'मैसूर का शेर' कहे जाने वाले टीपू सुल्तान: नायक या जिहादी शासक

कांग्रेस सरकार ने टीपू सुल्तान को एक हीरो के तौर पर पेश किया और उनकी जयंती मनाने का फ़ैसला भी किया था
इमेज कैप्शन, कांग्रेस सरकार ने टीपू सुल्तान को एक हीरो के तौर पर पेश किया और उनकी जयंती मनाने का फ़ैसला भी किया था
    • Author, शकील अख़्तर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मैसूर के पूर्व शासक टीपू सुल्तान को एक बहादुर और देशभक्त शासक के रूप में ही नहीं धार्मिक सहिष्णुता के दूत के रूप में भी याद किया जाता है. टीपू की बरसी पर एक बार फिर पढ़िए बीबीसी का विशेष लेख.

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भारत में पिछले कुछ वर्षों से दक्षिणपंथी इतिहासकार टीपू को एक क्रूर और हिंदुओं के दुश्मन मुस्लिम सुल्तान के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं. टीपू के हिंदुओं का सफ़ाया करने वाला शासक बताया जा रहा है.

कर्नाटक में पिछले चुनाव अभियान के दौरान भी कई बार ये सवाल उठाया गया कि टीपू राज्य का नायक है या हिंदुओं का विरोधी अत्याचारी शासक.

टीपू सुल्तान मैसूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर श्रीरंगपट्टनम में एक सुंदर मकबरे में अपने पिता हैदर अली और माँ फ़ातिमा फ़ख़रुन्निसा के बाज़ू में दफन हैं.

श्रीरंगपट्टनम टीपू की राजधानी थी और यहां जगह-जगह टीपू के युग के महल, इमारतें और खंडहर हैं.

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श्रीरंगपट्टनम में बहुत से लोग टीपू सुल्तान का मकबरा देखने आते हैं

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टीपू के जन्म का जश्न

टीपू पर इस विवाद के बावजूद अब भी लोग उसके मक़बरे और महलों को देखने के लिए हजारों की संख्या में श्रीरंगपट्टनम आते हैं.

लोगों की स्मृतियों में अब भी मैसूर का टीपू एक देशभक्त और अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ते हुए अपनी जान देने वाले योद्धा के तौर पर बना हुआ है.

कर्नाटक की पूर्व कांग्रेस सरकार ने कुछ साल पहले राज्य के कई अन्य नायकों की तरह टीपू को भी कर्नाटक का गौरव क़रार दिया और उनके जन्मदिन पर आधिकारिक तौर पर जश्न मनाना शुरू किया.

भाजपा और आरएसएस इसका विरोध करते हैं. उनके विचार में, राज्य सरकार मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए टीपू के जन्म का जश्न मनाती है.

राज्य में भाजपा के नेता अनंत कुमार हेगड़े कहते हैं कि टीपू पक्षपाती शासक थे और उन्होंने तटीय क्षेत्रों में हजारों हिंदुओं की हत्या की थी और मंदिर तोड़े थे.

वह कहते हैं, "टीपू नायक नहीं बल्कि हज़ारों हिंदुओं का हत्यारा था."

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टीपू सुल्तान मैसूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर श्रीरंगपट्टनम में एक सुंदर मकबरे में अपने पिता हैदर अली और माँ फ़ातिमा फ़ख़रुन्निसा के बाज़ू में दफन हैं

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कैसा था टीपू का साम्राज्य?

टीपू के साम्राज्य में हिंदू बहुमत में थे. टीपू सुल्तान धार्मिक सहिष्णुता और आज़ाद ख़्याल के लिए जाना जाते हैं.

उन्होंने श्रीरंगपट्टनम, मैसूर और अपने राज्य के कई अन्य स्थानों में कई मंदिर बनाए, और मंदिरों के लिए ज़मीन दी. एक बड़ा मंदिर ख़ुद उनके ही महल के प्रवेश द्वार से कुछ ही मीटर की दूरी पर स्थित है.

लेकिन हिंदुत्व से प्रभावित बहुत से इतिहासकार और बुद्धिजीवी टीपू को एक हिंदू विरोधी शासक के रूप में देखते है.

कर्नाटक के डॉक्टर चिदानंद मूर्ति ने कन्नड़ भाषा में टीपू पर लिखी अपनी किताब में लिखा है, "वे बेहद चालाक शासक थे. उन्होंने मैसूर सम्राज्य के भीतर अपनी हिंदू प्रजा पर कोई अत्याचार नहीं किया और न ही उनके मंदिरों को नुकसान पहुंचाया. लेकिन तटीय क्षेत्रों और केरल के मलाबार इलाक़े पर हमले में हिंदुओं के लिए बहुत क्रूर थे."

"वे क्रूर और पक्षपाती शासक थे. वे जिहादी थे. उन्होंने हज़ारों हिंदुओं को ज़बदरदस्ती मुस्लिम बना दिया, वे अपनी धार्मिक पुस्तक का पालन करता था जिसमें लिखा था मूर्तिपूजकों का वध करो."

इतिहासकार प्रोफ़ेसर बी शेख अली

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टीपू के सैन्य अभियान

इतिहासकार रवि वर्मा ने टीपू सुल्तान के बारे अपने एक लेख में लिखा है, "केरल में टीपू के सैन्य अभियानों के बारे में कई प्रमाणित दस्तावेज़ों से स्पष्ट रूप से साबित होता है कि मैसूर का सुल्तान एक पक्षपातपूर्ण मुस्लिम क्रूर शासक था जो केरल में सैकड़ों हिंदू मंदिरों को नष्ट करने के लिए, बड़ी संख्या में हिंदुओं को जबरन मुसलमान बनाने और हिंदुओं पर अपार अत्याचार करने का ज़िम्मेदार था."

रवि वर्मा ने सैंकड़ों मंदिरों की एक सूची भी प्रस्तुत की है जो उनके अनुसार टीपू ने नष्ट की है.

लेकिन टीपू के काल का गहन अध्ययन करने वाले इतिहासकार प्रोफ़ेसर बी शेख अली कहते हैं कि इन दावों का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है. उनके विचार में टीपू के क्रूर शासक की नई छवि इतिहास से अधिक वर्तमान राजनीतिक माहौल से प्रभावित है.

वे कहते हैं, "जब मुस्लिम आए, तो उन्होंने अपना इतिहास लिखा, जब अंग्रेज़ आए तो उन्होंने अपनी तरह से इतिहास लिखा अब पार्टी बदल गई है तो वे चाहते हैं कि वे अपनी तरह से इतिहास बदलें. वे इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना चाहते हैं."

प्रोफ़ेसर अली कहते हैं कि इतिहास को समकालीन राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि में समझने की ज़रूरत है.

देश की बदलती हुई राजनीति में इतिहास की एक नई व्याख्या की जा रही है. इस बदलती हुई पृष्ठभूमि में भविष्य के इतिहास में टीपू सुल्तान जैसे पूर्व शासकों को शायद भुला दिया जाए या फिर उन्हे हिंदू विरोधी और क्रूर शासक के तौर पर पेश किया जाए.

(ये लेख इससे पहले 16 मई 2018 को प्रकाशित हुआ था)

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