मेघालय: घर में मर्दों की नहीं चलती और सियासत में औरतों की

MEGHALAYA

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, शिलॉन्ग से

पूर्वोत्तर राज्य मेघालय भारत में 'रॉक' संगीत का बड़ा केंद्र है. यहां के 'रॉक बैंड' देश और विदेश में अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए हैं.

इनमें कई बैंड ऐसे हैं जिन्हें सिर्फ़ महिलाएं चलाती हैं.

मेघालय एक महिला प्रधान समाज है जहां शादी के बाद पुरुष अपनी पत्नी के घर में रहता है.

यहां संपत्ति की वारिस भी बेटियां होती हैं और बेटा भी अपनी मां के नाम से जाना जाता है.

पूर्वोत्तर भारत के इस राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. कई राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल इस चुनावी समर की तैयारियां कर रहे हैं.

मगर महिला प्रधान समाज होने के बावजूद राजनीति में महिलाओं की मौजूदगी न के बराबर ही है.

मेघालय

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सभी दल एक समान

महिलाओं को टिकट देने के मामले में सारे राजनीतिक दल एक समान हैं. भारतीय जनता पार्टी ने मैदान में सिर्फ़ दो महिला उम्मीदवारों को उतारा है.

राज्य भाजपा की नेता बियांका किंडीयाह कहती हैं कि महिलाओं के लिए राजनीति में जगह बनाना मुश्किल काम है.

वो कहती हैं कि 'टिकट उन्हीं को दिया जाता है जो अपने प्रतिद्वंद्वी को कड़ा मुक़ाबला दे सकें और चुनाव जीत सकें.'

बियांका कहती हैं, "हां, मेघालय एक महिला प्रधान समाज है. यहाँ महिला ही संपत्ति की वारिस भी है. लेकिन जब आप राजनीति की बात करते हैं तो ये बहुत मुश्किल काम है. महिलाओं के लिए पुरुषों की राजनीतिक दुनिया में अपनी जगह तलाशना बिल्कुल नामुमकिन सा है. जो इक्का-दुक्का महिलाएं राजनीति में हैं भी, वो इसलिए कि उनका परिवार राजनीतिक पृष्ठभूमि वाला है."

सबसे ज़्यादा सात महिलाओं को टिकट कांग्रेस पार्टी ने दिए हैं जबकि क्षेत्रीय दलों का तो और बुरा हाल है.

बियांका किंडीयाह

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महिला उम्मीदवार कम क्यों?

आख़िर महिलाओं को प्रत्याशी क्यों नहीं बनाना चाहते हैं ये राजनीतिक संगठन ?

प्रमुख क्षेत्रीय दल यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी यानी यूडीपी की वरिष्ठ नेता प्रीटी खारपुंगरो कहती हैं कि महिलाओं के लिए राजनीति में कोई जगह है ही नहीं.

प्रीटी खारपुंगरो का कहना था कि मसला ये नहीं है कि राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट नहीं देते.

वो कहती हैं, "हमारे समाज में पुश्त दर पुश्त यही मान्यता रही है कि महिला घर की मालिक है. उसकी हदें सिर्फ़ वहीं तक सीमित हैं. चुनाव लड़ना हो या जंग, इसे सिर्फ़ पुरुषों का काम माना जाता रहा है. महिलाओं को इसमें पीछे ही रखा जाता है. इसलिए राजनीति में महिलाओं का रुझान न के बराबर ही है और कोई उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं बनाना चाहता है."

प्रीटी खारपुंगरो

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मेघालय में 60 में से 36 ऐसी विधानसभा की सीटें हैं जहाँ महिलाओं की जनसंख्या पुरुषों से ज़्यादा है.

कुल 307 उम्मीदवारों में सिर्फ 33 महिलाएं ही इस बार चुनाव लड़ रही है. इनमे ज़्यादातर निर्दलीय ही हैं.

पिछले विधानसभा के चुनावों में तो मात्र 25 महिला उम्मीदवार ही थीं जिनमें से सिर्फ चार ही चुनाव जीत पाई थीं. ये चारों जीती हुई महिला विधायक कांग्रेस पार्टी की हैं.

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पुरुष भी मांग रहे अधिकार

मेघालय की राजनीति में जहां महिलाओं की उपस्थिति कम है, वहीं पुरुष भी अपने कुछ अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं.

पुरुषों का कहना है कि ख़ासतौर पर जनजातीय 'खासी' और 'गारो' समाज में पुरुषों को न संपत्ति का अधिकार है और न ही उन्हें घर के प्रधान के रूप में ही मान्यता मिलती है.

पुरुष अपने ही घर में एक 'बाहर के आदमी' के रूप में रहता है जिसकी ज़रा भी नहीं चलती.

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पुरुषों के अधिकारों के लिए तीन दशकों से काम कर रहे एक संगठन के सदस्य हैं- माइकल सीएम.

वो कहते हैं कि उनके संगठन के प्रयासों ने सरकार को दो क़ानून बनाने पर मजबूर किया, जिसमें एक संपत्ति में अधिकार और दूसरा विवाह का अनिवार्य पंजीकरण.

बीबीसी से बात करते हुए माइकल सीएम का कहना था, "लोगों को बाहर से देखने में लगता है कि मेघालय में महिला प्रधान समाज है. लेकिन जो पुरुष इस समाज में रहते हैं, सिर्फ़ उनको ही पता है वो कैसे रह पाते हैं. लोग समझते हैं कि मर्द बैल है जो सिर्फ़ बच्चे पैदा करने का काम कर सकता है. मेघालय के पुरुषों के बारे में इस तरह की धारणा की वजह से हमने अपने अधिकारों के लिए अभियान चलाया. घर में बाप का कोई महत्व नहीं है क्योंकि बच्चे माँ के वंश का नाम लेकर आगे बढ़ते हैं. संपत्ति का मालिक सबसे छोटी बेटी या फिर मामा ही होता है. बाप के कोई अधिकार नहीं हैं."

माइकल सीएम

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मेघालय के समाज ने ऐसी महिलाओं को स्वीकार किया है जिनके बच्चे अलग-अलग पिताओं से हैं.

मगर अब ऐसी घटनाएं बढ़ रहीं हैं, जब शादी के कुछ ही दिनों के अंदर पति अपनी पत्नी का घर छोड़कर चला जाता है और महिला किसी और से शादी कर लेती है.

मेघालय की सरकार ने इन घटनाओं को देखते हुए विवाह के अनिवार्य पंजीकरण का क़ानून बनाया तो है मगर चर्च के विरोध की वजह से इसे लागू नहीं किया जा सका है.

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