क्या गुलाबी रंग औरतों को खींचता है?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
अगर आप महिला हैं, तो क्या कभी ऑटो लेते वक्त ऑटो का रंग देख कर उस पर चढ़ने का मन बनाती हैं?
या फिर महिला पिंक टॉयलेट देखकर सामान्य टॉयलेट के बजाय उसमें जाने की सोचती हैं?
क्या आपने इस साल का इकोनॉमिक सर्वे इसलिए पढ़ा क्योंकि उसका कवर 'पिंक' था?
जवाब 'हां' हो या 'ना' लेकिन पिंक का टारगेट महिला ही होती हैं.
पिंक ऑटो, पिंक टॉयलेट, पिंक किताब की तरह अब महिलाओं के लिए पिंक बूथ का चलन भी चल पड़ा है.
कर्नाटक चुनाव में महिलाओं को बूथ तक ले जाने के लिए इस विधानसभा चुनाव में 600 पिंक बूथ बनाए जा रहे हैं.

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राज्य के चुनाव आयुक्त के दफ़्तर के मुताबिक़ इतनी बड़ी संख्या में आज तक पिंक बूथ किसी और राज्य में नहीं बने है.
कर्नाटक में 12 मई को विधानसभा चुनाव होने हैं. उसी के मद्देनजर महिला वोटरों को बूथ तक पहुंचने के अनुभव को सुखद बनाने के लिए राज्य चुनाव आयोग ने ये फैसला किया है.
क्या है 'पिंक बूथ'
पिंक बूथ में तैनात चुनाव अधिकारी ही नहीं सुरक्षा अधिकारी भी सिर्फ़ महिलाएं होती हैं. लेकिन बूथ में महिला और पुरूष दोनों जाकर वोट डाल सकते हैं.
पिंक बूथ बनाने के इस्तेमाल में लाया जाने वाला कपड़ा, टेबल क्लॉथ, बलून सब पिंक होगा.

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ऐसे बूथ पर बच्चों के लिए खेलने की जगह भी होती है और वो भी पिंक.
कर्नाटक सीईसी दफ़्तर ने इस चुनाव के लिए बाकायदा एक कंसल्टेंट नियुक्त किया है.
सीनियर कंसल्टेंट पीएस वस्त्राड के मुताबिक, "पिंक बूथ का मक़सद है कि हर महिला और पुरुष के लिए वोट देना एक सुखद अनुभव हो. अक्सर गर्मी में शहरी महिलाएं बूथ पर कम जाती हैं. बस उन्हें बूथ तक लाने की ये पहल है. कर्नाटक के लिए ये अपने आप में पहला अनुभव होगा."

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पिंक बूथ की शुरूआत
भारत में चुनाव के दौरान इस तरह के बूथ बनाने की पहल, पहली बार पूर्व चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में की थी.
बीबीसी से बात करते हुए नसीम ज़ैदी ने इस सोच के पीछे का कारण बताया.
उनके मुताबिक, "चुनावी प्रक्रिया में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी के लिए उन्होंने ऐसे बूथ का कॉन्सेप्ट तैयार किया था."
लेकिन इस तरह के इंतज़ाम से वाकई महिलाएं बूथ तक पहुंचती हैं?
इस पर ज़ैदी कहते हैं, "इसके आंकड़े फ़िलहाल मेरे पास नहीं है. लेकिन आंकड़ों से बड़ी बात ये कि ऐसे बूथ बनाने से महिलाओं का उत्साह बढ़ता है. वोट देते समय अपने आस-पास महिला सुरक्षा कर्मी को देख कर, महिला अधिकारी को देख कर उनका अनुभव बेहतर होता है. कई जगहों पर इस तरह के बूथ बनने के बाद बूथ पर पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों से ज्यादा थी."

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2015 में हर विधानसभा में एक पिंक बूथ बनाने से इसकी शुरूआत हुई थी. लेकिन बाद में धीरे धीरे इसकी संख्या चुनाव दर चुनाव बढ़ती गई.
इस तरह के सभी इंतजाम के बारे में सुन कर एक ही सवाल मन में उठता हैं, क्या वाकई में कर्नाटक में महिलाएं बूथ तक नहीं जाती?
हमने यही सवाल कर्नाटक के सीईसी के कंसल्टेंट वीएस वस्त्राड से पूछा. उनके मुताबिक, "महिलाएं कर्नाटक में पहले भी वोट देने के लिए निकलती थी. 2008 के मुकाबले 2013 में 7% ज़्यादा महिलाओं ने वोट किया. लेकिन हम इस संख्या को और आगे ले जाना चाहते हैं."
आंकड़े क्या कहते हैं ?
कर्नाटक चुनाव आयुक्त की आधिकारिक बेवसाइट के मुताबिक कर्नाटक में इस बार तकरीबन 2 करोड़ 51 लाख पुरुष मतदाता हैं और 2 करोड़ 44 लाख महिला मतदाता हैं.
साल 2008 में 63.2 फीसदी महिलाओं ने वोट डाले थे, जबकि साल 2013 में 70.5 फ़ीसदी महिला मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया.
लेकिन क्या 'पिंक' बूथ इस संख्या को आगे ले जाने में कामयाब होंगे?

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बेंगलुरु की रहने वाली स्निग्धा पटनायक के मुताबिक, "बूथ के रंग के मुझे फर्क नहीं पड़ता, बस वोट डालते समय लाइन छोटी होनी चाहिए."
लेकिन उनकी ही पड़ोसी पुष्पा, उनसे इत्तेफाक़ नहीं रखती. पुष्पा का छह साल का छोटा बेटा है.
वो इस बार वोट डालने के लिए काफी उतावली है. पुष्पा के मुताबिक, "मुझे भी वोट डालते समय लाइन छोटी चाहिए. लेकिन साथ में हर कुछ गुलाबी गुलाबी होगा, बच्चों के खेलने के लिए जगह तो वो अहसास अलग ही होगा."
गुलाबी रंग महिलाओं को कितना अपनी तरफ आकर्षित करते हैं इस पर 2007 में ब्रिटेन की न्यू कैसल यूनिवर्सिटी में इस पर शोध भी हुआ है. वयस्कों पर हुए इस शोध में पता चला है कि महिला हो या पुरूष, अधिकांश का फ़ेवरेट रंग ब्लू होता है.
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