ट्रोल्स का इलाज है तो सुषमा स्वराज इतनी लाचार क्यों हैं?

सुषमा स्वराज, सोशल मीडिया, इंटरनेट, ट्रोल

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मुसलमान युवक से शादी करने वाली हिंदू महिला के पासपोर्ट को लेकर हुए विवाद के सिलसिले में ट्रोल हो रहीं भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अब एक नया ऑनलाइन पोल करवाया है.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 30 जून को एक ट्वीट किया.

"दोस्तों : मैंने कुछ ट्वीट लाइक किए हैं. पिछले कुछ दिनों से मेरे साथ ऐसा हो रहा है. क्या आप ऐसे ट्वीट्स को स्वीकार करते हैं? क्या ये सही है? प्लीज़ रिट्वीट करें."

ये एक तरह से उनका ख़ुद का कराया गया ऑन-लाइन पोल था.

उन्होंने पोल के नतीजें भी जनता से शेयर किए. उनके इस सवाल के जवाब में 57 फ़ीसदी लोगों ने 'ना' कहा. 43 फीसदी लोगों ने 'हां' में जवाब दिया.

सुषमा स्वराज के इस पोल में कुल 1 लाख 24 हजार तीन सौ पांच लोगों ने वोट किया. (30 जून तक के आंकड़े)

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अब देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने भी इस मुद्दे पर सुषमा स्वराज का साथ दिया है.

दरअसल, सुषमा स्वराज पिछले 10 दिनों से ट्विटर पर इस तरह से लोगों के 'अपशब्द' का शिकार हो रही हैं. कुछ लोग इसे ट्रोलिंग कह रहे हैं, तो कुछ इसे सुषमा स्वराज के कामकाज पर अपनी राय बता रहे हैं. हालांकि सुषमा स्वराज ने अपने पोस्ट में खुद ऐसे लोगों को ट्रोल नहीं कहा है.

मामला उस वक़्त और आगे बढ़ गया जब उनके पति स्वराज कौशल ने एक ट्विटर यूज़र का स्क्रीन शॉट ट्वीट किया जिसमें उनसे कहा गया कि वो उनकी (सुषमा) पिटाई करें और उन्हें मुस्लिम तुष्टिकरण न करने की बात सिखाएं.

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हालांकि स्वराज कौशल ने सुषमा का साथ देते हुए ट्वीट किया, "आपके शब्दों ने हमें असहनीय दुख दिया है. आपको एक बात बता रहा हूं कि मेरी मां का 1993 में कैंसर से निधन हो गया. सुषमा एक सांसद और पूर्व शिक्षा मंत्री थीं. वो एक साल अस्पताल में रहीं. उन्होंने मेडिकल अटेंडेंट लेने से मना कर दिया और मेरी मां की ख़ुद देखभाल की."

लेकिन कहानी यहां से शुरू नहीं होती.

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पूरा विवाद तन्वी सेठ पासपोर्ट विवाद से जुड़ा है.

मुसलमान युवक से शादी करने वाली हिंदू महिला के पासपोर्ट को लेकर हुए विवाद के सिलसिले में सुषमा स्वराज ट्रोल हो रहीं थी. 24 जून को सुषमा स्वराज ने ऐसे कुछ ट्वीट्स को री-ट्वीट किया जिनमें उन्हें अपशब्द कहे गए थे. इसके साथ ही सुषमा स्वराज ने जानकारी दी कि जिस समय पासपोर्ट को लेकर यह विवाद हुआ, उस दौरान वह देश से बाहर थीं.

विदेश मंत्री ने ट्वीट करके लिखा, "मैं 17 से 23 जून के बीच भारत से बाहर थी. मेरी ग़ैर-मौजूदगी में क्या हुआ मुझे नहीं मालूम. ख़ैर, मैं कुछ ट्वीट्स से बहुत सम्मानित महसूस कर रही हूं. मैं उन ट्वीट्स को आप सभी के साथ साझा कर रही हूं, इसलिए मैंने उन्हें लाइक किया है."

सवाल ये उठता है कि केन्द्रीय मंत्री के साथ जब सोशल मीडिया पर ऐसा हो सकता है तो फिर देश की बाक़ी महिलाओं के लिए सोशल मीडिया कितना सुरक्षित है?

आख़िर विदेश मंत्री इतनी लाचार क्यों है?

वैसे ये बात भी सच है कि सोशल मीडिया पर इस तरह से ट्रोल्स का शिकार होने वाली वो अकेली मंत्री नहीं हैं.

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महिला एवं बाल कल्याण मंत्री मेनका गांधी ने दो साल पहले #IamTrolledHelp सेवा लांच की थी. 2016 जुलाई के पहले हफ़्ते में लॉन्च की गई इस योजना के तहत उन्होंने महिलाओं से अपील की थी कि वो उन्हें ट्वीट और ई-मेल के ज़रिए सोशल मीडिया पर बद्तमीज़ी और छेड़छाड़ की शिकायत उन्हें भेजें.

लेकिन उनकी इस पहल पर उन्हीं को ट्रोल किया जाने लगा. इसके बाद उन्होंने ट्वीट कर सफ़ाई भी दी. उन्होंने लिखा, "इंटरनेट पर लिखने की आज़ादी पर रोकटोक नहीं होगी, मंत्रालय तभी कार्रवाई करेगा जब बद्तमीज़ी, प्रताड़ना या घृणित काम की शिकायत आएगी."

#IamTrolledHelp की शुरूआत के बाद मंत्रालय को पहले छह महीने में 56 शिकायतें आईं. जिनमें से 29 को जांच के बाद बंद कर दिया गया. इनमें से कुछ में शिकायत करने वालों ने बाद में जांच में सहयोग नहीं किया, तो कुछ के सोशल मीडिया अकाउंट ही डिएक्टिवेट हो गए.

#IamTrolledHelp में शिकायतकर्ता से सबसे पहले पूछा जाता है कि सोशल मीडिया के जिस प्लेटफ़ॉर्म पर उनके साथ ऐसा हुआ वहां शिकायत दर्ज कराई है या नहीं.

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मसलन, अगर बद्तमीज़ी ट्विटर पर हुई है, तो सबसे पहले ट्रोल की शिकार महिला को ट्विटर से शिकायत करनी पड़ेगी. और अगर वहां से कोई समाधान नहीं सुझाया गया तभी मंत्रालय की मदद मिल सकती है.

ऐसी सूरत में शिकायतकर्ता की शिकायत को फिर मंत्रालय पुलिस, महिला आयोग और दूसरे संबंधित विभाग के ज़रिए फ़ॉलो-अप करती है.

हालांकि राष्ट्रीय महिला आयोग की तत्कालीन अध्यक्ष ने तुरंत ही मेनका गांधी की योजना में फ़ॉलो-अप करने से ये कहते हुए मना कर दिया कि इंटरनेट का संसार बहुत बड़ा है और हर ट्रोल पर नज़र रखना उनके विभाग के लिए संभव नहीं है.

महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय की सूचना अधिकारी नाविका के मुताबिक #IamTrolledHelp सुविधा आज भी चल रही है लेकिन इसमें अब शिकायतें कम आ रही हैं.

साफ़ है, केन्द्र सरकार की तरफ से ट्रोल को पकड़ने की जो मुहिम चलाई गई थी, वो कामयाब नहीं रही.

ट्रोल्स की परिभाषा

भारत में ट्रोल्स को परिभाषित नहीं किया गया है, हर जानकार इसे अपनी तरह से परिभाषित करते हैं.

साइबर लॉ एक्सपर्ट पवन दुग्गल कहते हैं, "वो व्यक्ति जो इंटरनेट पर ऐसी गतिविधि करे जिससे आपका मानिसक संतुलन बिगड़े वो ट्रोलिंग है."

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट एवं साइबर लॉ एक्सपर्ट विराग गुप्ता कहते हैं, "कोई भी व्यक्ति पांच अनचाहे मैसेज किसी अकाउंट से भेजता है, तो उसे ट्रोल कहा जा सकता है."

ट्रोल शब्द की उत्पत्ति की बात करें तो स्कैनडिनेवियन देशों की पौराणिक कथा में इसका ज़िक्र मिलता है, जिसका इस्तेमाल बुरी भावना वाले ऐसे प्राणी के लिए किया जाता है जो मानव जाति से न हो, या जिसमें राक्षसी प्रवृत्ति हो.

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क्या है ट्रोल्स का इलाज?

विराग गुप्ता कहते हैं, सुषमा स्वराज मामले के तूल पकड़ने के बाद कार्रवाई के डर से सुषमा स्वराज को ट्रोल कर रहे अनेक लोगों ने अपना ट्वीटर अकाउंट ही डिलीट कर दिया. इससे यह जाहिर है कि ट्रोल करने वाले अधिकांश लोग गुमनाम या फ़र्जी नामों से ऑपरेट करते हैं और यदि ऐसे अकाउंट्स पर लगाम लग जाये तो ट्रोलिंग की समस्या को नियन्त्रित किया जा सकता है."

उनके मुताबिक, "देश में बैंक एकाउंट में केवाईसी और किरायेदारों के सत्यापन के लिए कानून की अनिवार्यता है. ट्वीटर में भी वेरीफायड अकाउंट के माध्यम से ग्राहकों का सत्यापन किया जाता है."

ट्वीटर द्वारा जारी 2016 के आंकड़ों के अनुसार 1.9 लाख या सिर्फ .061 फीसदी ट्वीटर एकाउंट की वेरिफ़ाइड हैं.

लेकिन विराग कहते हैं कि अकाउंट वेरिफ़ाइड होने से ही समस्या का समाधान नहीं हो जाएगा क्योंकि कई बार वेरिफ़ाइड अकाउंट से भी ट्रोलिंग की जाती है.

विराग गुप्ता के मुताबिक, "भारत में पब्लिक रिकॉर्ड्स एक्ट के तहत सोशल मीडिया अकाउंट भारत सरकार का आधिकारिक संवाद केन्द्र हैं. भारतीय कानून के अनुसार सोशल मीडिया कम्पनियों को भारत में शिकायत अधिकारी की नियुक्ति करनी चाहिए."

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कई बार ट्रोल की शिकार हुई पत्रकार साक्षी जोशी कहती हैं, "जब मैंने अपनी ट्रोलिंग की शिकायत पुलिस से की और ट्विटर पर टैग करते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को लिखा तब एक बार वो ट्रोलर को सूरत से पकड़ कर लाए. तो ऐसा नहीं है कि ट्रोल्स पकड़े नहीं जाते."

देश में अलग अलग मौके पर कोर्ट के अलग अलग फैसलों का हवाला देते हुए विराग कहते हैं, "ट्रोलिंग जैसी समस्याओं के निदान के लिए केएन गोविन्दाचार्य ने दिल्ली उच्च न्यायालय ने याचिका दायर किया था, जिसमें अदालत ने अगस्त 2013 में अनेक आदेश पारित किये थे. सोशल मीडिया के ग्राहकों के अकाउंट का सत्यापन होने के साथ भारत में शिकायत अधिकारी की नियुक्ति हो जाये तो इस समस्या पर लगाम लग सकती है. दूसरी ओर मद्रास हाईकोर्ट ने एक मामले में कहा है कि री-ट्वीट के लिए भी कानूनी जवाबदेही तय की जाए."

पवन दुग्गल के मुताबिक, "भारत में अलग से ट्रोल्स से निपटने के लिए कानून नहीं है, लेकिन आईटी एक्ट में प्रवाधान है जिसके तहत सरकार कंपनियों के साथ मिल कर ट्रोल्स पर कार्रवाई के लिए उन्हें बाध्य कर सकती है. सुषमा स्वराज तो सरकार में ताकतवर मंत्री हैं, ये काम उनके स्तर पर मुश्किल बिल्कुल नहीं है."

जानकारों का मानना है कि देश में डिजिटल साक्षरता की कमी है जिसके कारण पुलिस भी लाइक और शेयर करने पर मनमाफ़िक तरीक़े से आपराधिक मामले दर्ज़ कर लेती है. सोशल मीडिया में संगठित आपराधिक समूहों के विरुद्ध कार्रवाई करने से ही ट्रोलिंग पर लगाम लग पाएगी.

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ट्रोलिंग की शिकार महिलाएं

रिसर्च बताते हैं कि क़रीब 40 फ़ीसद अमेरिकी वयस्क नागरिक ऑनलाइन ट्रोलिंग के शिकार हुए हैं. उनसे गाली-गलौज, बदसलूकी वाला बर्ताव किया गया. इसमें महिलाओं की तादाद बहुत ज़्यादा है.

ब्रिटेन में महिला सांसदों को अक्सर ऑनलाइन ट्रोलिंग झेलनी पड़ती है. एक रिसर्च से पता चला कि ब्रिटेन कुल महिला सांसद जितनी ट्रोलिंग की शिकार हुई, उनमें से आधे के निशाने पर तो अकेले अश्वेत महिला सांसद डाएन एबॉट थीं.

भारत के लिए हालांकि ऐसे कोई आंकड़े सामने नहीं आए हैं.

भारत की ही तरह ज़्यादातर देश ऑन-लाइन अब्यूज़ के लिए बने क़ानून के तहत ही ट्रोल्स से निपटते हैं. हालांकि ब्रिटेन में लॉ कमिशन इसके लिए अलग से क़ानून बनाने की तैयारी में है.

फ़िलहाल इस बात की कोई सूचना नहीं है कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने उनके ट्विटर पर लिखे जा रहे अपशब्दों के लिए पुलिस में जाकर कोई शिकायत की है. लेकिन देर से ही सही गृह मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी, का सुषमा स्वराज के समर्थन में आना और इसकी निंदा करना, अलग थलग पड़ी सुषमा स्वराज के लिए शुभ संकेत जरूर है.

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