जुनैद की हत्या: 'डर में हमने कुर्ता-पायजामा पहनना छोड़ दिया'

- Author, नीलेश धोत्रे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बल्लभगढ़ (हरियाणा) से लौटकर
पिछले साल रमज़ान में 16 साल के किशोर जुनैद हाफ़िज़ ख़ान की दिल्ली से बल्लभगढ़ जा रही एक लोकल ट्रेन में भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी थी.
जुनैद अपने भाई हाशिम और शाकिर के साथ दिल्ली के सदर बाज़ार से ईद की ख़रीदारी करके घर लौट रहे थे.
पुलिस के अनुसार, ट्रेन में सीट के लिए झगड़ा हुआ था, जिसके बाद भीड़ ने जुनैद और उनके साथियों पर हमला किया.

लेकिन, कई मानवाधिकार संगठनों ने ये दावा किया था कि जुनैद को 'उनकी पहचान' की वजह से निशाना बनाया गया और भीड़ ने उनकी हत्या की क्योंकि वह मुसलमान थे.
'तुम मुसलमान हो, पाकिस्तानी हो'
उस दिन की घटना के बारे में जुनैद के भाई हाशिम ने बीबीसी को बताया था कि भीड़ ने हमारे सिर पर टोपी देखकर ये कहना शुरू कर दिया था कि तुम मुसलमान हो, देशद्रोही हो, पाकिस्तानी हो और मांस-मीट खाते हो.


इमेज स्रोत, Getty Images
इसके बाद भीड़ ने जुनैद, हाशिम और शाकिर को तब तक पीटा, जब तक जुनैद की मौत नहीं हो गई. इसके बाद जुनैद की लाश को भीड़ ने असावटी नाम के एक छोटे से रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया.
बहरहाल, जुनैद की हत्या को अब एक साल पूरा होने वाला है. शनिवार को ईद के दिन बीबीसी की एक टीम ने जुनैद के परिवार से मुलाक़ात की.
जुनैद का परिवार बल्लभगढ़ कस्बे (हरियाणा) के पास खंदावली गाँव में रहता है.
दिल्ली से सटे होने के कारण इस इलाक़े में ज़मीन के दाम बहुत तेज़ी से बढ़े हैं. गाँव में भी ज़मीन महंगी हुई है. कुछ लोगों ने अपनी ज़मीन का कुछ टुकड़ा बेचकर गाँव में बड़े घर बना लिये हैं, लेकिन गाँव में बुनियादी सुविधाओं का आज भी अभाव है.

'कैसी ईद? यहाँ तो खाना नहीं बना...'
खंदावली मुस्लिम बहुल गाँव है. साथ ही गाँव में कुछ परिवार दलितों के भी हैं.
जुनैद का घर गाँव के बीचोबीच है. हमारी टीम जब जुनैद के घर पहुँची तो उनके पिता जलालुद्दीन ने हमारा स्वागत किया.
लेकिन उनके घर में ईद की कोई रौनक नहीं थी. ऐसी कोई चीज़ नहीं दिखी जिससे यह एहसास हो सके कि आज एक बड़ा त्योहार है.
जब जुनैद की माँ सायरा से हमने ईद के बारे में पूछा तो उन्होंने रोना शुरू कर दिया. उन्होंने कहा, "कैसी ईद? यहाँ तो ईद पर खाना भी नहीं बना."

हमने जब उनसे पूछा कि क्या उनकी किसी रिश्तेदार के यहाँ जाने की कोई योजना है? तो वे बोलीं, "जब से जुनैद गुज़रा है, हमने गाँव के बाहर क़दम नहीं रखा. एक साल पूरा होने वाला है."
गाँव से बाहर जाना बंद
परिवार के अन्य लोगों ने भी कहा कि उन्होंने गाँव से बाहर जाना बंद कर दिया है.
जुनैद के भाई शाकिर ने कहा, "मन में ख़ौफ़ रहता है. वो सब चीज़ें याद आती हैं. मैंने गाँव से बाहर जाना बंद कर दिया है. मैंने मुस्लिम टोपी और कुर्ता-पायजामा पहनना भी बंद कर दिया है."

जिस दिन जुनैद की हत्या हुई थी, उस दिन उनके भाई शाकिर को भी भीड़ ने पीटा था. उस दिन की हर बात उन्हें आज भी अच्छी तरह से याद है.
शाकिर कहते हैं, "आज कल जब मैं मस्जिद जाता हूँ तो मुस्लिम टोपी नहीं पहनता. नमाज़ के दौरान मैं सिर पर रुमाल रखकर काम चला लेता हूं."
शाकिर और उनके अब्बा ने बताया कि घर के पुरुष अब कुर्ता-पायजामा की जगह कमीज़-पैंट सिलवाते हैं. अब सप्ताह में केवल शुक्रवार के दिन घर के लोग कुर्ता-पायजामा पहनते हैं.
'अब कुर्ता-पायजामा नहीं पहनते'
लेकिन ये फ़ैसला क्यों? तो उन्होंने कहा कि ये पोशाक भीड़ में भी मुसलमान के तौर पर हमारी पहचान करवा देती है और फिर दूसरे ख़तरे भी हैं.
जुनैद के पिता किन ख़तरों की बात कर रहे हैं? उनसे जब हमने यह पूछा तो शाकिर ने कहा, "हमें डर है क्योंकि जुनैद के हत्यारे ज़मानत पर हैं. हम उनके सामने नहीं पड़ना चाहते. इसलिए बाहर जाने में ख़तरा महसूस होता है."


इस बार जुनैद के घर में किसी ने भी ईद पर नए कपड़े या नया सामान नहीं ख़रीदा. ईद की ख़रीदारी का ज़िक्र भी, उनके ज़ेहन में जुनैद की हत्या की याद बनकर आया है.
जब हमने जुनैद की हत्या में शामिल भीड़ या लोगों के बारे में उनसे पूछा तो जुनैद के पिता जलालुद्दीन ने कहा, "सभी हिंदू वैसे नहीं हैं. वो बुरे नहीं हैं. आज सुबह भी मेरे हिंदू दोस्त मुझे ईद की राम-राम कहने आए थे."
एक साल में क्या-क्या बदला?
बीते एक साल में घर के हालात कैसे बदले हैं? ये सुनते ही मानो शाकिर की परेशानी बढ़ जाती है. वो कहते हैं, "घर की माली हालत बद से बदतर हो गई है. जो घर के कमाऊ पुरुष थे वो घर में क़ैद हैं. एक भाई ढाबा चलाता है. घर का ज़्यादातर ख़र्च वही उठा रहा है."
जुनैद के भाई हाशिम दसवीं पास हैं. वो पढ़ाई करने सूरत गए थे. चाहते थे कि पढ़ाई पूरी करने के बाद मौलवी बनेंगे. लेकिन उन्हें बीच में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी.
हाशिम अब गाँव की मस्जिद में बच्चों को नमाज़ पढ़ना सिखाते हैं. इस काम के लिए उन्हें हर महीने आठ हज़ार रुपये मिलते हैं.
हाशिम कहते हैं कि मस्जिद से लौटते वक़्त अगर पाँच मिनट की भी देरी हो जाये, तो माँ तुरंत फ़ोन कर देती हैं. वो कहते हैं कि जुनैद की हत्या के बाद से माँ-पिता उन्हें कहीं जाने नहीं देते.

सन्नाटा, बच्चे और ईद
अदालत के आदेश के बाद जुनैद के परिवार की सुरक्षा के लिए एक पुलिस कॉन्स्टेबल घर के बाहर तैनात किया गया है.
घर के लोग बताते हैं कि जुनैद के अब्बा को अगर गाँव के आस-पास कुछ ज़रूरी सामान लेने जाना भी होता है तो हवलदार को साथ लेकर जाना पड़ता है.
परिवार से मुलाक़ात के बाद हाशिम ने हमें अपना गाँव दिखाया. हमने पैदल ही गाँव की कई गलियाँ देखीं. लेकिन पूरे गाँव में ईद पर ख़ास भोजन बनने की सुगंध हमें नहीं मिली.
खंदावली गाँव में हर तरफ शांति थी. हां, कुछ नुक्कड़ों पर नए कपड़े पहने, छोटे बच्चे खेलते हुए ज़रूर मिले जो पैदल-पैदल हमारे साथ हो लिए.

फ़ेक न्यूज़ पर चर्चा
मस्जिद के बाहर नौजवानों का एक समूह मिला जिसने बताया कि जुनैद की हत्या के बाद उन्होंने भी नमाज़ी टोपी पहनना बंद कर दिया है. वो घूमते-फिरते वक़्त अब टोपी नहीं पहनते.
गाँव में ही मुख्य बस स्टॉप है, जहाँ हमारी मुलाक़ात रिज़वान से हुई. पढ़े लिखे उस नौजवान ने बताया कि 'फ़ेक न्यूज़' को लेकर इलाक़े में काफ़ी चिंता है.

रिज़वान ने कहा, "कॉलेज में जवान लड़के कई बार फ़ेक न्यूज़ के आधार पर चर्चा करते हैं और काफ़ी बहस करने लगते हैं. ऐसी बहस को हम अनदेखा कर देते हैं. हमें पता होता है कि ख़बर झूठी है. पर उन्हें कौन समझाये."
रिज़वान ने बी.कॉम तक की पढ़ाई पूरी कर ली है. वह अब एमबीए करना चाहते हैं. उन्हें विश्वास है कि उनकी सामाजिक स्थिति में अगर बदलाव आ सकता है तो ऐसा सिर्फ़ शिक्षा से हो सकता है.
ग़ौरतलब है कि जुनैद की हत्या का मामला फ़रीदाबाद की सत्र अदालत में चल रहा है. इस मामले में छह लोगों को अभियु्क्त बनाया गया था, जिसमें से एक व्यक्ति को चंडीगढ़ हाईकोर्ट ने जमानत दी है. चार लोगों को फरीदाबाद कोर्ट ने चार्जशीट दायर होने पहले ज़मानत दे दी थी.
इस ज़मानत के विरोध में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में जुनैद के परिजनों ने अपील की थी जिसे हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था. याचिका ख़ारिज किए जाने के विरोध में जुनैद का परिवार सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर चुका है, जिस पर सुनवाई होनी है. हालांकि, इस मामले के मुख्य अभियुक्त नरेश कुमार को ज़मानत अब तक नहीं मिली है.
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