कर्नाटक: वजुभाई बनाम देवगौड़ा... वो पुरानी कहानी

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- Author, प्रदीप कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कर्नाटक में किसकी सरकार बनेगी, ये काफ़ी हद तक राज्य के राज्यपाल वजूभाई वाला के रुख पर निर्भर करेगा.
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस-जनता दल (सेक्युलर) गठबंधन ने सरकार बनाने को लेकर अपने अपने दावे कर दिए हैं, अब देखना है कि वजू भाई क्या फ़ैसला लेते हैं.
वजु भाई के अब तक के राजनीतिक करियर और भारतीय जनता पार्टी के प्रति राज्यपाल बनने से पहले उनकी प्रतिबद्धता को देखते हुए कयास लगाए जा रहे हैं कि वो भारतीय जनता पार्टी का साथ देंगे.
गुजरात में वजुभाई की राजनीति को लंबे समय तक देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रतिन दास बताते हैं, "वजु भाई संघ के समर्पित कार्यकर्ता रहे हैं, उनके पूरे करियर में कई उदाहरण ऐसे हैं जहां उन्होंने पार्टी के हितों को तरजीह दी है. ये ठीक बात है कि वे राज्यपाल हैं, संवैधानिक पद पर हैं, लेकिन वो करेंगे वही जो भारतीय जनता पार्टी चाहेगी. इस बार तो सबसे बड़ी पार्टी को बुलाने की परंपरा का हवाला भी साथ में है."



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क्या लेंगे फ़ैसला वजुभाई?
वहीं वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार विजय त्रिवेदी कहते हैं, "देखिए कोई राज्यपाल ऐसी परिस्थितियों में क्या फ़ैसला ले सकता है इसको लेकर सरकारिया कमीशन, बोम्मई जजमेंट और मदन मोहन पुंछी कमीशन की अनुशंसाएं हैं. पुंछी कमीशन की अनुशंसाओं में ये कहा गया है कि चुनाव बाद हुए गठबंधन के पास अगर बहुमत है तो उसे भी मौका दिया जा सकता है."
यानी राज्यपाल चाहें तो अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करते हुए कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं.
लेकिन वजुभाई वाला के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आपसी रिश्ते भी बेहद मधुर रहे हैं, इस लिहाज से भी इस बात की संभावना ज़्यादा है कि वो बीजेपी का साथ देंगे.



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वो पुरानी कहानी
रथिन दास बताते हैं, "2002 में ये वजुभाई ही थे जिन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए राजकोट विधानसभा की अपनी सीट छोड़ी थी. केशुभाई पटेल के मंत्रिमंडल में शामिल जिन चुनिंदा लोगों पर नरेंद्र मोदी का भरोसा बना रहा उनमें वजुभाई शामिल रहे. 2014 में मोदी जी ने ही उन्हें कर्नाटक का राज्यपाल बनाया."
बहरहाल, वजु भाई जो भी करें, ये राज्यपाल के तौर पर उनका विशेषाधिकार है. लेकिन मौजूदा हालात एक पुरानी कहानी की याद दिलाते हैं.
दरअसल ये कहानी है 1996 की. 19 सितंबर, 1996 को गुजरात में सुरेश मेहता के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने केंद्र सरकार की अनुशंसा पर बर्ख़ास्त कर दिया था.

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1996 में क्या हुआ था?
सुरेश मेहता की सरकार बर्ख़ास्त हो गई थी, जबकि कथित तौर पर 182 विधायकों वाली गुजरात विधानसभा में सुरेश मेहता की सरकार के पक्ष में 121 विधायक थे.
दावा किया जाता है कि कांग्रेस ने असंतुष्ट नेता शंकर सिंह वाघेला को मुख्यमंत्री पद का लालच दिया और विधानसभा में सुरेश मेहता सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाई.
वाघेला बीजेपी से अलग हो गए थे और दावा किया जाता है कि उनके साथ कथित तौर पर 40 से ज़्यादा विधायक थे. उन्होंने राष्ट्रीय जनता पार्टी का गठन किया था.
इसके बाद कांग्रेस सुरेश मेहता सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव ले आई.
18 सितंबर को अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान हालात इतने ख़राब हुए कि विधानसभा के अंदर विधायकों में मारपीट तक हो गई.

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गुजरात विधानसभा
राज्यपाल की अनुशंसा के वक्त संयुक्त मोर्चा के नेता के तौर पर एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री थे, उन्होंने राष्ट्रपति से बीजेपी सरकार को बर्ख़ास्त करने की सिफ़ारिश कर दी.
इसके बाद सुरेश मेहता सरकार गिर गई और बाद में शंकर सिंह वाघेला मुख्यमंत्री बने.
उस वक्त भारतीय जनता पार्टी की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी ने मीडिया से कहा था कि देवगौड़ा ने उन्हें धोखा दिया, क्योंकि एक सप्ताह पहले हुई बातचीत में प्रधानमंत्री ने उन्हें भरोसा दिलाया था कि गुजरात में केंद्र सरकार दख़ल नहीं देगी.
हालांकि ये भी कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सहयोगी दलों के दबाव में एचडी देवगौड़ा को अपना निर्णय बदलते हुए गुजरात सरकार को बर्ख़ास्त करने का फ़ैसला लिया था.
उस दौर में भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय स्तर के नेताओं ने गुजरात विधानसभा के सदस्यों की रातों रात परेड राष्ट्रपति भवन में भी कराई थी, लेकिन उन सबका कोई फ़ायदा नहीं हुआ था.

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47 साल पुराने स्वयंसेवक
इस पूरे प्रकरण के दौरान वजुभाई वाला गुजरात भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष थे. संयोग ऐसा है कि आज वजु भाई फ़ैसला लेने की स्थिति में हैं और उनके सामने एचडी देवगौड़ा की पार्टी और उनके बेटे को मुख्यमंत्री बनने के लिए मौका देने का फ़ैसला लेना है.
हालांकि रथिन दास इससे बहुत इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते. वे कहते हैं, "सुरेश मेहता की सरकार को बचाने के लिए वाजपेयी जी, आडवाणी जी और प्रमोद महाजन जैसे लोग लगे थे. तब वजु भाई स्टेट यूनिट के अध्यक्ष ज़रूर थे, लेकिन उनकी उतनी हैसियत नहीं थी."
विजय त्रिवेदी कहते हैं, "संवैधानिक पद पर बैठा कोई आदमी किसी भी शख़्स या पार्टी के ख़िलाफ़ किसी दुर्व्यवहार से हिसाब लेने की बात शायद नहीं सोचेगा क्योंकि उसे इतिहास किसी पुरानी बात के लिए याद नहीं रखेगा बल्कि उसके फ़ैसले को उसकी संवैधानिक ज़िम्मेदारी के साथ तौलेगा."
ये भी सही है कि किसी राज्यपाल के सामने एक अहम फैसले से पहले 22 साल पुरानी बात बहुत मायने नहीं रखती है.
क्योंकि उस वक्त वो एक पार्टी के नेता मात्र थे ना कि किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति.
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