नज़रिया: सुप्रीम कोर्ट ने केजरीवाल को आईना दिखाया या एलजी को

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- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बुनियादी संदेहों को दूर किया है. उसने स्पष्ट किया है कि चुनी हुई सरकार के काम में दख़लंदाज़ी नहीं होनी चाहिए.
फ़ैसले करने वाली उसकी शक्तियों को सीमित नहीं किया जा सकता. लोकतंत्र में वास्तविक शक्ति चुने हुए प्रतिनिधियों में होनी चाहिए.
अदालत ने कहा है कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अधिकार की एकतरफ़ा पूर्णता (एब्स़ॉल्यूटिज़्म) की कोई जगह नहीं है, दूसरी तरफ़ अराजकता (एनार्की) का भी कोई स्थान नहीं है. केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों पर की गई इस टिप्पणी पर ग़ौर करना चाहिए.

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हालांकि दोनों पक्ष इसे अपनी जीत बता रहे हैं, पर ज्यादा महत्वपूर्ण वो फटकार है, जो फ़ैसले की पंक्तियों के बीच से पढ़ी जा सकती है. दोनों पक्षों को इसे कड़वी सलाह की तरह स्वीकार करना चाहिए.
अदालत ने साफ़ शब्दों में कहा है कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के अधीन विषयों में उसकी 'एड एंड अडवाइस' मानने को बाध्य हैं.
वे पूर्ण प्रशासक नहीं हैं, बल्कि सीमित अर्थ में प्रशासक हैं. इस अर्थ में उनकी भूमिका 'अड़ंगा' लगाने वाले निकाय की नहीं है.
अदालत की यह टिप्पणी कई चीज़ों को स्पष्ट कर देती है.
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इसके पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि एलजी दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने इतने कठोर अर्थ में एलजी को निरंकुश प्रशासक नहीं माना. अदालत के अनुसार उन्हें चुनी हुई सरकार के फ़ैसलों को स्वीकार करना चाहिए, रोकना नहीं चाहिए.
अदालत ने एनार्की शब्द का इस्तेमाल करके दिल्ली सरकार को भी एक प्रकार से चेताया है. आए दिन का धरना-प्रदर्शन उसे शोभा नहीं देता.
यह फ़ैसला वैसा ही है, जैसे कोई बुज़ुर्ग दो बच्चों से कहे कि 'मिलकर खेलो, आपस में लड़ो नहीं.'
अदालत का यह फ़ैसला केंद्र और राज्य सरकार को मौक़ा दे रहा है कि वे संवैधानिक-प्रावधानों के अर्थ को समझें और मिलकर दिल्ली की व्यवस्था चलाएं.
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अपनी-अपनी जीत के ढोल
फ़ैसले से साफ़ है कि दिल्ली विशेष दर्जे के रूप में केंद्र शासित क्षेत्र है, पूर्ण राज्य नहीं.
इसलिए यहाँ के उपराज्यपाल की अलग भूमिका है. बेशक वह राज्यों के राज्यपाल की तरह रबर स्टाम्प नहीं है, पर उसे चुनी हुई सरकार को फ़ैसले करने का मौक़ा देना चाहिए, उनमें अवरोध खड़े नहीं करने चाहिए.
इस फ़ैसले को आम आदमी पार्टी और केंद्र सरकार दोनों ने अपनी जीत बताना शुरू कर दिया है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के अनुसार यह दिल्ली के लोगों की बड़ी जीत है.
आप नेता राघव चड्ढा ने कहा है कि ज़मीन, पुलिस और क़ानून-व्यवस्था इन तीन विषयों को छोड़कर चाहे वह कर्मचारियों का तबादला हो या दूसरी शक्तियां हों, वे सब दिल्ली सरकार के अधीन होंगी.


बीजेपी वाले इसे अपनी जीत बता रहे हैं. अजय माकन और शीला दीक्षित समेत कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया है कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है.
अब दिल्ली सरकार को अपनी सीमाएं समझ लेनी चाहिए.

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क्या विवाद सुलझ गया?
कहना मुश्किल है कि इस फ़ैसले के बाद राजनीतिक स्तर पर विवाद सुलझ जाएगा. दोनों पक्ष अपने-अपने निष्कर्षों पर पहुँचे हैं, तो भविष्य में भी वे उन्हें इसी रूप में लेंगे.
अदालत के फ़ैसले का सार है कि मिल-जुलकर काम करो. उपराज्यपाल कैबिनेट की सलाह मानेंगे.
पर यदि एलजी और दिल्ली सरकार में मतभेद हुआ, तो मामले को राष्ट्रपति के पास भेजा जा सकता है. इसका अर्थ क्या हुआ?
अदालत ने इसे साफ़ करने की कोशिश की है. उसने कहा है कि एलजी मशीनी तरीक़े से मामलों को राष्ट्रपति के पास नहीं भेजेंगे, बल्कि अपने दिमाग़ को लगाएंगे. वे चुनी हुई सरकार के फ़ैसलों का सम्मान करेंगे वगैरह.
अदालत ने यह भी बताया है कि एलजी और सरकार के मतभेद किस आधार पर हो सकते हैं. यह अंतर वित्तीय, पॉलिसी और केंद्र को प्रभावित करने वाले मामलों में होना चाहिए.
बहरहाल यह भी साफ़ है कि मतभेद की स्थिति में अंतिम फ़ैसला केंद्र सरकार का होगा.

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दायरे के भीतर काम करना होगा
फ़ैसले से स्पष्ट है कि भूमि, पुलिस और क़ानून-व्यवस्था तीनों दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं. पर अपने दायरे में दिल्ली सरकार अपने काम करने को स्वतंत्र है.
यानी कि कोई फ़ैसला करने के पहले उसे एलजी की अनुमति लेने की ज़रूरत नहीं पर उसकी सूचना देनी होगी.
अदालत चाहती है कि छोटे-छोटे मामलों में मतभेद नहीं होना चाहिए. मतभेद हो तो मामले को राष्ट्रपति के पास भेजें.
वर्तमान संवैधानिक-व्यवस्था भी यही है, केवल इसकी व्यावहारिकता को लेकर विवाद था. वह विवाद अब ख़त्म हो गया, इसे विश्वास के साथ कहा नहीं जा सकता.
इस फ़ैसले को अच्छी तरह पढ़ने के बाद कुछ और बातें साफ़ होंगी. एक बात ज़रूर कही जा रही है कि दिल्ली सरकार अपने कर्मचारियों पर कार्रवाई कर सकती है. उधर यह भी साफ़ हुआ है कि एंटी-करप्शन ब्यूरो उसके अधीन नहीं है. वह पुलिस का हिस्सा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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