भारत में व्हाट्सऐप पर फ़र्ज़ी ख़बरों पर कैसे कसे लगाम?

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    • Author, आयशा परेरा
    • पदनाम, संपादक, बीबीसी इंडिया ऑन लाइन

भारत सरकार ने मोबाइल मेसेजिंग सेवा व्हाट्सऐप से कहा है कि वो अपने प्लेटफ़ॉर्म पर 'ग़ैर-ज़िम्मेदाराना और भड़काऊ' संदेशों के प्रसार को रोकने के लिए तत्काल प्रभाव से कार्य करे.

भारत सरकार की तरफ़ से ये संदेश हाल ही में 'फ़र्ज़ी व्हाट्सऐप मेसेज के आधार पर' हुई हिंसा की वारदातों के बाद दिया गया है.

बीते तीन महीने में भारत के अलग-अलग इलाक़ों में कम से कम 17 लोग भीड़ के हाथों मारे गये हैं. स्थानीय मीडिया में आईं ख़बरों पर ग़ौर करें तो ये आंकड़ा और भी ज़्यादा बड़ा दिखाई देता है.

25 साल के कालू राम को बेंगलुरू के इस फ़्लाइओवर के नीचे भीड़ ने बाँधकर इतना पीटा कि उनकी मौत हो गई
इमेज कैप्शन, 25 साल के कालू राम को अफ़वाह के आधार पर बेंगलुरू के इस फ़्लाइओवर के नीचे भीड़ ने बाँधकर इतना पीटा कि उनकी मौत हो गई

फ़र्ज़ी संदेशों से क्या हुआ?

कई जगहों पर व्हाट्सऐप के ज़रिए एक ही तरह के संदेश फ़ैलाये गये. इनमें बच्चों के अपहरण से जुड़ी अफ़वाहें थीं. इनका नतीजा ये हुआ किया भीड़ ने अनजान लोगों पर हमला कर दिया.

पुलिस का कहना है कि लोगों को ये विश्वास दिलाने में काफ़ी मुश्किल पेश आ रही है कि व्हाट्सऐप पर आये संदेश झूठे हैं.

सबसे ताज़ा घटनाओं में से एक घटना त्रिपुरा की है. यहाँ अफ़वाहें रोकने के लिए सरकार की ओर से नियुक्त किए गए एक कर्मचारी को ही भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला.

33 वर्षीय सुकांता चक्रवर्ती गाँव-गाँव घूमकर लोगों को बच्चा चोरी की अफ़वाहों के बारे में जागरूक कर रहे थे. मीडिया में आईं रिपोर्टों के मुताबिक़, भी़ड़ ने उन्हें बच्चा चोर समझ लिया और पीट-पीट कर मार दिया.

भारत सरकार ने कहा है कि व्हाट्सऐप पर जो भी संदेश और कंटेंट शेयर किया जा रहा है, कंपनी उसके 'उत्तरदायित्व और ज़िम्मेदारी' से बच नहीं सकती है.

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इमेज कैप्शन, त्रिपुरा में फ़र्ज़ी संदेश की वजह से इस जगह पर हिंसा हुई

स्थिति नियंत्रण से बाहर कैसे गई?

फ़िलहाल हमले तेज़ी से बढ़ रहे हैं और उनके रुकने का कोई संकेत दिखाई नहीं देता.

भारत के दूरसंचार नियामक आयोग का कहना है कि भारत में एक अरब से ज़्यादा सक्रिय मोबाइल फ़ोन कनेक्शन हैं और इनमें लाखों भारतीय बीते कुछ समय में अचानक से मोबाइल इंटरनेट का इस्तेमाल शुरू कर चुके हैं.

भारत में फ़र्ज़ी ख़बरों का भंडाफोड़ करने वाली वेबसाइट 'ऑल्ट न्यूज़' के संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने बीबीसी से कहा, "भारत के ग्रामीण इलाक़ों में अचानक से लोगों के हाथ ऑनलाइन इंटरनेट आया है. वहाँ से जो सूचनाएं उन लोगों के हाथ लगती हैं, वो कितनी सच्ची हैं और कितनी झूठी, इसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. उन्हें जो भी भेजा जाता है, वो उसे सच मान लेते हैं."

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एक अनुमान के मुताबिक़, भारत में क़रीब 20 करोड़ व्हाट्सऐप उपभोक्ता हैं. व्हाट्सऐप के लिए भारत सबसे बड़ा बाज़ार है.

भारत सबसे बड़ा देश है जहाँ इंटरनेट आधारित सेवा आबादी के अनुपात के हिसाब से आम नागरिकों के एक बड़े हिस्से के लिए उपलब्ध है.

इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भारत में कोई सूचना कितनी तेज़ी से और कितने बड़े स्तर पर फ़ैलाई जा सकती है. लेकिन सबसे बड़ी दिक़्कत ये है कि इसकी मदद से लोगों की बड़ी भीड़ को एकत्र करना भी उतना ही आसान हो गया है.

चूंकि व्हाट्सऐप एक व्यक्तिगत संदेश सेवा है, इसलिए लोगों को इस माध्यम से मिलने वाली सूचनाएं व्यक्तिगत लगने लगती हैं और वो उन्हें सच मानने लगते हैं. इसके अलावा लोगों में सूचनाओं को डबल चेक करने की आदत बहुत कम है.

प्रौद्योगिकी विश्लेषक प्रसांतो के रॉय मानते हैं कि आने वाले वक़्त में भारत की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण हो सकती है.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "इनमें ज़्यादातर अंग्रेज़ी नहीं बोलने वाले लोग होंगे. वो सामाजिक और आर्थिक स्थिति के हिसाब से निचले पायदान से वास्ता रखते होंगे और वो मोबाइल इंटरनेट की मदद से वीडियो देखेंगे और म्यूज़िक सुनेंगे."

प्रसांतो कहते हैं कि फ़र्ज़ी ख़बर फ़ैलाने के लिए वीडियो सबसे बढ़िया ज़रिया हैं. आसानी से उनका ग़लत इस्तेमाल हो सकता है. हिंसा की किसी भी पुरानी वीडियो नया बताकर पोस्ट किया जा सकता है और लोगों को फ़ेसबुक और व्हाट्सऐप के ज़रिये भड़काया जा सकता है.

वीडियो कैप्शन, पाकिस्तान की एक शॉर्ट फ़िल्म को एडिट करके भारत में किया गया वायरल

वहीं व्हाट्सऐप जो तकनीक इस्तेमाल करता है, उसने स्थिति को और भी ज़्यादा जटिल कर दिया है.

प्रसांतो बताते हैं, "व्हाट्सऐप के ज़रिये जो संदेश भेजे जाते हैं उनके मेटाडेटा की मदद से ये पता लगाना मुश्किल है कि संदेश भेजा किसने और सबसे पहले ये संदेश कब भेजा गया. इसे एंड टू एंड एनक्रिप्शन तकनीक कहा जाता है. ऐसे मामलों में ये तकनीक भ्रामक संदेश भेजने वाले लोगों के लिए एक बचाव है."

व्हाट्सऐप दावा करता है कि इस तकनीक की वजह से दो लोगों के बीच हुए संवाद को वो भी नहीं पढ़ सकता है.

इन्हीं दिक्कतों का हवाला देकर भारत सरकार ने कहा है कि उनके भी हाथ बंधे हुए हैं क्योंकि वो नहीं जानते कि व्हाट्सऐप पर वायरल हो रहे फ़र्ज़ी संदेशों को कैसे रोका जाये.

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व्हाट्सऐप का क्या कहना है?

व्हाट्सऐप ने भारत सरकार को दिए जवाब में कहा है कि वो फ़र्ज़ी संदेशों को पकड़ने के तरीके तलाश रहा है और इसपर काम जारी है.

कंपनी ने कहा है कि वो भी ऐसी दुर्घटनाओं को देखकर हैरान है और इससे निपटना एक बड़ी चुनौती है.

हालांकि कंपनी ने ये साफ़ किया है कि वो अपनी 'एंड टू एंड एनक्रिप्शन' नीति में कोई बदलाव नहीं करने वाली. क्योंकि इसमें बदलाव करने से लोगों के संदेश प्राइवेट नहीं रह जायेंगे.

व्हाट्सऐप भारत में फ़र्ज़ी ख़बरों के ख़िलाफ़ जागरूकता अभियान शुरू करने की भी बात कर रहा है. इसके लिए कंपनी ने राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों से बात भी की है.

इससे अलावा व्हाट्सऐप भारतीय पुलिस को इस मेसेजिंग ऐप के इस्तेमाल के बेस्ट तरीक़े सिखाने वाला है.

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व्हाट्सऐप को और क्या करना चाहिए?

मीडियानामा वेबसाइट के संपादक निखिल पहवा कहते हैं कि व्हाट्सऐप का ये कह देना कि वो जागरूकता फ़ैलायेगा. ये काफ़ी नहीं है. उन्हें और भी कुछ करना होगा.

वो कहते हैं, "सभी संदेशों को प्राइवेट बना देना चाहिए. किसी शख़्स के पास कोई संदेश आये तो वो उसे आसानी से कॉपी करके आगे न बढ़ा सके. और जो चीज़ें किसी तरीक़े से फॉर्वर्ड की जा रही हैं, उन्हें पब्लिक कर दिया जाये. पब्लिक संदेशों की एक आईडी हो जिसे ट्रैक किया जा सके. पुलिस और व्हाट्सऐप भी इसे देख सकें."

उनकी एक सलाह ये भी है कि जब कोई व्हाट्सऐप जॉइन करे तो उसे एक वीडियो दिखाया जाये. ये वीडियो देखना अनिवार्य हो और इसमें बताया जाये कि कैसे फ़र्ज़ी ख़बरों से बचा जा सकता है.

हालांकि प्रौद्योगिकी विश्लेषक प्रसांतो के रॉय मानते हैं कि ग़लत जानकारी के प्रसार के लिए सिर्फ़ व्हाट्सऐप मैसेंजर को कोसना ठीक नहीं है, क्योंकि इसके सबसे बड़े प्रसारक राजनीतिक दल भी हैं.

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वो कहते हैं, "फ़र्ज़ी ख़बरों के सोर्स को पकड़ने की ज़रूरत भी है. जहाँ उन्हें तैयार किया गया और जहाँ से उन्हें पहली बार भेजा गया. राजनीतिक दलों, विशेष रूप से सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को व्हाट्सएप के इस्तेमाल पर एक अनुशासित स्टैंड लेने की ज़रूरत है."

वो इसकी शुरुआत करके एक संदेश दे सकते हैं कि सभी राजनीतिक दलों को गलत सूचनायें फैलाने से बचना चाहिए.

अगर कानूनी दृष्टिकोण से इसे देखें, तो भारतीय आईटी अधिनियम के दिशानिर्देशों के तहत ऐसे फ़र्ज़ी संदेशों के लिए किसी प्लेटफ़ॉर्म को पूरी तरह से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता है.

रॉय कहते हैं, "दिशानिर्देशों में ये साफ़ तौर पर लिखा है कि अगर किसी साइट पर आपत्तिजनक सामग्री छपी होगी, तो उसे हटाना पड़ सकता है. लेकिन इनमें ये स्पष्ट नहीं लिखा है कि व्हाट्सएप की तरह एनक्रिप्शन वाले संदेशों की स्थिति में क्या करना होगा, क्योंकि इन संदेशों को किसी भी तरह एक साथ हटाना या निकालना आसान नहीं है."

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