गुजरात डायरी: 40 सेकेंड में बात सड़क से हिंदू-मुसलमान पर आ गई

- Author, कुलदीप मिश्र
- पदनाम, भरूच से, बीबीसी हिंदी के लिए
अहमदाबाद से चलकर भरूच के न्याय मंदिर होटल पहुंचा था तो गाड़ी को सही जगह पार्क करवाने के लिए सिक्योरिटी गार्ड साहब ने सीटी बजाकर इशारा किया.
मैंने उनसे बातचीत क़ायम कर ली तो पता चला कि रौबीली मूंछों वाले विनय सिंह राजपूत राजस्थान से आकर यहां बसे हैं.
चुनाव को लेकर गुजरात के मुसलमान युवा क्या कहते हैं, देखने के लिए क्लिक करें-
मैंने उनसे पूछा कि अहमदाबाद-वडोदरा एक्सप्रेस हाइवे तो बहुत चिक्कन है लेकिन शहर के भीतर के क्या हाल हैं?तो वह बोले कि आप भरूच रेलवे स्टेशन के पास चले जाइए. सड़क पर 'खड्डे' आम नज़र आएंगे. उनका कहना था कि नेताओं को अंदर की सड़कों से लाना, ले जाना चाहिए. बाहर-बाहर से निकल जाते हैं, उन्हें कुछ पता नहीं लगता.

सड़कों का विमर्श हिंदू मुसलमान तक
लेकिन इसके बाद विनय सिंह राजपूत साहब ने चौंका दिया. बोले कि आप मुस्लिम एरिया में चले जाएं तो आपको अच्छी सड़कें मिलेगी क्योंकि अहमद पटेल के पास पैसा बहुत था. गुजरात में हिंदू सरकार है, लेकिन हिंदुओं के लिए कुछ नहीं हो रहा है.
मैं इस सिक्योरिटी गार्ड से सड़कों का हाल पूछ रहा था और चालीस सेकेंड में बात हिंदू मुसलमान पर आ गई थी. चुनावी मौसम में यह बात ऐसी नहीं है कि इस पर मिट्टी डाल दी जाए.
शायर मुनव्वर राना ने पतंगों के हिंदू-मुसलमान हो जाने पर छतों के हैरान होने की बात लिखी थी. सड़कों की मज़हबी प्रतियोगिता पर किसी ने कुछ लिखा हो तो मुझे याद नहीं.
बहरहाल, विनय सिंह राजपूत को सरकारी योजना से भगवा रंग की साइकल मिली है, जिस पर लिखा है 'ग़रीब कल्याण मेलो (मेला) वर्ष 2010-11.

सड़कें वाक़ई अच्छी हैं!
विकास की व्य़ाख्या कई तरह से की जाती है और इसका जो पैमाना सबसे प्रत्यक्ष और प्रकट समझा जाता है, वो है सड़कें. बाहरियों को बिजली और पानी का हाल पूछना पड़ता है. सड़कें सामने दिख जाती हैं.
बहुत लोगों की दलील ये है कि विकास तभी कहीं पहुंचेगा, जब वहां आदमी पहुंचेगा. इसलिए सड़कों के लिए मक्खन और मलाई से भी आगे बढ़कर सिनेमाई विशेषण देना भी नेताओं का प्रिय शगल रहा है.
इस बात से नाइत्तेफाक़ी किसी की नहीं होगी कि सड़कें, अच्छी सड़कें ज़रूरी हैं.
बीते कुछ दिनों में उत्तर, मध्य और फिर दक्षिण गुजरात में मैं जहां से गुज़रा, इस बात की तसदीक तो कर सकता हूं कि शहरों को शहरों से जोड़ने वाली सड़कें वाक़ई अच्छी हैं. क़स्बों, तहसीलों और गांवों की भीतरी सड़कें कैसी हैं, मैं नहीं जानता.

बनासकांठा के कुछ गांवों में गया था तो जहां तक सड़कें हैं, अच्छी हैं. जहां नहीं हैं, वहां रेतीले रास्ते ही हैं, पर वे ज़्यादा लंबे नहीं हैं.
अब तो उत्तर प्रदेश में भी हालात कुछ बदल गए, वरना हमारे जैसे यूपी वालों ने ख़राब से लेकर ख़तरनाक सड़कें तक देखी हैं.
हिल स्टेशन जो आदिवासियों को हटाकर बना
भरूच से आप आगे बढ़ें तो प्रदेश के दक्षिणी कोने में एक हिल स्टेशन है- सापुतारा. महाराष्ट्र से एकदम सटा हुआ. सूरत से यहां घूमने आए धीरेशभाई मिले. बहुत कुरेदने पर इतना ही बोले कि सरकार ने सड़कें तो बना दी हैं, लेकिन आगे भी कुछ करना चाहिए.
इसी सितम्बर में गुजरात पर्यटन विभा ने पत्रकारों के एक समूह को सापुतारा की सैर करवाई थी. मक़सद ये था कि प्रचार किया जाए कि कैसे सापुतारा का विकास एक हिल स्टेशन के तौर पर हुआ है.
लेकिन इस होटलबाज़ी और झमाझम नक्काशी के लिए यहां के मूलनिवासी आदिवासियों को यहां से हटाकर नवागाम में बसा दिया गया है.
लोकनृत्य से मनोरंजन
नवागाम के आदिवासी जो पहले खेती करके गुज़र करते थे, अब जीविका के लिए टूरिस्टों पर आश्रित है. कोई अंडे का ढेला लगाता है, कोई आलू के पकौड़े बेचता है. मैं जिस होटल में ठहरा हूं वहां नवागाम के कुछ लोग पारंपरिक नृत्य करके टूरिस्टों का मनोरंजन कर रहे थे.

हफ़्ते में दो दिन यहां ख़ासी संख्या में घूमने वाले आते हैं. पांच दिन मंदी रहती है. बारिश के मौसम में जब टूरिस्ट नहीं आते, उन्हें मज़दूरी करनी पड़ती है. इसी सापुतारा की ज़मीन पर कभी वे खेती किया करते थे. ज़ेहन में सवाल आता है कि रोजगार सृजन का यह मॉडल विकास के दायरे में आएगा क्या?
नवागाम में जहां उन्हें बसाया गया है, वहां भी बहुत सारे आदिवासियों के पास अपने घरों के, उसकी ज़मीन के मालिकाना हक़ के काग़ज़ात नहीं हैं. इस बारे में नवगाम गांव समिति ने जून में मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी थी कि ज़मीन का हक़ बहाल किया जाए वरना विधानसभा चुनावों का बहिष्कार किया जाएगा.
सड़कें तो चिक्कन हैं, लेकिन कुछ लोगों के जीवन स्तर की राहें बंद हैं. राजमार्गों पर गड्ढे तो नहीं हैं लेकिन राज्य में बहुत कुछ है, जो गड्डमड्ड है.
विस्थापितों की अपनी विडंबनाएं हैं. सड़कों के विमर्श की अपनी सांप्रदायिकता है.
बाकी पाव भाजी खाइएगा आप. नवागाम के गोविंदभाई पवार बहुत अच्छी बनाते हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












