ब्लॉग: कराची के 'नाइन-ज़ीरो’ में मौलाना आज़ाद की याद

- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
भारत छोड़कर पाकिस्तान बसने जा रहे मुसलमानों को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की सलाह को कराची के मुहाजिर अब भी क्यों याद करते हैं और क्यों उनके भाषण की सीडी अब भी वहाँ चुपके-चुपके बाँटी जाती हैं?
इंटरव्यू के दौरान अपनी बात कहते-कहते वो साहब अचानक रुक गए और त्योरियाँ चढ़ाकर इशारे से मुझे टेप रिकॉर्डर बंद करने को कहा. जिस कमरे में मैं मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) के इस बड़े नेता का इंटरव्यू ले रहा था वो कराची के उस इलाक़े के बीचों-बीच था जिसे 'नाइन-ज़ीरो' कहा जाता है.

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'नाइन-ज़ीरो'
'नाइन-ज़ीरो' पाकिस्तान की ताक़तवर राजनीतिक पार्टी एमक्यूएम का हेडक्वॉर्टर है और आम तौर पर, अगर कोई बहुत ज़रूरी काम न हो तो, कराची के लोग इस ओर रुख़ करने से बचते हैं. इस इलाक़े का ज़िक्र भर सुनने से कराची के कई शहरियों का ठंडा पसीना छूट जाता है और वो मुस्कुराकर बात बदलने की कोशिश करते हैं.
"तुम तो हमारी कोई मदद करोगे नहीं. यानी हिंदुस्तान तो हमारी कोई मदद करेगा नहीं?" टेप रिकॉर्डर बंद होने के बाद उन्होंने उलाहना सा देते हुए कहा. मैं कुछ समझता इससे पहले उन्होंने एक कार्यकर्ता को बुलाकर सिर्फ़ इतना कहा, "ज़रा वो सीडी ले आना."

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मौलाना आज़ाद की सीडी
अगले ही पल मेरे हाथों में एक सीडी थी जिसके कवर पर मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की तस्वीर छपी थी. कराची के 'नाइन-ज़ीरो' में हिंदुस्तान के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना आज़ाद की सीडी. 'नाइन-ज़ीरो' कराची का ज़नाडू है, एक भूलभुलैया नुमा बड़ा मोहल्ला जहाँ हर गली के नुक्कड़ पर नाक़ेबंदी है.
और हर नाक़े पर मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट के जियाले सतर्क आँखें, हाथ में मोबाइल (और पायजामें में रिवॉल्वर) तैनात रहते हैं. कहते हैं कि पुलिस और पैरामिलिट्री के लोग भी बिना इजाज़त इस ओर शायद ही कभी आते हों. अगर आते भी होंगे तो भारी असलहों से लैस होकर छापामारी करने के लिए.

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मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट
मुहाजिर क़ौमी मूवमेंट की स्थापना अल्ताफ़ हुसैन ने 1984 में की. उन्होंने हिंदुस्तान छोड़कर पाकिस्तान जा बसे उर्दू-भाषी मुसलमानों से वहाँ होने वाले "भेदभाव और ज़्यादतियों" के ख़िलाफ़ एक धर्मनिरपेक्ष और उग्र आंदोलन छेड़ दिया. बाद में मुहाजिर क़ौमी मूवमेंट का दायरा बढ़ाने के लिए उसे मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट नाम दिया गया.
एक ज़माने में एमक्यूएम कराची पर लोहे के पंजे की जकड़ रखता था. इसी एमक्यूएम के मुख्यालय में घुसना चाह रहे मेहमान को गली के नाक़े पर रोककर कड़ी पूछताछ होती थी और तसल्ली होने पर आगे बढ़ने दिया जाता था. अगले नाक़े पर तैनात पार्टी कार्यकर्ताओं के इस बीच ख़बर हो जाती है कि 'नाइन-ज़ीरो' में कोई नया पंछी घुसा है.

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हक़ीक़त से नावाक़िफ़
दूसरे नाक़े पर भी वैसे ही पूछताछ की जाती है और तभी उससे अगले नाक़े तक जाने की इजाज़त मिलती है. मैं आज से नौ साल पहले हाथ में रिकॉर्डर और माइक लिए 'नाइन-ज़ीरो' के एक नाक़े से दूसरे नाक़े तक बेख़ौफ़ जा रहा था. बेख़ौफ़ इसलिए कि मैं पाकिस्तान में पहली बार गया था और 'नाइन-ज़ीरो' की हक़ीक़त से वाक़िफ़ नहीं था.
बेख़ौफ़ शायद इसलिए भी था कि मैं मुहाज़िर क़ौमी मूवमेंट के ताक़तवर नेता डॉक्टर फ़ारुख़ सत्तार से बाक़ायदा समय लेकर इंटरव्यू करने जा रहा था. बाद में डॉक्टर सत्तार मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट (पाकिस्तान) के प्रमुख हो गए. कराची शहर में जितना ख़ौफ़ 'नाइन-ज़ीरो' का है उतने ही ख़ौफ़ में 'नाइन-ज़ीरो' के बाशिंदे भी रहते हैं.

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'तेरी भी बोरी तैयार है'
अस्सी और नब्बे के दशक में कराची शहर में बोरीबंद लाशें बरामद होना आम बात हो गई थी और सबको मालूम था कि इसके पीछे कौन सी ताक़त है. राजनीतिक विरोधियों को धमकी देने के लिए तब एक ही जुमला इस्तेमाल किया जाता था, 'तेरी भी बोरी तैयार है.'
कुछ ही दिन बाद बोरी में बंद उस आदमी की लाश किसी नाले या मैदान से बरामद कर ली जाती थी. खुले आम सड़कों, चौराहों पर तड़ातड़ गोलियाँ चलना भी आम बात थी. बहरहाल, आख़िरी नाक़े से गुज़रने के बाद मैंने देखा कि काले रंग के शीशों वाली एक महँगी काली गाड़ी सड़क के बीचों बीच खड़ी थी.

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हथियारबंद होने की ग़लतफ़हमी
मैं उस ओर बढ़ ही रहा था कि अचानक गाड़ी की दोनों तरफ़ के दरवाज़े झटके के साथ गिद्ध के दो डैनों की तरह खुले और दो लोग फ़ुर्ती से कूद कर बाहर आए. वो हॉलीवुड के एक्टरों की तरह लंबे लंबे डग भरते, अपने कोट फ़हराते मेरी ओर बढ़ने लगे. मैं अपनी जगह पर जम सा गया. कहीं मेरा बेख़ौफ़ होना ग़लत तो साबित नहीं हो रहा?
कहीं मेरे हाथ में रिकॉर्डर और माइक देखकर इन्हें मेरे हथियारबंद होने की ग़लतफ़हमी तो नहीं हो गई? मैं अपने बचाव की कोई सूरत सोचने लगा कि दोनों शख़्स ऐन मेरे सामने आकर खड़े हो गए. उनमें से छोटे क़द के, दुबले पतले दाढ़ी वाले शख़्स ने मेरी ओर अपना हाथ बढ़ाया और कहा, "मैं फ़ारुख़ सत्तार. वैलकम."

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ख़बरों की मॉनिटरिंग की जाती
मुझे महसूस हुआ कि मैंने बहुत देर से ठीक से साँस नहीं ली थी. थ्री पीस सूट पहने फ़ारुख़ सत्तार से हाथ मिलाते हुए मैंने पहली बार गहरी साँस छोड़ी. अब मैं 'नाइन-ज़ीरो' की हिफ़ाज़त में था और कुछ ही देर में मुझे मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट की राजनीति और 'विज़न' की जानकारी देने के लिए पार्टी के मीडिया सेल में ले जाया गया.
यहाँ चारों ओर लगे कम से कम 24 टीवी स्क्रीनों पर दिन-रात ख़बरों की मॉनिटरिंग की जाती थी. और लंदन में रह रहे पार्टी के संस्थापक नेता अल्ताफ़ हुसैन को बराबर अपडेट किया जाता था. वहीं मैं पार्टी के उस नेता का इंटरव्यू कर रहा था जिन्होंने मुझसे रिकॉर्डर बंद करने को कहा.

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"पाकिस्तान जाकर कुछ हासिल नहीं होगा"
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के भाषण की सीडी हाथ में आते ही मुझे समझ में आ गया कि इसमें कौन सा भाषण होगा. मौलाना आज़ाद ने बँटवारे के बाद दिल्ली से पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों को 1948 में जामा मस्जिद की सीढ़ियों से एक भाषण दिया था और बताया था कि पाकिस्तान जाकर उन्हें कुछ हासिल नहीं होगा.
उन्होंने कहा था, "मुसलमानों, मेरे भाइयों, जो तुम हिंदुस्तान छोड़कर जा रहे हो, तुम्हारे जाने से हिंदुस्तान में रहने वाले मुसलमान कमज़ोर हो जाएँगे. अगर तुम बंगाल में जाकर आबाद हो जाओगे तो हिंदुस्तानी कहलाओगे, अगर सूबा एक पंजाब में जाकर आबाद हो जाओगे तो हिंदुस्तानी कहलाओगे, अगर सूबा-ए-सरहद और बलोचिस्तान में जाकर आबाद हो जाओगे तो हिंदुस्तानी कहलाओगे. अरे तुम सूबा-ए-सिंध में जाकर भी आबाद हो जाओगे तो हिंदुस्तानी ही कहलाओगे."

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मुहाजिरों की शिकायत
एमक्यूएम के जिस नेता का मैं इंटरव्यू कर रहा था उन्होंने ग़ुस्से और असंतोष भरी आवाज़ में लगभग फुसफुसाते हुए कहा, "चोरी छिपे हम मौलाना आज़ाद की ये सीडी बाँटते हैं यहाँ. हमारा (यानी भारत से पाकिस्तान गए उर्दू-भाषी मुहाजिरों का) ये हाल हो गया है पाकिस्तान में."
मुहाजिरों की शिकायत रही कि जिस पाकिस्तान के लिए उन्होंने दिल्ली, लखनऊ, आगरा, पटना और दक्कन में अपने पुरखों की धरती छोड़ी, वहाँ उन्हें न पंजाबी स्वीकार करते हैं, न पठान, न सिंधी और न बलोच. पर यही तो मौलाना आज़ाद ने उनसे कहा था. पर तब मुस्लिम लीग मौलाना आज़ाद को काँग्रेस का पिट्ठू कहती थी.
सत्तर साल पहले...
और उनके मुसलमान होने पर भी सवालिया निशान लगाती थी. पाकिस्तान जा रहे हिंदुस्तानी मुसलमानों के जिस भविष्य को मौलाना आज़ाद सत्तर साल पहले साफ़-साफ़ देख पा रहे थे, उसे न मोहम्मद अली जिन्ना देख पाए और न उनकी मुस्लिम लीग. शनिवार यानी 11 नवंबर को मौलाना आज़ाद का 130 वाँ जन्म दिवस था.
और इतने बरस में हिंदुस्तान कोई दूसरा मौलाना आज़ाद पैदा नहीं कर पाया जो कश्मीर के मुसलमानों के जख़्मों को सहला सकता और वहाँ किसी मस्जिद की सीढ़ियों पर खड़े होकर बेझिझक कह पाता - मुसलमानों! मेरे कश्मीरी भाइयों…. !!
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