धुंध में पटरियों पर कैसे दौड़ती है भारतीय रेल?

भारतीय रेल, रेल मंत्रालय, रद्द ट्रेनें, यात्री

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    • Author, भूमिका राय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

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अख़बार के पहले पन्ने पर कुछ दिनों से ये खबरें छायी हुई हैं. यात्रियों की सबसे बड़ी शिक़ायत ये है कि उन्हें ट्रेनों से जुड़ी जो जानकारी दी जाती है वो सही नहीं होती.

यात्रा करने वालों का कहना है कि उन्हें रेलवे की ओर से मैसेज तो भेजे जाते हैं लेकिन वो भी कई बार ग़लत जानकारी ही देते हैं.

हालांकि कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ये मानते हैं कि धुंध है तो ट्रेन लेट होंगी ही लेकिन उसकी सही जानकारी नहीं मिलना सबसे बड़ी परेशानी है.

एक ओर जहां यात्रियों की अपनी समस्याएं हैं वहीं रेल विभाग की भी कुछ मजबूरियां हैं. तकनीकी स्तर के साथ ही रेल विभाग की कार्य-प्रणाली भी एक बड़ा मुद्दा है.

क्या अंतर है हमारे और दूसरे देशों की तकनीकी में?

भारतीय रेल के सीपीआरओ नितिन चौधरी ने बीबीसी को बताया कि विदेशों में सिग्नलिंग प्रणाली हमारे देश की तुलना में थोड़ी अलग है.

वहां ट्रेन कंट्रोल सिस्टम भारतीय रेल के कंट्रोल सिस्टम से बिल्कुल अलग है. वहां के कंट्रोल सिस्टम को यूरोपियन ट्रेन कम्यूनिकेशन सिस्टम कहते हैं, जोकि अति आधुनिक तकनीकी है.

जिसमें सैटेलाइट, ग्राउंड बेस्ड इन्स्टॉलेशन और कंम्यूटर की मदद से हर ट्रेन की स्थिति, हर ट्रैक, हर ट्रेन की मूवमेंट पर नज़र रखी जाती है.

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नितिन बताते हैं कि विदेशों में सैटेलाइट की मदद से ट्रेनों के सिग्नल्स एक सेंट्रल लोकेशन से मॉनिटर किए जाते हैं. जबकि भारत में ये सिस्टम नहीं है.

भारत में सिग्नल्स ऑक्यूपेंसी के आधार पर भेजे जाते हैं न कि सैटेलाइट कम्यूनिकेशन के आधार पर.

मतलब, जब कोई ट्रेन एक स्टेशन छोड़कर चली जाती है तो वो सिग्नल देती है. ये सिग्नल अगले स्टेशन पर पहुंचने और पिछले स्टेशन को छोड़ने के दौरान दिया जाता है.

ये हमेशा नियत होता है, इसमें कभी बदलाव नहीं किया जा सकता.

ऐसे में अगर ट्रेन ड्राइवर विज़िबिलिटी की प्रॉब्लम के चलते सिग्नल नहीं देख पा रहा है तो उसके पास कोई भी दूसरा विकल्प नहीं होता है और ऐसे में ट्रेन रोकना ही एकमात्र विकल्प होता है.

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अगर ड्राइवर ट्रेन रोक नहीं रहा है तो वो उसकी स्पीड को कम कर देता है ताकि जिस सिग्नल को वो देख नहीं पा रहा वो ओवर-शूट न हो जाए.

नितिन कहते हैं मान लीजिए ड्राइवर ट्रेन की स्पीड को कंट्रोल करके नहीं चल रहा और विज़िबिलिटी की प्रॉब्लम के चलते उसने रेड सिग्नल नहीं देखा तो दुर्घटना की आशंका बहुत बढ़ जाती है.

आख़िर क्यों चलते-चलते रुक जाती है या धीमी हो जाती है ट्रेन?

भारतीय रेलवे के प्रिंसिपल चीफ़ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर आर के तिवारी का कहना है कि ट्रेनों की रफ़्तार या उनका रुकना सबकुछ सिग्नल बेस्ड होता है. सिग्नल क्लीयर है और ड्राइवर को साफ़ नजर आ रहा है तो वो फ़ुल स्पीड में चलेगा. सिग्नल नहीं दिख रहा तो स्वभाविक सी बात है वो धीरे ही ट्रेन बढ़ाएगा.

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ड्राइवर तब तक इंजन की स्पीड नहीं बढ़ा सकता जब तक उसे ये सुनिश्चित न हो जाए कि आगे का ट्रैक क्लीयर है. कई बार तो ऐसी स्थिति भी आ जाती है कि सिग्नल जब बिल्कुल बगल में आ जाता है तब नज़र आता है. ऐसी स्थिति में धीमे चलना या रुक-रुककर चलना ही विकल्प होता है.

तो फिर क्यों नहीं किए जा रहे सुधार के लिए उपाय?

सीपीआरओ नितिन कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि हमें इन कमियों का अंदाज़ा नहीं है. इस दिशा में काम भी किए जा रहे हैं.

भारतीय रेल, यूरोपियन ट्रेन कम्यूनिकेशन सिस्टम को लागू करने पर काम कर रहा है. हालांकि ये अभी प्रयोगात्मक स्तर पर है. लेकिन ट्रेनें सुरक्षित गंतव्य स्थान पर पहुंचे इसके लिए फ़ॉग सेफॉ डिवाइस का इस्तेमाल किया जा रहा है.

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भारतीय रेल के प्रिंसिपल चीफ़ इलेक्ट्रिकल इंजीनियर आर के तिवारी का कहना है कि यह एक आधुनिक डिवाइस है. फ़ॉग सेफ़ डिवाइस जीपीएस आधारित एक डिवाइस है, जो समय-समय पर सिग्नल की जानकारी देता रहता है.

इसमें एक प्रोग्राम्ड मैप होता है, जो अपनी करेंट लोकेशन को जीपीएस से मैच करता रहता है.

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लोको पायलट फौरी लाल का कहना है कि बतौर ड्राइवर उन्हें कभी कोई परेशानी नहीं होती. फ़ॉग सेफ़ डिवाइस से काफ़ी सहूलियत हो जाती है.

उन्होंने बताया कि अधिकारियों की ओर से हर लोको पायलट को ये शख़्स निर्देश मिले होते हैं कि चाहे ट्रेन जितनी धीरे चले, दुर्घटना नहीं होनी चाहिए.

फौरी लाल कहते हैं कि ये आदेश होता है कि जब तक सिग्नल क्लीयर न हो ट्रेन आगे न बढ़ाया जाए.

रेल विभाग की मजबूरी

नितिन कहते हैं कि तकनीकी माध्यम में हम विदेशों से तुलना करते हैं लेकिन बहुत सी मूलभूत परेशानियां नागरिकों के स्तर पर भी हैं.

वो बताते हैं कि विदेशों में रेलवे ट्रैक के दोनों ओर बाड़ लगी होती है ऐसे में किसी इंसान या जानवर का अचानक से ट्रैक पर आ जाना लगभग असंभव सा होता है.

जबकि भारत में लोग क्रॉसिंग गेट को पार करके ट्रैक पर आ जाते हैं. ऐसे में ड्राइवरों के लिए हमेशा मुश्किल बनी रहती है.

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नितिन मानते हैं कि अनुशासन की कमी एक बहुत बड़ा मुद्दा है.

बावजूद इसके नितिन इस बात से इनकार नहीं करते हैं कि सर्दियों में विज़िबिलिटी एक बड़ा मसला है, जिससे रेल यात्रियों को काफ़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. लेकिन वो ये उम्मीद ज़रूर जताते हैं कि आने वाले समय में इसमें काफ़ी हद तक सुधार कर लिए जाएंगे.

लेकिन सच्चाई यही है कि अभी जो भी तकनीक़ी है, सुधार हैं सबकुछ प्रायोगिक स्तर पर हैं और जब तक ये बहाल नहीं हो जातीं मुसीबतें यूं ही बनी रहेंगी.

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