भारतीय रेल से कितना बेहतर चीन का रेल नेटवर्क

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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, संवाददाता, दिल्ली
भारतीय रेल के बारे में सोचते ही जहां मैली चादरें, बेस्वाद ठंडा खाना, घंटों की देरी और दुर्घटनाओं के ख़याल आते हैं वहीं चीन की रेल के लिए साफ़-सुंदर, तेज़, व़क्त की पाबंद और सुरक्षित जैसे विश्लेषणों का इस्तेमाल किया जाता है.
रेल की दुनिया में चीन को शिखर पर पहुंचाया है साल 2007-08 में शुरू हुए उसके 'हाई स्पीड रेल नेटवर्क' ने.
क़रीब 20,000 किलोमीटर की ये रेल दुनिया का आधे से ज़्यादा 'हाई स्पीड रेल नेटवर्क' है.
इस पर चलने वाली ट्रेन 300 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार तक दौड़ सकती हैं जिस वजह से इन्हें 'बुलेट ट्रेन' का नाम दिया गया.

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भारत में ऐसा कोई नेटवर्क नहीं है. जुलाई 2016 में आगरा और दिल्ली के बीच शुरू की गई 'सेमी-हाई स्पीड रेल', गतिमान एक्सप्रेस की अधिकतम रफ़्तार भी 160 किलोमीटर प्रति घंटा ही है.
पर चीन की इस चमकती तस्वीर में कुछ धब्बे भी छिपे हैं. चीन के लिए 'हाई स्पीड रेल नेटवर्क' का तेज़ विकास बहुत महंगा साबित हुआ है.
'चाइना रेल कॉर्पोरेशन' के मुताबिक उसपर 600 अरब डॉलर से भी ज़्यादा का कर्ज़ा है. दरअसल चीन के रेलवे में ये तेज़ विकास पिछले 25 साल के निवेश का नतीजा है. 1990 में चीन में रेल की स्पीड 35-40 किलोमीटर प्रति घंटा ही थी.
भारतीय रेल की मौजूदा दिक्कतों की ही तरह चीन में भी पहले से बनी हुई रेल लाइनों पर यात्रियों का बहुत दबाव था और नई तकनीक के मुताबिक ट्रेनों और ट्रैक्स को विकसित करने की ज़रूरत थी.
इन ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए हाई स्पीड रेल बनाना बहुत महंगा भी नहीं था. एक पार्टी के राज में भू-अधिग्रहण आसान था और लोगों से सस्ते दर पर काम करवाया जा सकता था.
अंधाधुंध तरीक से क़रीब 20,000 किलोमीटर के 'हाई स्पीड रेल नेटवर्क' का निर्माण किया गया. वर्ल्ड बैंक ने भी कई प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाया.

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ज़्यादातर रेल मध्य और पूर्वी चीन में बनाई गई. पर कई ऐसी जगह भी लाइनें बिछीं और स्टेशन बने जहां आबादी कम थी या आबादी वाले इलाके 100 किलोमीटर की दूरी पर थे.
इन लाइनों पर अब घाटा, टिकट से मिलनेवाली कमाई का तीन गुना तक हो गया है. तब उम्मीद थी कि जहां ट्रेन जाएगी वहां नई बसावट बनती जाएगी.
ऐसा बड़े शहरों के आसपास सैटेलाइट टाउन्स तो विकसित हुए, लेकिन छोटे शहरों के पास नहीं. स्टेशन को शहर से दूर बनाए जाने की एक वजह ये भी थी कि तेज़ रफ़्तार के लिए रेलवे लाइन का सीधा होना ज़रूरी था. दुनियाभर में 'हाई स्पीड ट्रेन्स' सीधे ट्रैक्स पर ही चलाई जाती हैं.

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यही वजह है कि भारत में गतिमान एक्सप्रेस, दिल्ली-आगरा के रास्ते पर चलनेवाली शताब्दी से थोड़ा ही कम समय लेती है.
रास्ता घुमावदार है और तेज़ रफ़्तार की क्षमता के बावजूद रास्ते के कुछ हिस्से में ही ट्रेन उस गति से चल पाती है.
सिर्फ़ शंघाई-बीजिंग जैसी कुछ रेलवे लाइन में मुनाफा हो रहा है. जिसके चलते उन जगहों के आसपास के इलाकों में आबादी बस गई है.
तेज़ गति से जुड़ी समस्याएं और भी हैं. साल 2011 में चीन की दो हाई-स्पीड ट्रेनों के टकराने से 40 लोगों की मौत हो गई और रेल मंत्री को इस्तीफ़ा देना पड़ा.
यहां तक कि रेल मंत्रालय ही ख़त्म कर दिया गया और रेल को परिवहन मंत्रालय में शामिल कर दिया गया.
'हाई स्पीड ट्रेन्स' की गति को 350 किलोमीटर प्रति घंटा से कम कर 300 किलोमीटर प्रति घंटा तक ला दिया गया.

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भारत में रेलवे ट्रैक्स की बदहाल स्थिति की वजह से, तेज़ गति वाली ट्रेन लाने में दुर्घटना का ख़तरा एक बड़ी चुनौती है.
स्पेन से भारत लाई गई टैल्गो ट्रेन 180 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार तक जा सकती है पर अभी उसे इस्तेमाल में नहीं लाया जा सका है क्योंकि सुरक्षा और गति से जुड़े 'ट्रायल रन' संतोषजनक तरीके से पूरे नहीं हो पाए हैं.
भारत में हर साल 4,500 किलोमीटर ट्रैक का 'रिन्यूल' होना चाहिए पर पैसों की कमी के चलते पिछले छह सालों में ये लगातार कम होता जा रहा है.
सरकार की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल 2014 में 5,300 किलोमीटर ट्रैक 'रिन्यू' होना था पर प्रावधान महज़ 2,100 किलोमीटर था.
आधे से ज़्यादा रेल दुर्घटनाएं बिना फ़ाटक वाले रेल क्रॉसिंग पार कर रहे लोगों और उनकी गाड़ियों के ट्रेनों से टकराते व़क्त होती हैं.

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राष्ट्रीय आपराधिक क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक साल 2014 में रेल दुर्घटनाओं में मारे गए क़रीब 28,000 लोगों में से क़रीब 18,000 ट्रेन से गिरने या भिड़ने की वजह से मारे गए.
अप्रैल 2014 में देश में 11,000 से ज़्यादा ऐसे क्रॉसिंग थे जिनपर 'फुट ओवरब्रिज' और 'सबवे' बनाने का काम होना है पर पैसे की कमी की वजह से रुका हुआ है.
भारतीय रेल कहता है कि आमदनी के मुकाबले यात्री रेल सेवाएं चलाने की लागत दो गुना से भी ज़्यादा है.
रेलवे द्वितीय श्रेणी की टिकट के दाम कम रखने की सामाजिक ज़िम्मेदारी के चलते हर साल भारी घाटा उठाता है. कई ऐसी लाइन्स पर ट्रेनें चलाई जा रही हैं जहां ट्रैफ़िक बहुत कम है.

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इस सबको ध्यान में रखते हुए ही मौजूदा केंद्र सरकार ने रेल विकास के लिए साल 2015 में 137 करोड़ डॉलर के निवेश का ऐलान किया. इसे पांच साल में इस्तेमाल किया जाना है.
अगस्त 2014 में भारत सरकार ने भारतीय रेल के निर्माण कार्य, रख-रखाव और चलाने में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को भी मंज़ूरी दी थी.
दिसंबर 2015 में जापान ने भारत के साथ पहले 'हाई स्पीड रेल लिंक' बनाने का क़रार किया जो मुंबई और अहमदाबाद को जोड़ेगा.
चीन में अब पश्चिमी और दक्षिणी हिस्सों में 'हाई स्पीड रेल नेटवर्क' बनाया जा रहा है. ये और ख़र्चीला है क्योंकि वहां आबादी कम है और शहरों में दूरी ज़्यादा है.

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विकसित और धनी देशों के समूह, 'ऑर्गेनाइज़ेशन फ़ॉर इकॉनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट' यानी ओईसीडी के मुताबिक 250 किलोमीटर प्रति घंटा की गति के मुकाबले 350 किलोमीटर प्रति घंटा की गति की ट्रेन और ट्रैक के लिए 90 फ़ीसदी ज़्यादा ख़र्च आता है.
ऐसे में इस निवेश से मिलनेवाले फ़ायदे और नुक़सान का आंकलन बहुत ज़रूरी है.
सपना तेज़ रेल का हो कि बेहतर रेल का, ये सही तरीके से तय हो जाए तभी उसके पूरे होने से सबका भला होगा.
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