असम में हिरासत से रिहा हुए 102 साल के 'विदेशी'

चंद्रधर दास
इमेज कैप्शन, चंद्रधर दास तीन माह से हिरासत में थे
    • Author, अमिताभ भट्टासाली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पूर्वोत्तर राज्य असम की जेल से एक 102 वर्षीय व्यक्ति को रिहा किया गया है. क़ैद से रिहा हुए इस व्यक्ति के पास भारत की नागरिकता साबित करने वाले कई दस्तावेज़ होने के बावजूद एक ट्राइब्यूनल ने उन्हें विदेशी माना था.

अवैध प्रवासियों की पहचान करने के लिए गठित विशेष ट्राइब्यूनल के आदेश के बाद ऐसे ही क़रीब नो सौ लोग 'विदेशी' ठहराए जाने के बाद हिरासत में हैं. इनमें से लगभग सभी लोग बंगाली भाषी मुसलमान या हिंदू हैं.

चंद्रधर दास 1966 में तत्कालीन पूर्व पाकिस्तान के कोमिला ज़िले से भारत पहुंचे थे. त्रिपुरा में कुछ साल रहने के बाद उन्होंने असम के कछार ज़िले की बारक घाटी को अपना ठिकाना बनाया.

भारत पहुंचने के बाद सरकार ने दास को पंजीकरण प्रमाणपत्र दिया था. बाद में उनका नाम मतदाता सूची में भी शामिल कर लिया गया.

दास की वकील सुमन चौधरी कहती हैं, "अपनी ख़राब सेहत और बीमारी की वजह से दास कई चुनावों में मतदान नहीं कर सके. इसके बाद उन्हें डी-वोटर या संदिग्ध मतदाता मान लिया गया. ये दास को विदेशी या अवैध अप्रवासी मानने की प्रक्रिया का पहला क़दम था. हालांकि जांच के बाद चुनाव आयोग के कर्मचारियों ने उनका नाम फिर से मतदाता सूची में शामिल कर लिया. लेकिन स्थानीय पुलिस थाने में उनका मामला चलता रहा जिसे बाद में विदेशियों के लिए बनाए गए ट्राइब्यूनल में भेज दिया गया."

चंद्रधर दास
इमेज कैप्शन, चंद्रधर दास के पास पंजीकरण प्रमाणपत्र था

ट्राइब्यूनल ने अपने आदेश में चंद्रधर दास को विदेशी माना और पुलिस ने इस साल मार्च में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया. उन्हें सिलचर जेल के भीतर संचालित हिरासत कैंप में भेज दिया गया.

क़रीब तीन माह क़ैद में रहने के बाद दास अब ज़मानत पर रिहा हुए हैं.

अच्छा सलूक किया गया

सुमन चौधरी कहती हैं, "ये मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हैं. जब राज्य किसी व्यक्ति पर कोई अपराध तय करता है तो अपराध साबित करना राज्य की ज़िम्मेदारी होती है. लेकिन इस क़ानून के तहत आप एक व्यक्ति को हिरासत में रखते हो और उसी पर अपने आप को भारत का नागरिक साबित करने की ज़िम्मेदारी डाल दी जाती है. दास जैसे बहुत से लोग हैं जिन्हें अचानक पता चला कि वो भारत के नागरिक ही नहीं है."

अधिक उम्र की वजह से जेल में चंद्रधर दास के साथ अच्छा सलूक किया गया. लेकिन अन्य लोग जिन्हें विदेशी कहकर हिरासत में रखा गया है उनके साथ इतना अच्छा व्यवहार नहीं होता.

इस समय असम में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर बनाने पर काम चल रहा है. साल 1951 के बाद से ये पहली बार हो रहा है. 30 जून को पहला राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर प्रकाशित किया जाना था लेकिन बराक घाटी में आई बाढ़ के कारण ये अब देरी से प्रकाशित होगा. बंगाली भाषी हज़ारों हिंदू और मुसलमान नागरिक व्याकुलता से अपने नाम के इस रजिस्टर में होने का इंतज़ार कर रहे हैं.

मतदाता

इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन, सांकेतिक तस्वीर

इसके साथ-साथ विदेशियों की पहचान करने की प्रक्रिया यहां सालों से चल रही है. कई ज़िलों में विशेष विदेशी पहचान ट्राइब्यूनल स्थापित किए गए हैं और जेलों के भीतर छह हिरासत कैंप संचालित किए जा रहे हैं.

बीबीसी ने इससे पहले कई बार ऐसे मामलो पर रिपोर्ट की है जब भारतीय नागरिक को संदिग्ध मतदाता बताया गया हो. किसी को विदेशी निर्धारित करने की दिशा में यही पहला क़दम होता है.

बंगाली भाषी मुसलमानों और हिंदुओं को इससे सबसे ज़्यादा दिक्कत हो रही है. ख़ासक बंगालियों के प्रभाव वाली बराक घाटी और यहां तक ब्रह्मपुत्र घाटी के कुछ क्षेत्रों में भी.

कोई जेल कोड नहीं

पूर्वोत्तयर भाषायी और नस्लीय सहयोग समिति में सलाहकार सांतानु नाइक कहते हैं, "ये हिरासत केंद्र जेलों के भीतर स्थापित किए गए हैं. विदेशी बताए गए किसी व्यक्ति को सामान्य जेल में रहने के लिए क्यों मजबूर किया जाना चाहिए. वो अपराधी नहीं है. इन हिरासत कैंपों के लिए कोई जेल कोड नहीं है. ये कैसे चल सकता है?"

नागरिकता रजिस्टर
इमेज कैप्शन, अपने दस्तावेज़ दिखाते हुए असम के एक गांव के बाशिंदे

मानवाधिकार अधिवक्ता अब्दुल बातिन खांडोकर एक अन्य मुद्दा उठाते हुए कहते हैं, "आप किसी को हिरासत में रख रहे हैं, लेकिन कब तक? क्या उन्हें उम्र भर हिरासत में रखा जाएगा या इन तथाकथित विदेशियों को उनके देश भेजा जाएगा? असम के मामले में ये तथाकथित विदेशी बांग्लादेशी बताए जाते हैं. लेकिन बांग्लादेश तो पहले ही कह चुका है कि उसका कोई नागरिक असम में नहीं है. तो फिर ये विदेशी कहां भेजे जाएंगे? क्या वो राष्ट्रविहीन बना दिए जाएंगे?"

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर को इन हिरासत कैंपों के हालात पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए कहा था. हालांकि जब आयोग ने उनकी रिपोर्ट का संज्ञान ही नहीं लिया तो मंदर ने आयोग से इस्तीफ़ा दे दिया था.

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