असम में बंगाली मुसलमानों से 'भेदभाव' का आरोप

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से, बीबीसी हिंदी के लिए
"वेरिफ़िकेशन करने आई बॉर्डर पुलिस सीधे मेरी और मेरे बेटे की फ़ोटो मांगने लगी. पूछने पर कहा कि आपके मामले को फ़ॉरेनर्स ट्राइब्यूनल में भेजना है. पुलिस ने मेरी नागरिकता से जुड़े काग़ज़ातों के बारे में पूछा तक नहीं. मैंने जब उनसे नए दिशा निर्देशों के बारे मे पूछा तो उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. बिना किसी तहक़ीक़ात के पुलिस सीधे घर आ जाती है. पिछले कुछ दिनों से हमें एनआरसी वेरिफ़िकेशन के नाम पर परेशान किया जा रहा है."
यह कहना है साल 2009 में भारतीय वायुसेना से रिटायर हुए असम के सादुल्लाह अहमद का.
इन दिनों असम में एनआरसी (नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटिजेंस) यानी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को लेकर बंगाली मुसलमानों की तरफ़ से ऐसे ही आरोप सामने आ रहे हैं. वहीं वेरिफ़िकेशन प्रक्रिया से गुज़र रहे बंगाली हिंदू भी एनआरसी अपडेट को लेकर काफ़ी डरे हुए हैं.
सादुल्लाह अहमद का आरोप है कि कुछ लोग उनके बंगाली मुसलमान होने के कारण उन्हें इस तरह की परेशानी में डाल रहे हैं.
उन्होंने बीबीसी से कहा,"सिस्टम की ग़लती के कारण मेरी बड़ी बहन को गुवाहाटी हाई कोर्ट ने विदेशी घोषित कर दिया है, लेकिन अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है. हमारी कुछ ग़लतियों की वजह से बहन की नागरिकता से जुड़े पुराने काग़ज़ात अदालत में पेश नहीं कर सके. जबकि मेरे पिता का नाम साल 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में है. मेरी बहन को विदेशी घोषित करने के बाद अब ये लोग मुझे भी फ़ॉरेनर्स ट्राइब्यूनल भेजना चाहते हैं."
सादुल्लाह कहते हैं, "एनआरसी को लेकर पिछले कुछ दिनों से मेरा पूरा परिवार काफ़ी तनाव में है.गुवाहाटी केंद्रीय विद्यालय में पढ़ रहा मेरा छोटा बेटा अकसर इन बातों से परेशान होकर रोने लगता है. वो कहता है, पापा हम एयरफ़ोर्स में असम से बाहर ही ठीक थे.पुलिस जिस कदर बात करती है मानो मैं कोई घुसपैठिया हूं. अगर में भारतीय नागरिक नहीं होता तो क्या मुझे भारतीय वायुसेना में नौकरी मिलती? अभी मैं गुवाहाटी के एकाउंटेंट जनरल (आडिट) कार्यालय में एक वरिष्ठ अधिकारी की हैसियत से काम कर रहा हूं. मेरी नागरिकता की वेरिफ़िकेशन के बाद ही मुझे नौकरी मिली है."

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एनआरसी अपडेट का काम जारी
दरअसल असम देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां एनआरसी को अपडेट करने का काम चल रहा है. आज़ादी के बाद पहली बार 1951 में एनआरसी तैयार की गई थी. असम में अपडेट की जा रही एनआरसी का फ़ाइनल ड्राफ्ट इसी महीने 30 जून को प्रकाशित करने की योजना है. लेकिन राज्य में आई बाढ़ की वजह से यह तारीख आगे भी खिसक सकती है.
इस बीच संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था द्वारा नियुक्त चार विशेष व्यक्तियों ने संयुक्त रूप से एनआरसी अपडेट के नाम पर असम में बंगाली मुसलमानों के साथ कथित भेदभाव पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को पत्र लिखा है.
बीते 11 जून को लिखे गए आठ पन्नों के इस पत्र में कहा गया है कि 'एनआरसी अपडेट प्रक्रिया ने असम में उन बंगाली मुसलमानों के बीच चिंता और भय को जन्म दे दिया है जो अपनी नागरिकता साबित करने के लिए आवश्यक दस्तावेज रखने के बावजूद एक विदेशी के रूप में कथित स्थिति के कारण लंबे समय से भेदभाव के शिकार होते रहे हैं.'
पत्र में आगे लिखा गया है कि 'जिन लोगों को अंतिम एनआरसी से बाहर रखा जाएगा, उन लोगों के निहितार्थों की रूपरेखा तैयार करने वाली कोई आधिकारिक नीति नहीं है. यह बताया गया है कि उन्हें विदेशी माना जाएगा और पूर्व जांच के अभाव में उनके नागरिकता अधिकारों को रद्द कर दिया जा सकता है. बाद में विदेशियों को ट्राइब्यूनल में अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कहा जा सकता है.'

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संयुक्त राष्ट्र की चिंता
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था के लिए काम करने वाले इन व्यक्तियों के पत्र पर ऑल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ के अध्यक्ष अजीजुर रहमान कहते हैं, "असम में जिस कदर नियमों के ख़िलाफ़ जाकर सरकारी अफ़सर एनआरसी अपडेट का काम कर रहे हैं, उससे हमें संदेह है कि बंगाली मुसलमान और बंगाली हिंदू में भेदभाव हो सकता है. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संस्था के लोगों ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को भेजे पत्र में जो बातें लिखी हैं वो काफ़ी जायज़ हैं. हम इस विषय पर असम सरकार और भारत सरकार को पहले ही ज्ञापन सौंप चुके हैं."
छात्र नेता रहमान ने कहा कि केंद्र सरकार को एनआरसी प्रक्रिया में इस तरह के मतभेद की जांच करवानी चाहिए क्योंकि सैकड़ों लोग इस तरह की परेशानियों का सामना कर रहे हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने ग्राम पंचायत के प्रमाण पत्र दाखिल करने वाले लोगों का नाम वेरिफ़िकेशन करने के बाद एनआरसी में शामिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं किया गया. क़रीब 29 लाख लोगों ने ग्राम पंचायत प्रमाण पत्र दाखिल किया था, लेकिन आधे से ज़्यादा लोगों का नाम नहीं आया."
इसके जवाब में प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता तथा असम वित्त निगम के अध्यक्ष विजय गुप्ता कहते हैं, "असम सरकार की तरफ़ से किसी के साथ भेदभाव करने का सवाल ही नहीं उठता. लेकिन अगर कोई अवैध प्रवासी है तो उसका नाम एनआरसी में नहीं आएगा. इसके अलावा फ़ाइनल ड्राफ्ट प्रकाशित करने के बाद भी दावा और आपत्ति के तहत लोग आवेदन कर सकेंगे."
"एनआरसी वेरिफ़िकेशन के नाम पर अगर किसी को परेशान किया जा रहा है तो उस अधिकारी की शिकायत करनी चाहिए. सरकार तुरंत कार्रवाई करेगी."

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असम में मुसलमान
असम में मुसलमानों की आबादी क़रीब 34 फ़ीसदी है. उनमें अधिकतर बंगाली मुसलमान हैं जो बीते सौ सालों के दौरान यहां आकर आबाद हुए हैं. ये लोग बेहद ग़रीब, अनपढ़ और अप्रशिक्षित मज़दूर हैं.
इस संदर्भ में गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील हाफिज़ रशीद अहमद चौधरी कहते हैं, "पिछले 31 दिसंबर से पहले एनआरसी की जो पहली सूची जारी की गई थी उसके तौर तरीके अलग थे. लेकिन अब अलग-अलग अधिसूचनाएं जारी की गई हैं जो सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के ख़िलाफ़ है. इन्हीं अधिसूचनाओं के कारण लोगों की परेशानियां बढ़ गई हैं."

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इन अधिसूचनाओं के बारे में जानकारी देते हुए चौधरी कहते हैं, "अगर किसी परिवार के एक सदस्य को फ़ॉरेनर्स ट्राइब्यूनल ने विदेशी घोषित कर दिया है तो बाकी लोगों का नाम एनआरसी में नहीं आएगा. भले ही उनके पास अपनी नागरिकता से जुड़े कितने भी काग़ज़ात क्यों न हों क्योंकि पुलिस ऐसे लोगों के नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ दिखाने के बाद भी संतुष्ट नहीं होती और मामले को फ़ॉरेनर्स ट्राइब्यूनल में भेज देती है."
असम में घुसपैठियों के ख़िलाफ़ साल 1979 से छह साल तक चले लंबे आंदोलन के बाद 15 अगस्त 1985 को केंद्र की राजीव गांधी सरकार और आंदोलनकारी नेताओं के बीच असम समझौता हुआ था. उसी समझौते के आधार पर सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में एनआरसी को अपडेट करने का काम चल रहा है. असम समझौते के मुताबिक 25 मार्च 1971 के बाद असम में आए सभी बांग्लादेशी नागरिकों को यहां से जाना होगा चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान.
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