मौलाना अबुल कलाम ने 1946 में ही कर दी थी 'बांग्लादेश' की भविष्यवाणी

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- Author, आरिफ़ मोहम्मद ख़ान
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का जन्म 11 नवंबर 1888 को सऊदी अरब के मक्का शहर में एक भारतीय परिवार में हुआ.
भारत में 1857 की असफ़ल क्रांति के बाद उनका परिवार मक्का चला गया था.
उनके पिता मौलाना खैरुद्दीन साल 1898 में परिवार सहित भारत लौट आए और कलकत्ता में बस गए. आज़ाद को बचपन से ही किताबों से लगाव था. जब वे 12 साल के थे तो बाल पत्रिकाओं में लेख लिखने लगे.
साल 1912 में आज़ाद ने अल-हिलाल नाम की एक पत्रिका निकालनी शुरू की. यह पत्रिका अपने क्रांतिकारी लेखों की वजह से काफी चर्चाओं में रही. ब्रिटिश सरकार ने दो साल के भीतर ही इस पत्रिका की सुरक्षा राशि ज़ब्त कर दी और भारी जुर्माना लगाकर उसे बंद करवा दिया.
1916 आते-आते आज़ाद को बंगाल से बाहर चले जाने का आदेश दे दिया गया और रांची में नज़रबंद कर दिया गया.

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राष्ट्रीय एकता के पेरोकार
सार्वजनिक जीवन में उतरने के साथ ही आज़ाद ने स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय एकता को सबसे ज़रूरी हथियार बताया. साल 1921 को आगरा में दिए अपने एक भाषण में उन्होंने अल-हिलाल के प्रमुख उद्देश्यों का ज़िक्र किया.
उन्होंने कहा, ''मैं यह बताना चाहता हूं कि मैंने अपना सबसे पहला लक्ष्य हिंदू-मुस्लिम एकता रखा है. मैं दृढ़ता के साथ मुसलमानों से कहना चाहूंगा कि यह उनका कर्तव्य है कि वे हिंदुओं के साथ प्रेम और भाईचारे का रिश्ता कायम करें जिससे हम एक सफल राष्ट्र का निर्माण कर सकेंगे.''
मौलाना आज़ाद के लिए स्वतंत्रता से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण थी राष्ट्र की एकता. साल 1923 में कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा, ''आज अगर कोई देवी स्वर्ग से उतरकर भी यह कहे कि वह हमें हिंदू-मुस्लिम एकता की कीमत पर 24 घंटे के भीतर स्वतंत्रता दे देगी, तो मैं ऐसी स्वतंत्रता को त्यागना बेहतर समझूंगा. स्वतंत्रता मिलने में होने वाली देरी से हमें थोड़ा नुकसान तो ज़रूर होगा लेकिन अगर हमारी एकता टूट गई तो इससे पूरी मानवता का नुकसान होगा.''
एक ऐसे दौर में जब राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक पहचान को धर्म के साथ जोड़कर देखा जा रहा था, उस समय मौलाना आज़ाद एक ऐसे राष्ट्र की परिकल्पना कर रहे थे जहां धर्म, जाति, सम्प्रदाय और लिंग किसी के अधिकारों में आड़े न आने पाए.

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मुस्लिम लीग से दूरी
हिंदू-मुस्लिम एकता के पैरोकार मौलाना आज़ाद कभी भी मुस्लिम लीग की द्विराष्ट्रवादी सिद्धांत के समर्थक नहीं बने, उन्होंने खुलकर इसका विरोध किया.
15 अप्रैल 1946 को कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आज़ाद ने कहा, ''मैंने मुस्लिम लीग की पाकिस्तान के रूप में अलग राष्ट्र बनाने की मांग को हर पहलू से देखा और इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि यह फ़ैसला न सिर्फ़ भारत के लिए नुकसानदायक साबित होगा बल्कि इसके दुष्परिणाम खुद मुसलमानों को भी झेलने पड़ेंगे. यह फ़ैसला समाधान निकालने की जगह और ज़्यादा परेशानियां पैदा करेगा.''
मौलाना आज़ाद ने बंटवारे को रोकने की हरसंभव कोशिश की. साल 1946 में जब बंटवारे की तस्वीर काफ़ी हद तक साफ़ होने लगी और दोनों पक्ष भी बंटवारे पर सहमत हो गए, तब मौलाना आज़ाद ने सभी को आगाह करते हुए कहा था कि आने वाले वक्त में भारत इस बंटवारे के दुष्परिणाम झेलेगा.
उन्होंने कहा था कि नफ़रत की नींव पर तैयार हो रहा यह नया देश तभी तक ज़िंदा रहेगा जब तक यह नफ़रत जिंदा रहेगी, जब बंटवारे की यह आग ठंडी पड़ने लगेगी तो यह नया देश भी अलग-अलग टुकड़ों में बंटने लगेगा.

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पाकिस्तान का भविष्य पहले ही देख लिया था
मौलाना ने जो दृश्य 1946 में देख लिया था, वह पाकिस्तान बनने के कुछ सालों बाद ही 1971 में सच साबित हो गया.
मौलाना आज़ाद ने पाकिस्तान के संबंध में कई और भविष्यवाणियां भी पहले ही कर दी थीं. उन्होंने पाकिस्तान बनने से पहले ही कह दिया था कि यह देश एकजुट होकर नहीं रह पाएगा, यहां राजनीतिक नेतृत्व की जगह सेना का शासन चलेगा, यह देश भारी कर्ज़ के बोझ तले दबा रहेगा, पड़ोसी देशों के साथ युद्ध के हालातों का सामना करेगा, यहां अमीर-व्यवसायी वर्ग राष्ट्रीय संपदा का दोहन करेंगे और अंतरराष्ट्रीय ताकतें इस पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिशें करती रहेंगी.
इसी तरह मौलाना ने भारत में रहने वाले मुसलमानों को भी यह सलाह दी कि वे पाकिस्तान की तरफ पलायन न करें. उन्होंने मुसलमानों को समझाया कि उनके सरहद पार चले जाने से पाकिस्तान मज़बूत नहीं होगा बल्कि भारत के मुसलमान कमज़ोर हो जाएंगे.
उन्होंने बताया कि वह वक्त दूर नहीं जब पाकिस्तान में पहले से रहने वाले लोग अपनी क्षेत्रीय पहचान के लिए उठ खड़े होंगे और भारत से वहां जाने वाले लोगों से बिन बुलाए मेहमान की तरह पेश आने लगेंगे.

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मौलाना ने मुसलमानों से कहा, ''भले ही धर्म के आधार पर हिंदू तुमसे अलग हों लेकिन राष्ट्र और देशभक्ति के आधार पर वे अलग नहीं हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान में तुम्हें किसी दूसरे राष्ट्र से आए नागरिक की तरह ही देखा जाएगा.''
जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो मौलाना आज़ाद की अक़्ल की दाद देनी पड़ती है उनकी सटीक भविष्यवाणियां प्रशंसनीय हैं.
शायद ये वही प्रशंसा थी जिसकी वजह से पाकिस्तानी लेखक अहमद हुसैन कामिल ने ये सवाल पूछा था- क्या अब वो वक्त नहीं आ गया है कि उपमहाद्वीप के मुसलमान, जो बीते 25 सालों में अभाव और अपमान से जूझ रहे हैं, उस मसीहा की विचारधारा को अपनाएं जिसे उन्होंने 1947 में ख़ारिज कर दिया था.












