यहां पीरियड्स के दौरान गांव से निकाल दी जाती हैं महिलाएं?
- Author, प्रतिमा धर्मराजु
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
आंध्र प्रदेश के एक गांव में महिलाओं को बच्चे के जन्म के बाद पहले तीन महीने के लिए और पीरियड्स के दिनों में घरों में रहने की अनुमति नहीं दी जाती है. आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले के रोला मंडल के गंताहल्लागोट्टी गांव में यह प्रथा आज भी बदस्तूर जारी है.
गांव में 120 घर हैं जो ओरुगोल्ला और कादुगोल्ला समुदायों के हैं. महिलाओं में शारीरिक और भावनात्मक बेचैनी पैदा करने वाले पीरियड्स के दौरान कादुगोल्ला समुदाय उन्हें अलग थलग रखने जैसी प्रथाओं को मानता है.

इमेज स्रोत, Prathima/bbc
जन्म के बाद तीन महीने गांव निकाला
इस गांव में, पीरियड्स के पांच दिनों में और जन्म देने के तीन महीने बाद तक महिलाओं को गांव में रहने की अनुमति नहीं है.
यहां तक कि स्कूल जाने वाली लड़कियां भी इस नियम से अछूती नहीं हैं और उन्हें गांव से दूर ताड़ के पत्तों से बनी झोपड़ी में रहना और इस दौरान वहीं अपना खाना बनाना होता है.
हालांकि स्कूल गांव से तीन किलोमीटर दूर है, लेकिन पीरियड्स के दौरान स्कूल जाने के लिए लड़कियों को गांव के एक छोर से दूसरी तक 11 किलोमीटर पैदल चल कर जाना पड़ता है क्योंकि तब उन्हें गांव में घुसने की अनुमति नहीं होती.
मान्यता है कि पीरियड्स के दौरान ग्रामीणों को इन लड़कियों से बोलना या स्पर्श नहीं करना चाहिए. यदि कोई इस नियम का उल्लंघन करता है तो उसके गांव में घुसने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है.
इस दौरान महिलाओं और लड़कियों को किसी भी मंदिर में प्रवेश की अनुमित नहीं होती और केवल घर के पुरुष ही मंदिरों में पूजा करते हैं.
गांव के बाहर झोपड़ी में किया जाता है शिफ्ट
जब कोई महिला अपने प्रसव के नौवें महीने में रहती है तो ताड़ के पत्तों या बांस की बनी एक झोपड़ी गांव के बाहर बनाई जाती है ताकि डिलिवरी की तारीख तक पहुंचने के साथ ही उस महिला को वहां शिफ्ट कर दिया जाएगा.
डिलिवरी के बाद मां और नवजात बच्चे को बिना किसी सहायता और बुनियादी जरूरतों जैसे बिजली और पानी के अंधेरे झोपड़ी में छोड़ दिया जाएगा. उसे वहां तीन महीने तक अपने बच्चे के साथ रहना होगा.
इन्हें न तो कोई सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी और न ही कोई घरेलू सहायता. मां को खुद ही खाना बनाना होगा, कपड़ा धोना होगा और बच्चे की देखभाल करनी होगी.
तीन महीने बाद गांव में वापस आने के लिए उसे एक मंदिर जाना होगा और वहां देवता की पूजा करनी होगी. कुछ गांव वालों ने बीबीसी को बताया कि पहले यह प्रतिबंध पांच महीने के लिए होता था.
आंखोंदेखी

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जब वास्तविकता जानने के लिए मैं गांव पहुंचीं, तो मैंने एक छोटे से अंधेरे कमरे के सामने चार महिलाओं को बैठे देखा.
एक और झोपड़ी में एक मां अपने नवजात बच्चे के साथ बहुत ही दयनीय स्थिति में रह रही थी.
शशिकला ने कहा, " इसे भगवान का आदेश मानते हुए हमें इन प्रथाओं को मानना होता है और हम इनके ख़िलाफ़ विरोध करने की स्थिति में नहीं हैं."
गांव वाले सरकार से अपील कर रहे हैं कि वो कमरे का निर्माण करे जिसमें इस दौरान जीवित रहने के लिए बुनियादी सुविधाएं जैसे पानी और बिजली की सुविधाएं हों क्योंकि वो गांव के बुजुर्गों के निर्धारित नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकते.
शशिकला कहती हैं, "इस झोपड़ी में बिजली नहीं होने और गर्मी की वजह से मेरा बच्चा रोना बंद नहीं करता."
एक और गांव वाले वीरन्ना ने बताया, "भले ही महिलाएं इन प्रथाओं से पीड़ित हैं, हमें संस्कृति के नाम पर इन प्रथाओं का पालन करना पड़ता है."
सरकारी अभियान
अनंतपुर ज़िले के ज़िला चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी (डीएमएचओ) डॉ. अनिल कुमार ने कहा, "ग्रामीणों को इस तरह की प्रथाओं को खत्म करने के लिए गांववालों को शिक्षित करने के हमारे प्रयासों के बावजूद, हम इसमें कोई बदलाव नहीं ला सके हैं.
उन्होंने कहा कि वैसे एक अच्छा बदलाव देखने को मिल रहा है क्योंकि हाल के दिनों में अपने बच्चों को जन्म देने कुछ महिलाएं अस्पताल आई हैं.
कादुगोल्ला समुदाय
कादुगोल्ला समुदाय के सदस्य हिंदू धर्म का पालन करते हैं. वो एट्टप्पा और चिक्कन्ना देवता की पूजा करते हैं.
गुंडुमाला गांव के सरपंच चंद्रप्पा ने बताया, "वो इस क्षेत्र के पिछड़े समुदाय से जुड़े हैं और रोल्ला, मदकासीरा, गुड़िबांदा, अमरापुरम और अनंतपुर ज़िले के अगाली मंडलों में फैले इस समुदाय के कुल 40 हज़ार सदस्य हैं."
पीरियड्स और डिलिवरी के दौरान इस तरह का अभ्यास इन समुदायों के लोगों के बीच प्रचिलित है.
इस समुदाय के अधिकांश लोग आंध्र प्रदेश के रोल्लागल्ला हट्टी, रत्नागिरि गोल्लाहट्टी, नासेपल्ली गोल्लाहट्टी, मदुगी गोल्ला हट्टी, डोक्लापल्ली गोल्ला हट्टी, केनकेरा गोल्ला हट्टी, जंगामा वीरा गोल्ला हट्टी गांवों में रहते हैं.
उनका मुख्य व्यवसाय भेड़ पालन है. इस समुदाय के पुरुष साल के केवल पांच महीनों के लिए इस गांव में रहते हैं बाकी के समय वो काम की तलाश में कर्नाटक में रहते हैं.
गांव वालों ने बताया कि गंटाहल्लागोट्टी गांव के बच्चे पिछले पांच साल से स्कूल जाने लगे हैं.
गंटाहल्लागोट्टी गांव में एक मंदिर है. इस मंदिर के पुजारी अपने पांव में बिना कुछ पहने दूर दूर तक पैदल चलते हैं और बस, बाइक और यहां तक की कार का भी ऐसे ही सफर करते हैं.
यहां की लड़कियों की 18 साल की उम्र होने तक शादी हो जाती है.
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