यूपी में गठबंधन की काट निकालने में जुटी बीजेपी

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
तीन महीने के भीतर तीन लोकसभा और एक विधानसभा उपचुनाव हारने के बाद भारतीय जनता पार्टी में खलबली मचना स्वाभाविक है. ऐसा इसलिए भी क्योंकि ये सभी सीटें उपचुनाव से पहले न सिर्फ़ बीजेपी के पास थीं बल्कि लोकसभा और राज्यसभा में पार्टी ने ज़बर्दस्त प्रदर्शन किया था.
पार्टी नेता इन उपचुनावों के नतीजों को लेकर ऊपरी तौर पर भले ही बेफ़िक्री दिखा रहे हों, लेकिन सच्चाई ये है कि इन परिणामों ने पार्टी को ज़ोरदार आईना दिखाया है.
यदि बात सिर्फ़ उपचुनाव के नतीजों की की जाए तो विरोधी दलों के एक साथ आने से बीजेपी चित ज़रूर हो गई, लेकिन ऐसा नहीं था कि इस जीत के लिए सिर्फ़ इन दलों का एकजुट होना ही एकमात्र कारण था. दरअसल, इन चारों जगहों पर पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराज़गी भी बड़ी वजह थी.
विपक्षी दलों के गठबंधन की आहट और पार्टी कार्यकर्ताओं की कथित नाराज़गी को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी में संगठन से लेकर सरकार तक मंथन शुरू हो गया है.
पार्टी ने कार्यकर्ताओं तक सीधे पहुंचने के लिए पहले चौपाल कार्यक्रम आयोजित किए और अब हर शहर के संभ्रांत नागरिकों तक पहुंच बनाने की कोशिश की जा रही है. इस अभियान में मुख्यमंत्री, उनकी कैबिनेट के दूसरे मंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन के दूसरे नेता भी लगे हैं.
रणनीति पर सवाल
लेकिन सवाल उठता है कि पार्टी की ये रणनीति क्या गठबंधन की काट साबित हो पाएगी? क्या केंद्र और राज्य सरकारों की कार्यप्रणाली और उपलब्धियां गठबंधन की ताक़त पर भारी पड़ेंगी?


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जहां तक कार्यकर्ताओं की नाराज़गी का सवाल है तो बीजेपी के तमाम बड़े नेता भी इस बात को दबे मन से स्वीकार करते हैं, यही नहीं, कई विधायक, सांसद और अन्य नेता तो सार्वजनिक रूप से काफ़ी मुखर हुए हैं.
बीजेपी प्रवक्ता शलभमणि त्रिपाठी भी दबे मन से इसे स्वीकार करते हैं, "नाराज़गी तो नहीं है, लेकिन कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायतें अधिकारियों को लेकर ज़रूर रहती हैं कि वो केंद्र और राज्य सरकार की उपलब्धियों को आम जनता तक नहीं पहुंचा रहे हैं. लेकिन बीजेपी के कार्यकर्ता अपनी नाराज़गी को सिर्फ़ पार्टी फ़ोरम तक ही रखते हैं, उसका असर पार्टी की छवि पर नहीं पड़ने देंगे."
लेकिन सच्चाई ये है कि पिछले चारों उपचुनावों में पार्टी उम्मीदवार की हार के पीछे कार्यकर्ताओं की नाराज़गी बहुत बड़ा कारण थी. यही वजह है कि बीजेपी अब कार्यकर्ताओं की नाराज़गी मोल लेने की स्थिति में नहीं है.
जानकारों के मुताबिक़ अधिकारियों को साफ़तौर पर कह दिया गया है कि पार्टी नेताओं, पदाधिकारियों और यहां तक कि कार्यकर्ताओं की समस्याओं की अनदेखी न की जाए. जबकि पहले इस संबंध में कार्यकर्ताओं को ही सख़्त हिदायतें दी गई थीं.


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सरकार और संगठन के बीच तालमेल
उपचुनाव के नतीजों में कार्यकर्ताओं की शिथिलता साफ़ देखी गई और उसका परिणाम भी बीजेपी के लिए सुखद नहीं रहा. बताया जा रहा है कि पार्टी के चौपाल कार्यक्रम का मक़सद भी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद स्थापित करना ही था.
दूसरी ओर, सरकार और संगठन के बीच भी कई बार तालमेल की कमी दिखती है. वरिष्ठ पत्रकार शरद प्रधान कहते हैं, "सच्चाई तो ये है कि बीजेपी कार्यकर्ताओं की नाराज़गी अफ़सरों से कम, अपने ही नेताओं से कहीं ज़्यादा है. लेकिन नेता का नाम वो सार्वजनिक रूप से डर के मारे ले नहीं सकते, इसलिए नाराज़गी का निशाना अधिकारियों को बना दिया जा रहा है."
शरद प्रधान भी उपचुनाव में बीजेपी के हारने की तमाम वजहों में से एक कार्यकर्ताओं की नाराज़गी को भी मानते हैं. राज्य में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले विपक्षी दलों की राजनैतिक एकता ने पार्टी को वैसे ही परेशान कर रखा है, कार्यकर्ताओं की नाराज़गी से उसे अलग जूझना पड़ रहा है. जानकारों का कहना है कि ये अभी शुरुआत है जो आगे बढ़ेगी ही, कम नहीं होगी.


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कैराना उपचुनाव में बीजेपी उम्मीदवार रहीं मृगांका सिंह ने एक इंटरव्यू में सीधे तौर पर आरोप लगाया कि उन्हें सरकारी मशीनरी की वजह से हारना पड़ा. बीबीसी से बातचीत में चुनाव के दौरान भी उन्होंने इसके संकेत दिए थे और कहा था कि वो ख़ुद भी ऐसा महसूस करती हैं.
बीजेपी सूत्रों की मानें तो संगठन और सरकार के बीच तालमेल की कमी और एक-दूसरे के साथ खींचतान से पार्टी आलाकमान अच्छी तरह से वाकिफ़ है. इस बारे में दोनों को सख़्त हिदायत भी दी गई है.
माना ये भी जा रहा है कि अगले एक-दो महीने में होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में कुछ ऐसे चेहरों को जगह दी जा सकती है जिससे कि कई स्तरों पर संतुलन साधा जा सके.
पार्टी के भीतर नाराज़गी
बीजेपी के एक बड़े नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि पार्टी नेताओं की ज़्यादा नाराज़गी संगठन के एक बड़े और ताक़तवर नेता के ख़िलाफ़ है. उनके मुताबिक कई मामलों में मुख्यमंत्री के साथ उनके टकराव की भी स्थिति आ जाती है, लेकिन आलाकमान की क़रीबी के चलते संगठन के ये नेता अक़्सर भारी पड़ते हैं.
कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए ही ख़ुद मुख्यमंत्री लगातार ज़िलों के दौरे कर रहे हैं, चौपाल कार्यक्रमों में रात गुज़ार चुके हैं और अब संभ्रांत लोगों को घर-घर जाकर सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं.
लेकिन जानकारों का कहना है कि यदि सपा, बसपा, कांग्रेस और आरएलडी का 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन हुआ तो बीजेपी के लिए ये स्थिति काफ़ी मुश्किल खड़ी करने वाली हो सकती है.


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जानकारों के मुताबिक हाल ही में हुए बीजेपी के आंतरिक सर्वे के मुताबिक ऐसी स्थिति में 2014 के लोकसभा चुनाव परिणाम वाली स्थिति तो दूर-दूर तक नहीं दिखती.
शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के सूरजकुंड में बीजेपी, आरएसएस और संघ के सहायक संगठनों के प्रमुख पदाधिकारियों साथ रात्रि भोजन पर आगामी रणनीति पर ही विचार-विमर्श किया.
जहां तक सरकार, अपनी पार्टी के नेताओं और अधिकारियों से नाराज़गी का सवाल है तो बीजेपी कार्यकर्ता खुलकर तो इस बारे में कुछ भी नहीं बोलते, लेकिन बातचीत में उनके भीतर जो कुछ भी चल रहा है, वो ज़ाहिर हो ही जाता है.
अब देखना ये होगा कि गठबंधन की चुनौती के साथ ही अपने लोगों की चुनौती से भी पार्टी कैसे निपटती है.
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