भारत-पाक: जहां गोलियां नहीं, रुपया बरसता है

इमेज स्रोत, Majid Jahangir
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, उड़ी (कश्मीर) से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर के उड़ी, सलामाबाद ट्रेड सेंटर में इम्तियाज़ कई दूसरे मज़दूरों के साथ पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से
आने वाले ट्रकों का इंतज़ार कर रहे हैं.
भारत-पाकिस्तान की तरफ़ से शुरू किए गए इस ट्रेड सेंटर पर 35 साल के इम्तियाज़ पिछले छह साल से मज़दूरी कर रहे हैं.
वे उन दिनों स्कूल में पढ़ते थे जब भारत-पाकिस्तान ने एलओसी ट्रेड शुरू किया था. उनका घरबार इसी से चलता है.
उनसे बात हो ही रही थी कि पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से एक रंगीला और ख़ूबसूरत ट्रक सलामाबाद के ट्रेड सेंटर पर आ पहुंचा जिसमें बादाम लदा हुआ था.
भारत-पाकिस्तान व्यापार
इम्तियाज़ कहते हैं, "दस साल पहले शुरू किए गए एलओसी ट्रेड ने उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को थोड़ा बहुत ज़रूर बदल दिया है. पढ़े-लिखे नौजवानों को इस कारोबार से काफी फायदा मिला है. यहां जो बेरोज़गार थे, कम से कम उनको तो रोज़गार मिला है."
उन्होंने कहा, ''पहले यहां कम काम मिलता था लेकिन व्यापार शुरू होने से चीज़ें काफी बदली हैं. सरकार को चाहिए कि इस कारोबार को बढ़ावा दिया जाए. अगर ऐसा होगा तो काफी लोगों को रोज़गार मिलेगा."
भारत-पाकिस्तान ने साल 2008 में सीबीएम (कॉन्फिडेंस बिल्डिंग मेजर्स यानी भरोसा बहाल करने के लिए उठाए जाने वाले कदम) के तहत सीमा के आरपार से यहां ट्रेड शुरू किया था.

इमेज स्रोत, Majid Jahangir
कारोबार की चीज़ें
जम्मू और कश्मीर के क़रीब 240 ट्रेडर्स यहां व्यापार कर रहे हैं. सीमा के आरपार इस ट्रेड में कुल 21 चीज़ों का बिज़नेस होता है.
पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर से इस पार आने वाली चीज़ों में बादाम, कीनू, हर्बल प्रोडक्ट, कपड़ा, आम, सेब, सूखे मेवे, खुबानी, कालीन जैसी चीज़ें शामिल हैं.
इसी तरह भारत प्रशसित कश्मीर से केले, अनार, अंगूर, मसाले, कढ़ाई की हुई चीज़ें, शॉल, कश्मीरी आर्ट के दूसरे आइटम और मेडिसिन हर्ब्स शामिल हैं.
भारत प्रशासित कश्मीर के उड़ी, सलामाबाद से मुज़फ़्फ़राबाद जाने वाले रास्ते पर हफ्ते में चार दिन पाकिस्तान के लिए माल से लदे ट्रक रवाना होते हैं.
इसी तरह पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के चकोटी से भी ट्रक इस तरफ़ आते हैं. सलेमाबाद से चकोटी की दूरी 16 किलोमीटर है.

इमेज स्रोत, Majid Jahangir
5200 करोड़ रुपये का बिज़नेस
झेलम नदी की बाई तरफ़ आबाद उड़ी, बारामूला ज़िले की एक तहसील है. इसी तरह जम्मू के पुंछ के चका दी बाग से रावलाकोट के लिए भी हर हफ़्ते ट्रेड होता है.
दस साल के इस ट्रेड में अब तक 5200 करोड़ रुपये का कारोबार हो चुका है.
उड़ी के सब-डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट बशीर-उल हक़ चौधरी कहते हैं, "अभी तक हमने 5200 करोड़ रुपये का कारोबार किया है. इसमें जो एक्सपोर्ट है, वह 2800 करोड़ रुपये का है जबकि इम्पोर्ट 2400 करोड़ रुपये का है."
सीमा पार से होने वाले इस व्यापार से जुड़े कारोबारी काफ़ी खुश हैं लेकिन उनका कहना है कि इसमें अब भी कुछ कमियां हैं जिन्हें पूरा करना बहुत ज़रूरी है.

इमेज स्रोत, Majid Jahangir
शर्तों के साथ कारोबार
हिलाल तुर्की भारत प्रशासित कश्मीर में एलओसी ट्रेड एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं.
वह कहते हैं, "दोनों देशों के रिश्ते नाज़ुक हैं लेकिन इसके बावजूद दोनों तरफ से ये ट्रेड चल रहा है. इसके साथ-साथ अभी कई मुश्किलें हैं जिससे इस कारोबार में अड़चनें आ रही हैं. सबसे पहले तो इसमें केवल 21 चीज़ों का ही व्यापार किया जा सकता है. सामान का आवागमन तो होता है पर बैंकिंग की सुविधा नहीं है."
उन्होंने बताया, ''यहां के हालात थोड़े अलग हैं. अगर आपने यहां से कोई सामान भेजा तो वहां से आपको कोई चीज़ मंगानी होगी. कभी-कभी तो ऐसा भी होता है कि जब हम उस पार से हम कोई आइटम लाते हैं, यहां उसकी मार्केट वैल्यू उसकी खरीद कीमत से कम होती है, ऐसे में ये धंधा नुक़सान का हो जाता है और कई कारोबारी इस वजह से बिज़नेस से अलग हो गए.''

इमेज स्रोत, Getty Images
कारोबारियां की मांगें
तुर्की कहते हैं कि इसके इलावा सुरक्षा और रजिस्ट्रेशन की समस्या भी है.
वो कहते हैं, ''मैं बीते आठ साल से मांग कर रहा हूँ कि ट्रेड सेंटर को डिजिटल किया जाए, लेकिन अभी तक ऐसा किया नहीं गया है. दूसरा मुद्दा फुल बॉडी स्कैनर का है. तीसरी बात रजिस्ट्रेशन की है. हम चाहते हैं कि इस ट्रेड के साथ ज़्यादा से ज्यादा लोग जुड़ें. रजिस्ट्रेशन पर लगी रोक हटाई जाए."
वे कहते हैं, ''सीमा पार के ट्रेड से जुड़े हम जैसे लोगों को शक की निगाह से न देखा जाए. हम तो इस कारोबार में दोनों देशों के राजदूत हैं. हमें हर जगह इज़्ज़त की निगाह से देखा जाना चाहिए. हम पर हमेशा शक की तलवार कभी इधर, कभी उधर से लटकती रहती है."

इमेज स्रोत, Majid Jahangir
अच्छी बातें और भी हैं
बशीर-उल हक़ चौधरी कहते हैं, "इस ट्रेड को बेहतर बनाने के लिए काम किया जा रहा है. छोटी-मोटी कमियों को हम पूरा करने जा रहे हैं."
ये कारोबार चलता रहे, ऐसा चाहने वाले कई लोग हैं.
रोज़गार, मुनाफ़ा और दोनों तरफ़ कश्मीर के लोगों की मुलाकातों को छोड़ भी दें तो सलामाबाद सेंटर पर मजदूरी करने वाले मोहम्मद यूनुस की ये बात दिल को भा जाती है.
वो कहते हैं, "पहले यहां काफी शेलिंग (गोलाबारी) होती थी लेकिन अब यहां अमन है. सबसे बड़ा फायदा हमारे लिए तो यही है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












