क्यों है भारतीय महिलाओं में विटामिन-डी की कमी?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
क्या आप जानते हैं :
- उत्तर भारत में रहने वाली तक़रीबन 69 फ़ीसदी महिलाओं में विटामिन-डी की कमी है.
- तक़रीबन 26 फ़ीसदी महिलाओं में विटामिन-डी पर्याप्त है.
- केवल 5 फ़ीसदी महिलाओं में ही सही मात्रा में विटामिन-डी पाया जाता है.
भारत में हुए शोध में इस बात का पता चला है. एम्स, सफदरजंग और फोर्टिस अस्पताल के डॉक्टरों ने मिलकर ये शोध किया है.
रिपोर्ट में जो बातें निकल कर सामने आई हैं वो चौंकाने वाली हैं.
यूं तो विटामिन-डी का सीधा संबंध धूप से है. सूर्य की किरणों से मिलने वाला विटामिन स्वस्थ हड्डियों के लिए ही नहीं बल्कि शरीर के प्रतिरोधी तंत्र के लिए भी बहुत ज़रूरी है.
चूंकि भारतीय महिलाएं ज़्यादातर घर के कामकाज में व्यस्त रहती हैं इस वजह से धूप का सेवन कम करती हैं.
दूसरी वजह है भारतीय महिलाओं का परिधान. अकसर भारतीय महिलाएं या तो साड़ी पहनती हैं या तो सूट. इस वजह से उनका हर अंग कपड़ों से ढका रहता है. ये भी महत्वपूर्ण वजह है विटामिन-डी के कमी की.

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तीसरी वजह, महिलाओं में होने वाला हॉर्मोनल बदलाव. मेनोपोज़ के बाद और बच्चों को दूध पिलाने वाली महिलाओं में ये दिक्क़त ज़्यादा देखने को मिलती है.
पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा, आर वेंकटरमन और प्रणब मुखर्जी के फ़ीज़िशियन रह चुके डॉ. मोहसीन वली के मुताबिक़ विटामिन डी की कमी की एक चौथी वजह भी है.
उनके मुताबिक़ "अकसर लोग समझते हैं कि धूप ना मिलने की वजह से ही विटामिन-डी की कमी होती है. ये एक वजह है लेकिन एकमात्र वजह नहीं है."
"विटामिन-डी की कमी की बहुत बड़ी वजह खाने में रिफाइंड तेल का इस्तेमाल है. रिफाइंड तेल के इस्तेमाल की वजह से शरीर में कोलेस्ट्रॉल मॉलिक्युल (कण) कम बनते हैं. शरीर में विटामिन-डी बनाने में कोलेस्ट्रॉल के कणों का काफी योगदान होता है. इसकी वजह से विटामिन-डी को शरीर में प्रोसेस करने में दिक्क़त आने लगती है."

तो क्या खाने में रिफाइंड तेल का इस्तेमाल बिल्कुल बंद कर देना चाहिए?
इस सवाल के जवाब में डॉ. वली कहते हैं, "कोशिश ज़रूर करनी चाहिए. अगर एक बार में ऐसा करना संभव न हो तो धीरे-धीरे घी और सरसों के तेल पर निर्भरता बढ़ाई जा सकती है."
रिफाइंड में ट्रांस फ़ैट ज़्यादा होता है. ट्रांस फ़ैट शरीर में अच्छे कोलेस्ट्रॉल को कम करता है और बुरे कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाता है. इस वजह से दूसरी बीमारियों का भी ख़तरा बढ़ता है.
विटामिन-डी की सही मात्रा
विटामिन-डी की मात्रा खून में 75 नैनो ग्राम हो तो ही सही माना जाता है.
जब खून में विटामिन-डी की मात्रा 50 से 75 नैनो ग्राम के बीच होती है तो व्यक्ति में विटामिन डी की मात्रा को अपर्याप्त माना जाता है.

डॉक्टरों के मुताबिक़, खून में विटामिन-डी की मात्रा 50 नैनो ग्राम से कम हो तो उस शख्स को विटामिन-डी की कमी का शिकार मानते हैं.
डॉ. वली की मानें तो विटामिन-डी की कमी को भारत सरकार को महामारी करार दे देना चाहिए क्योंकि 95 फ़ीसदी महिलाएं इससे पीड़ित हैं.
वो कहते हैं "ऐसा नहीं है कि पुरुषों को ये बीमारी नहीं होती. लेकिन महिलाओं के मुक़ाबले उनमें ये दिक्क़त कम पाई जाती है."
आज ज़्यादातर भारतीयों में विटामिन-डी 5 से 20 नैनोग्राम के बीच में पाया जाता है.
विटामिन-डी की कमी के लक्षण
बिना काम के जल्दी थकान, जोड़ों में दर्द, पैरों में सूजन, लंबे वक्त तक खड़े रहने में दिक्कत, मांस-पेशियों में कमज़ोरी, विटामिन-डी की कमी के ये लक्षण है.
ये ऐसे लक्षण हैं जिन्हें लोग ज़्यादा गंभीरता से नहीं लेते. दरअसल यही नुकसान की सबसे बड़ी वजह है. विटामिन-डी की कमी धीरे-धीरे शरीर के सभी हिस्सों को कमज़ोर बना देती है जिसकी वजह से बुढ़ापे में हड्डियों, मांसपेशियों और जोड़ो में ज़्यादा दर्द होता है.

विटामिन-डी की कमी से नुकसान
डॉक्टरों के मुताबिक़, विटामिन-डी की कमी से सीधे कोई नुकसान नहीं होता. लेकिन शरीर में विटामिन-डी की कमी हो तो शरीर में कैल्शियम सोखने की क्षमता कम हो जाती है और शरीर में दूसरी दिक्क़तें शुरू हो जाती हैं.
इस वजह से हड्डियों, मांसपेशियों और जोड़ो में सबसे अधिक दिक्क़त आती है. सबसे ज़्यादा ख़तरा हड्डियों के फ़्रैक्चर होने का होता है.
भारत में हुए शोध में पाया गया है कि जिन महिलाओं में विटामिन-डी की कमी है, उनमें डायबिटीज़ का ख़तरा ज़्यादा होता है. इसके लिए उत्तर भारत की 800 महिलाओं पर शोध किया गया, जिनकी उम्र 20 से 60 साल के बीच थी.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध की बात करें तो ब्रिटेन में इस पर काफ़ी काम हुआ है. ब्रिटेन की 'न्यूरोलॉजी' नाम की पत्रिका में छपे शोध में कहा गया है कि विटामिन-डी की कमी से उम्रदराज़ लोगों में पागलपन का ख़तरा बढ़ जाता है. इस शोध के लिए 65 साल से अधिक की उम्र के 1,650 से अधिक लोगों पर अध्ययन किया गया, जिसके बाद इस नतीजे पर पहुंचा गया है.
ऐसा ही एक शोध यूनिवर्सिटी ऑफ़ एकेस्टर मेडिकल स्कूल में हुआ. वहां डेविड लेवेलिन के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय टीम ने लगभग छह साल तक उम्रदराज़ लोगों पर शोध किया. शोध से पहले इन सभी व्यक्तियों में पागलपन, दिल की बीमारियां और दिल क दौरा जैसी बीमारियां नहीं थीं.
अध्ययन के अंत में पाया गया कि 1,169 लोगों में विटामिन-डी का स्तर अच्छा था और उनमें 10 में से एक व्यक्ति में पागलपन का ख़तरा होने की आशंका थी. जिन 70 व्यक्तियों में विटामिन-डी का स्तर बहुत कम था, उनमें से पाँच में से एक में पागलपन का ख़तरा होने की आशंका जताई गई.

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विटामिन-डी की कमी कैसे दूर करें
एम्स में हड्डियों के विभाग में डॉक्टर सी एस यादव के मुताबिक़, "खाने के ज़रिए विटामिन- डी की कमी को दूर करना थोड़ा मुश्किल है. अंडे के पीले वाले हिस्से में और कुछ ख़ास तरह की मछली में विटामिन-डी पाया जाता है. इसलिए विटामिन-डी की कमी को दूर करने का सबसे अच्छा उपाय है धूप में कम कपड़ों के साथ घूमना और विटामिन-डी का ओरल सप्लीमेंट लेना".
कम कपड़ो का विटामिन डी से क्या संबंध है?
इस सवाल के जवाब में डॉ. यादव कहते हैं, " आम तौर पर लोग पूरी बाजू वाली शर्ट, सूट, पैंट, सलवार या फिर साड़ी पहन कर अगर आप धूप में चलें तो आपको बहुत कम विटामिन-डी मिलेगा. ऐसा इसलिए क्योंकि ऐसी स्थिति में केवल मुंह ही खुला होता है. शरीर का ज़्यादा हिस्सा धूप के संपर्क में हो तो विटामिन-डी कम समय में ज़्यादा मिल सकती है."
ऐसे में सवाल उठता है कि आमतौर पर कितना घंटा धूप में रहना फायदेमंद होता है?

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वैसे तो इसका कोई तय फ़ॉर्मूला नहीं है लेकिन डॉक्टर कहते हैं एक घंटा रोज़ धूप में रहने से विटामिन-डी की कमी की समस्या से निजात मिल सकती है. ये एक स्टैंडर्ट फ़ॉर्मूला है.
वैसे सुबह और शाम की धूप में बाहर ठहलना ज़्यादा अच्छा माना जाता है, लेकिन डॉ. यादव कहते हैं कि किसी भी समय की धूप में एक्सपोज़ होने पर काम बन सकता है.
विटामिन-डी की कमी से निपटने में ओरल सप्लीमेंट बहुत कारगर होता है. आठ हफ़्ते तक हर हफ़्ते विटामिन-डी के ओरल सप्लीमेंट खाए जाएं तो ये कारगर होता है.
आमतौर पर एक हफ़्ते में 60 हज़ार यूनिट की विटामिन-डी सप्लीमेंट से लेने की ज़रूरत पड़ती है.
वैसे भारत की भोगौलिक स्थिति ऐसी है जहां साल भर धूप अच्छी मिलती है, इसके बावजूद अगर भारत में ये समस्या तेज़ी से पैर पसार रही है तो ये बेहद गंभीर है.
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