कर्नाटक: कांग्रेस ने अमित शाह को उनके हथियार से ही कैसे मात दी?

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- Author, भरत शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
''ये बात ज़ाहिर मत होने दीजिए कि आप क्या करने का विचार बना रहे हैं. अक़्लमंदी से इसे रहस्य बनाए रखिए और मंज़िल तक पहुंचने के लिए दृढ़ बने रहिए.''
कुछ कर दिखाने की ठानने और उसे कर दिखाने के लिए ये मंत्र चाणक्य ने दिया था.
पिछले चार साल से छोटी-छोटी सियासी जीतों के जश्न से तसल्ली कर रही कांग्रेस को इस मंत्र को काफ़ी संजीदगी से लेने की ज़रूरत थी और कर्नाटक के मामले में उसने ऐसा ही किया.
नतीजा सामने है. बी.एस. येदियुरप्पा मुख्यमंत्री के शपथ पत्र तक पहुंचे लेकिन कुर्सी तक नहीं पहुंच सके. और सीटों के मामले में उनसे पीछे रहने वाली कांग्रेस बाज़ी जीत ले गई.
ये दांव जीतने के लिए उसे मुख्यमंत्री की कुर्सी की क़ुर्बानी ज़रूर देनी पड़ी लेकिन कम से कम फ़िलहाल एक बड़े राज्य में भाजपा को सत्ता से दूर रखने में वो क़ामयाब हो गई.
अमित शाह को भाजपा अध्यक्ष के साथ-साथ सियासत का 'चाणक्य' कहा जाने लगा था लेकिन चाणक्य की उपरोक्त सूक्ति को इस बार कांग्रेस ने ज़्यादा तेज़ी से लपका और उससे ज़्यादा रफ़्तार से उस पर अमल भी किया.

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कांग्रेस ने सीखा सबक़
लेकिन ऐसा नहीं कि कांग्रेस राजनीति में अति-सक्रियता दिखाने में सिद्धहस्त रही है. बल्कि बीते कुछ समय से उससे शिकायत रही है कि वो बेहद ढीले रुख़ के साथ चल रही है.
दूध की जली कांग्रेस ने इस बार छाछ फूंककर पी और वो भी काफ़ी रफ़्तार से. और ये सबक़ उसे गोवा और मणिपुर से मिला.
दोनों राज्यों ने विधानसभा चुनावों में किसी एक दल को बहुमत नहीं दिया लेकिन कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. इसके बावजूद भाजपा सरकार बना ले गई.
कैसे? नतीजों के समय जब दिल्ली में कांग्रेसी नेता नंबरों पर ग़ौर कर रहे थे, भाजपा ने अपने सिपहसालारों को रवाना कर दूसरे दलों से बातचीत की, समझौते हुए और चंद घंटों में राज्यपालों से मुलाक़ात कर सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया गया.
कांग्रेसी नेता पहुंचे, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. लोकतंत्र की हत्या जैसी बातें कही गईं, सबसे बड़े दल को मौक़ा न देने की शिकायत भी हुई, लेकिन चिड़िया खेत चुग गई थी.
इस बार कर्नाटक में ठीक उल्टा हुआ. एग्ज़िट पोल ने साबित कर दिया था कि किसी एक दल को एकतरफ़ा सीटें नहीं मिलने जा रहीं. और कांग्रेस ने नतीजे आने तक का इंतज़ार नहीं किया.

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राजनीतिक मौक़ा लपका
सीटों का मीटर जब भाजपा 104, कांग्रेस 78, जनता दल सेक्युलर 37 और अन्य 3 पर अटका, तो कांग्रेस ने मौक़ा ताड़ लिया.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी ने बीबीसी से कहा, ''कांग्रेस ने इस बार अपने सबसे वरिष्ठ नेताओं को काम पर लगाया. गुलाम नबी आज़ाद और अशोक गहलोत को ये काम सौंपा गया.''
''भाजपा ने जैसा मणिपुर और गोवा में किया, कांग्रेस ने यहां नहीं करने दिया. बल्कि अगर ये कहा जाए कि कांग्रेस ने भाजपा को इस बार चकमा दे दिया तो गलत नहीं होगा.''
दरअसल, कांग्रेस एग्ज़िट पोल के बाद ही सक्रिय हो गई थी.
उन्होंने कहा, ''नतीजे मंगलवार को आने थे और कांग्रेस ने रविवार को ही तय कर लिया था कि अगर उनकी सीटें 90 से कम रहती हैं तो जनता दल-एस के कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद की पेशकश की जाएगी.''
इसके चौबीस घंटे के भीतर देवेगौड़ा-कुमारस्वामी से कैसे मिलना है, रणनीति कैसे बनानी है, क्या कदम उठाना है, ये तय कर लिया था.

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सीएम पद बना हथियार
नीरजा ने कहा, ''और नतीजे आने के कुछ घंटों के भीतर ही गठबंधन का ऐलान कर दिया गया.''
दरअसल, बहुमत हाथ में न आने की वजह से भाजपा और कांग्रेस के बीच किंगमेकर बनकर उभरी जनता दल सेक्युलर. और हालात ने उसे किंगमेकर के साथ-साथ किंग भी बना दिया.
कांग्रेस का बड़ा दांव था मुख्यमंत्री पद छोड़कर उसकी पेशकश करना. ये ऐसा ऑफ़र था जिसे मैच कर पाना भाजपा के लिए मुमकिन नहीं था.
भाजपा बी.एस. येदियुरप्पा को पीछे हटाकर कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनवाने की कोशिश करती, तो इससे उसे और नुक़सान होता.
जानकारों का कहना है कि इस बार कांग्रेस ने पुरानी कांग्रेस जैसा कमाल कर दिखाया. जो मैदान मार लेने तक आराम से न बैठने की आदत भाजपा दिखाती है, वो इस बार कांग्रेस में दिखी.
वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश का कहना है कि राहुल गांधी ने इस बार सियासी चतुराई दिखाई है और इस बात का श्रेय उन्हें दिया जाना चाहिए.

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कांग्रेस इस बार ठीक से लड़ी
उन्होंने कहा, ''राहुल में संजीदगी दिखी है. अब वो पहले जैसे नहीं हैं. कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान जो सक्रियता उन्होंने दिखाई थी, वो नतीजे आने के बाद भी जारी रही.''
''कांग्रेस की कमान अब पूरी तरह से राहुल के हाथों में हैं और सोनिया का साथ उन्हें मिल रहा है. जो नेता सोनिया के साथ खड़े होते थे, वो राहुल के साथ खड़े हैं. गुलाम नबी आज़ाद, गहलोत जैसे वरिष्ठ नेता तुरंत इस बार काम पर लगा दिए गए थे.''
आम तौर पर माना जाता है कि सियासी दल जब अदालत का दरवाज़ा खटखटा दें तो समझ लें कि राजनीतिक दल ने अपने मैदान में हार मान ली है.
लेकिन कांग्रेस ने इस बार दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ी. राज्यपाल ने जब बी एस येदियुरप्पा को सरकार बनाने का न्योता दिया और मुख्यमंत्री पद की शपथ का बुलावा दिया तो कांग्रेस धरने पर बैठ गई.
दूसरी ओर, देर रात सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया ताकि येदियुरप्पा को बहुमत साबित करने के लिए मिली 15 दिनों की मियाद को घटाया जा सके.
और येदियुरप्पा के शपथ लेने के बावजूद कांग्रेस ने खेल पलट दिया. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को कांग्रेस की दलील पर मुहर लगाई और बहुमत साबित करने के लिए महज़ 28 घंटे दिए.

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विधायक बचाए रखे
भाजपा के विधायक को प्रो-टेम स्पीकर नियुक्त किया गया तो कांग्रेस एक बार फिर कोर्ट पहुंची. इस मामले में उसे क़ामयाबी नहीं मिली लेकिन आक्रामकता बनी रही, जिसका फ़ायदा उसे हुआ.
कोर्ट से मिली बड़ी राहत के बाद कांग्रेस के सामने दूसरी चुनौती थी अपने विधायकों को दूसरी तरफ़ फिसलने से बचाना. और वो इसमें भी क़ामयाब रही.
जनता दल के 37 विधायकों को मुख्यमंत्री मिल रहा है, इसलिए उनके दूसरी तरफ़ जाने की आशंका कम थी. लेकिन मीडिया में ख़बरें थी कि कांग्रेस के कुछ विधायक भाजपा के ख़ेमे में जा सकते हैं.
लेकिन कांग्रेस ने ऐसा होने नहीं दिया. फ़्लोर टेस्ट हुआ तो साफ़ हो गया है कि 8 विधायकों की कमी से जूझ रही भाजपा पर्याप्त सीटें जुटाने में नाकाम रही.
और बी.एस. येदियुरप्पा ने इस्तीफ़ा दे दिया.

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भाजपा के लिए झटका
कर्नाटक में कम सीटों के बावजूद कांग्रेस के भाजपा को कुर्सी तक न पहुंचने देने की कामयाबी अमित शाह के लिए कितना बड़ा झटका है, नीरजा ने कहा, ''झटका तो है, लेकिन मौका भी है.''
''भाजपा इंतज़ार करेगी कि कांग्रेस और जनता दल-एस गठबंधन के कुछ विरोधाभास सामने आएं, वो ग़लतियां करें. भाजपा उनकी गलतियों का इंतज़ार करेगी और फिर मौका तलाशेगी.''
''भाजपा चाहेगी कि कर्नाटक के विधानसभा चुनाव, 2019 के लोकसभा चुनावों के साथ हों. बी.एस. येदियुरप्पा ने भी अपने विदाई भाषण में कहा भी कि वो लोकसभा की 28 में से 28 सीटें जीतेंगे.''
लेकिन कांग्रेस की ये जीत आगे भी जारी रहेगी, उन्होंने कहा, ''दोनों दल स्वाभाविक साझेदार हैं, भी और नहीं भी. कांग्रेस और जनता दल-एस, एक-दूसरे पर हमला करते रहे हैं लेकिन भाजपा को रोकने के लिए दोनों साथ हुए हैं.''
ममत बनर्जी ने कर्नाटक के बाद साफ़ कर दिया है कि राजनीतिक रणनीति अब क्षेत्रीय आधार पर बनने वाले गठबंधन की तरफ़ बढ़ सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि बार-बार ये संकेत भी मिल रहे हैं सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का पहला मौक़ा दिया जाता है.
और आज की बात करें तो भाजपा ही 2019 में सबसे बड़े दल के रूप में उभर सकता है. ऐसे में अगर चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं बनता तो भाजपा के विरोधी दलों का अवसर मुश्किल होगा.
2019 से पहले 2018 की जीत कांग्रेस के खाते में गई. चुनावों में मात खाकर भी वो भाजपा के मात देने में कामयाब रही.
राजनीति में साम, दाम, दंड, भेद की नीति चलती है तो कांग्रेस ने देर से ही सही, अपनी विरोधी भाजपा से उसने ये हुनर सीखना शुरू कर दिया है!
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