचीत के जरिए कोरियाई प्रायद्वीप के परमाणु निरस्त्रीकरण की वकालत करता रहा है. और दक्षिण कोरिया भी इन वर्षों में यही बात करता रहा है.

उतर कोरिया के साथ भी भारत के लगातार सम्बंध बनाए रखने का फ़ायदा भारत-दक्षिण कोरिया में बढ़ती दोस्ती को होगा.

भारत, चीन

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चीन से तुलना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अति सक्रिय विदेश नीति के तहत भारत ने उत्तर कोरिया के साथ जुड़ाव में रुचि दिखाई है. भारत वहां क्षेत्रीय विकास और अमरीका उत्तर कोरिया के संबंधों से निकलने वाले अच्छे परिणामों पर अपनी नज़र रखे हुए है.

आज जब उत्तर कोरिया ने दुनिया के बाकी देशों के लिए अपने दरवाज़े खोलने शुरू किए हैं तो भारत उसे अपने चीन-पाकिस्तान वाले पारम्परिक सामरिक गठजोड़ से बाहर निकलना चाहेगा. भारत खास कर उत्तर कोरिया के पाकिस्तान के साथ उसके परमाणु और मिसाइल कार्यक्रमों और इस क्षेत्र पर उसके सुरक्षा प्रभावों को लेकर चिंतित है.

दरअसल उत्तर कोरिया और पाकिस्तान दोनों ही चीन के साथ घनिष्ठ संबंध रखते हैं जो भारत-दक्षिण कोरिया संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु भी बना हुआ है.

चीन के साथ तुलना लाजमी है. दक्षिण कोरिया के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार भी पिछले साल 20 अरब अमरीका डॉलर का आंकड़ा पार कर चुका है, दक्षिण कोरिया के साथ चीन 12 गुना ज़्यादा 240 अरब डॉलर का व्यापार करता है. इसी तरह, चीन में नौ गुने अधिक 57 अरब डॉलर के निवेश के मुकाबले दक्षिण कोरिया का भारत में कुल निवेश 6.8 अरब डॉलर है.

लेकिन राष्ट्रपति मून का अपनी 'नई दक्षिण नीति' के तहत भारत के साथ संबंधों को चीन के स्तर के बराबर रखने का लक्ष्य भारत की बड़ी क्षमता को दर्शाता है.

पिछले तीन सालों में उनके व्यापार में 17 से 20 अरब डॉलर की वृद्धि देखी गई है और दोनों पक्षों ने इसे 40 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित कर लिया है.

किम जोंग उन

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अंत में भारत के लिए, दक्षिण कोरिया चौंकाने वाला परिवर्तन देता एशियाई लोकतांत्रित व्यवस्था के एक कामयाब स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी वजह से दक्षिण कोरिया की उसके विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचों की वजह से आज अग्रणी राष्ट्रों में गिनती होती है.

जैसे जैसे भारत अपने अगले आम चुनावों के क़रीब आता जा रहा है, लोकतांत्रिक दक्षिण कोरिया के साथ उसकी बढ़ती भागीदारी का महत्व फ़ोटो खिंचाने और आशा दर्जन समझौतों पर हस्ताक्षरों कहीं ज़्यादा गहरा हो जाता है.

(लेखक नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज में प्रोफेसर हैं)

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