#SwachhDigitalIndia: फ़र्ज़ी ख़बर का ख़ुद कर सकते हैं पर्दाफ़ाश

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, तरुणी कुमार
- पदनाम, द क्विंट
तमाम व्हाट्सऐप ग्रुप में आपको वो संदेश मिलते होंगे, जिनमें कभी किसी और कभी किसी हस्ती के ग़लत काम में लिप्त होने का दावा किया जाता है. हालांकि इन संदेशों में कोई सबूत नत्थी नहीं होता.
संदेश भेजने वाले आपसे ऐसे नेता या हस्ती का समर्थन न करने की अपील करते हैं. बेशक आप ऐसे व्हाट्सऐप संदेशों से आजिज़ आ चुके होंगे. कई बार ऐसा भी होता है कि आप किसी वेबसाइट पर कोई लेख पढ़ रहे हों और वहीं पास में एक लिंक दिखता है, जिसमें एक रहस्यमय फल खाने से कैंसर के इलाज़ का दावा किया गया होता है.
आपने ऐसे शीर्षक भी पढ़े होंगे, जो अविश्वसनीय लगे होंगे. ऐसी ख़बरें अकसर ऐसे पब्लिकेशन की होती हैं, जिनका नाम आपने शायद ही पहले कभी सुना हो?
आप जो ख़बर पढ़ रहे हैं, वह सच है या झूठ, इसका पता आसानी से लगाया जा सकता है. यहां हम उसके कुछ तरीक़े बता रहे हैं.
1. सर्च इंजन
तथ्यों की पड़ताल में सर्च इंजन से काफ़ी मदद मिलती है. आपको किसी ख़बर पर संदेह हो तो गूगल जैसे सर्च इंजन में कीवर्ड टाइप कीजिए और नतीजे देखिए. ख़बर सही होगी तो कई भरोसेमंद न्यूज एजेंसियों और पब्लिकेशंस ने उसे छापा होगा और अपनी वेबसाइट पर डाला होगा.
अगर वह झूठी होगी तो आपको उसके बहुत कम लिंक मिलेंगे. हो सकता है कि आपको तथ्यों की जांच करने वाली किसी वेबसाइट का कोई लिंक मिल जाएं, जिसमें इस फ़र्जी ख़बर की पोल खोली गई हो.
गूगल ने 'फैक्ट चेक' यानी तथ्यों की पड़ताल करने वाला एक टूल भी लॉन्च किया है. इसमें फैक्ट चेकिंग वेबसाइटों के सर्च नतीजे ऊपर आते हैं, जिससे ख़बर के सही या ग़लत होने का पता लगाया जा सकता है. मिसाल के लिए, अगर आपने 'डोनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद छोड़ने की योजना बना रहे हैं' टाइप किया तो पहले दो नतीजे फैक्ट चेकिंग वेबसाइट 'पॉलिटिफैक्ट' के दिखेंगे.

इमेज स्रोत, Screenshot
दूसरे लिंक में आप यह देख सकते हैं कि ट्रंप के पद छोड़ने का झूठा दावा किसने किया, दावा असल में क्या था और इसके साथ फैक्ट चेक के नतीजे भी आपको दिखेंगे.
2. रिवर्स इमेज सर्च
गूगल के 'रिवर्स इमेज सर्च' टूल का इस्तेमाल करके आप ख़ास तस्वीरें सर्च कर सकते हैं. इससे पता लगाया जा सकता है कि वह तस्वीर किसकी है और सबसे पहले कहां छपी थी. इससे मिलती-जुलती तस्वीर भी अगर सर्च की गई होगी, तो उसकी जानकारी भी मिल जाएगी.
आपको यह भी पता लग जाता है कि उस तस्वीर से छेड़छाड़ हुई है या नहीं? इससे उन झूठी ख़बरों की सच्चाई सामने आ जाती है, जिन्हें दूसरे मकसद से फैलाया जा रहा है.
ऐसा ही एक मामला हाल में सामने आया. इसमें वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त की एक फोटो ट्विटर पर फैलाई जा रही थी. इसमें उन्हें एक हाथ में पाकिस्तान का झंडा लिए हुए दिखाया गया था. रिवर्स इमेज सर्च से पता चला कि इसी तरह की एक फोटो www.careers360.com की वेबसाइट पर थी, लेकिन उसमें उनके हाथ में पाकिस्तान का झंडा नहीं था.

इमेज स्रोत, Screenshot
रिजल्ट में फैक्ट चेकिंग वेबसाइट का लिंक भी दिखता है, जिसमें इमेज को झूठा बताया गया है. इसमें यह दावा किया गया है कि पाकिस्तान के झंडे को फोटोशॉप टूल के ज़रिए इमेज में जोड़ा गया.

इमेज स्रोत, Screenshot
3. फ़र्स्ट ड्राफ्ट का न्यूज चेक एक्सटेंशन
'फर्स्ट ड्राफ्ट' नौ पार्टनर कंपनियों का गैर-लाभ गठबंधन है, जिसमें गूगल न्यूज़ लैब भी शामिल है. इसका मक़सद डिजिटल वर्ल्ड में सच और विश्वसनीयता से जुड़ी चुनौतियों से निपटना है. इसने 'न्यूज़चेक' नाम से एक एक्सटेंशन रिलीज किया है, जो वीडियो या फोटो की सच्चाई का पता लगाने में मदद करता है.

इमेज स्रोत, Screenshot

इमेज स्रोत, Screenshot
एक विस्तृत चेकलिस्ट के आधार पर यह काम करता है. यह काम सिर्फ चार स्टेप में किया जा सकता है. यह ट्विटर के ज़रिए लॉग इन करता है. इसलिए आप वेरिफिकेशन चेक करने वाले का ट्विटर हैंडल देख सकते हैं, जिसने किसी वीडियो या तस्वीर की सच्चाई का पता लगाया हो.
4. फ़ेसबुक का फैक्ट चेकिंग टूल
फ़ेसबुक पर काफी फ़र्ज़ी ख़बरें फैलाई जाती हैं. इस समस्या से निपटने के लिए फ़ेसबुक ने एक टूल लॉन्च किया, जिसमें यूजर्स को उस आर्टिकल के सच होने पर ऐतराज़ जताने वाले किसी फैक्ट चेकर की जानकारी दी जाती है.
'पॉएंटर इंस्टीट्यूट फॉर मीडिया स्टडीज' की आचार संहिता का पालन करने वाले फैक्ट चेकर्स की जानकारी ही यहां आपको मिलती है. इसमें दुनिया भर के फैक्ट चेकर्स शामिल हैं, लेकिन इसके साथ एक समस्या यह है कि कई मेनस्ट्रीम फैक्ट चेकिंग वेबसाइटों की विश्वसनीयता भी संदिग्ध है. इसलिए इससे फेक न्यूज़ को रोकने में ज़्यादा मदद नहीं मिलेगी.
5. गूगल ट्रांसलेट
इस लिस्ट में गूगल ट्रांसलेट का नाम आपको चौंका सकता है, लेकिन बता दें कि ये भी काफी काम की चीज़ है. व्हाट्सऐप पर फॉरवर्ड किए जाने वाले संदेशों और लेखों में कई बार ऐसी भाषा का इस्तेमाल होता है, जिसे शायद संदेश प्राप्त करने वाला न समझता हो.
इसके साथ उसका अनुवाद भी संदेश में होता है. उस अनुवाद पर सीधे भरोसा करने के बजाय आप मूल कथ्य को गूगल ट्रांसलेट में डालकर उसकी सच्चाई का पता लगा सकते हैं. हो सकता है कि दूसरी भाषा में जो बात लिखी गई हो, उसका कुछ और ही मतलब हो.
इस साल फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान एक ट्वीट आया, जिसमें यह दावा किया गया था कि चरमपंथी संगठन अलक़ायदा इमैनुएल मैक्रों का समर्थन कर रहा है. यह ट्वीट वायरल हो गया था.

इमेज स्रोत, Twitter
इस ट्वीट में अलक़ायदा के सहयोगी अख़बार अल मसरा की एक ख़बर का स्क्रीनशॉट लगा था. जबकि उस लेख में मैक्रों का समर्थन नहीं किया गया था और यह उनकी उस साल की अल्जीरिया यात्रा के बारे में था
(ये लेख बीबीसी हिंदी और 'द क्विंट' की साझा पहल 'स्वच्छ डिजिटल इंडिया' का हिस्सा है. इसी मुद्दे पर 'द क्विंट' का अंग्रेज़ी लेख यहाँ पढ़िए.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












