नज़रिया: क्या सड़कें बनाकर अर्थव्यवस्था को रफ़्तार दे पाएगी सरकार?

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- Author, विवेक कौल
- पदनाम, आर्थिक विश्लेषक
जब कभी संकट आता है, राजनेता और देश प्रभावशाली ब्रिटिश अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स का रुख़ करते हैं.
कीन्स मानते थे ग्रोथ को रफ़्तार देने के लिए सरकारों को ज़्यादा उधार लेने और लोक निर्माण कार्यों में निवेश करने के लिए तैयार रहना चाहिए.
भारत की अर्थव्यवस्था अप्रैल से जून तक की तिमाही में पिछले तीन सालों में सबसे सुस्त रफ़्तार से बढ़ी. लगातार छह तिमाहियों से गिरावट का सिलसिला भी जारी रहा.
मंगलवार को नरेंद्र मोदी सरकार ने कीन्स की किताब से एक पन्ना निकाला और 83,677 किलोमीटर सड़कें बनाने के लिए 6.92 लाख करोड़ रुपये के कार्यक्रम का एलान कर दिया.
ये सड़कें अगले पांच सालों में उत्तर-पश्चिम राज्य राजस्थान से लेकर उत्तर-पूर्वी राज्य अरुणाचल तक हर राज्य को जोड़ेंगी.
इस रकम का ज़्यादातर हिस्सा 34,800 किलोमीटर हाइवे बनाने के कार्यक्रम में लगाया जाएगा. अर्थशास्त्री मिहिर स्वरूप शर्मा के मुताबिक यह कार्यक्रम 'दरअसल सरकार के दो दशक पुराने कार्यक्रम का नए रूप में ढाला गया और नवीनीकृत संस्करण' है.
इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि क्योंकि मोदी सरकार पुरानी योजनाओं को नई योजनाओं के रूप में दिखाती रही है. मगर इस पर चर्चा न करते हुए इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि यह कार्यक्रम लागू कैसे किया जाएगा.

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यह है सरकार की योजना
सरकार ने कहा है कि नेशनल हाइवेज़ अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया, अन्य प्राधिकरणों और सरकारी विभागों को पर्याप्त शक्तियां दी गई हैं.
भारत दुनिया के सबसे बड़े सड़क नेटवर्कों में से एक है. यहां 54 लाख किलोमीटर से ज़्यादा नेशनल हाइवे, स्टेट हाइवे और ज़िला व ग्राम सड़कें हैं. मगर इस नेटवर्क का सिर्फ़ 1.79 फ़ीसदी हिस्सा ही नेशनल हाइवे हैं.
सड़क बनाने के इस कार्यक्रम से हर महीने श्रम संख्या में नए शामिल होने वाले 10 लाख भारतीयों के बड़े हिस्से को मदद मिलनी चाहिए. सरकार के मुताबिक अकेले हाइवे प्रॉजेक्ट से ही 14 करोड़ श्रम दिवस पैदा होंगे.
भारत के इस श्रमबल का बड़ा हिस्सा अप्रशिक्षित या अर्ध-प्रशिक्षित है. ऐसे में सड़क बनाने के प्रॉजेक्टों से इस वर्ग को लाभ होगा और सस्ते श्रमिक भी मिलेंगे.

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क्या यह काम इतना आसान है?
सरकार इन प्रॉजेक्टों के लिए फाइनेंशियल मार्केट, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप, हाइवे पर टोल लगाकर और केंद्रीय सड़क कोष समेत कई चीज़ों के ज़रिए पैसा जुटाना चाहती है.
ऐसे में कागज़ पर यह पक्का बंदोबस्त नज़र आता है. सरकार सड़क बनाएगी, इससे बहुत से लोगों को काम मिलेगा और उन्हें पैसे मिलेंगे. यह कमाई बिज़नेस और अर्थव्यवस्था के विकास में ख़र्च होगी.
काश कि चीज़ें इतनी आसान होतीं. सरकार पांच साल में कुल 83,677 किलोमीटर सड़कें बनाना चाहती है. इसका मतलब है कि अगले पांच सालों तक प्रतिवर्ष लगभग 16,735.4 किलोमीटर सड़कें बनाई जाएंगी. क्या यह संभव है?
चलिए इसके लिए सरकार के पिछले तीन साल के आंकड़ों पर ही नज़र डाल लेते हैं. 2014-15 में 4,410 किलोमीटर सड़कें बनीं, 2015-16 में 6,601 किलोमीटर सड़कें बनीं और 2016-17 वित्त वर्ष में दिसंबर तक 4,699 किलोमीटर सड़कों का निर्माण हुआ.
साफ़ है कि सरकार अब तक जिस रफ़्तार से सड़कें बनाती रही है, उसकी तुलना में अब उसे अपनी गति बढ़ानी होगी.
मगर यह काम बहुत मुश्किल प्रतीत होता है. इसके अलावा सड़क बनाने के लिए ज़मीन का अधिग्रहण करना आसान नहीं होगा.

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केंद्रीय सड़क और उच्चमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि भूमि अधिग्रहण भले ही 'मुश्किल और पेचीदा' है, मगर 'मंत्रालय को इससे दिक्कत नहीं है क्योंकि किसान और अन्य लोग बढ़ा हुआ मुआवज़ा मिलने के बाद उच्चमार्ग परियोजनाओं के लिए अपनी ज़मीन देने के लिए कतारें लगा रहे हैं.'
मगर मंत्री की यह बात जितनी आसान लगती है, वास्तव में यह उतनी आसान है नहीं. दिल्ली और मुंबई को जोड़ने वाले आर्थिक गलियारे का ही उदाहरण ले लीजिए, जिसका एलान करीब एक दशक पहले हुआ था.
इसके लिए काम बेशक शुरू हो चुका है, मगर इस कॉरिडोर का ज़्यादातर हिस्सा ज़मीन अधिग्रहण के मामलों की वजह से ही फंसा हुआ है.
हिटलर ने भी अपनाया था यही तरीका
सीधी सी बात यह है कि आर्थिक विकास की रफ़्तार बढ़ाने के लिए सड़कें बनाने का विचार बहुत पुराना है. यहां तक कि इसे तब से इस्तेमाल किया जा रहा है, जब कीन्स ने इसके बारे में लिखा तक नहीं था.
जब कीन्स अपने सिद्धांत को प्रतिपादित कर रहे थे, एडोल्फ़ हिटलर ने पहले ही इसे आज़माना शुरू कर दिया था. उस दौरान एक लाख से ज़्यादा श्रमिक पूरे देश में चार लेन के बिना चारौहों वाले हाइवे नेटवर्क ऑटोबान के निर्माण में लगा दिए गए थे.

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हिटलर पहली बार 1933 में सत्ता में आए. 1936 तक जर्मन अर्थव्यवस्था मंदी और बेरोज़गारी से उबरकर पटरी पर आ रही थी. इटली और जापान ने भी यही रणनीति अपनाई.
मगर भारत के संदर्भ में ये चीज़ें कितनी कारगर होंगी? यह इसपर निर्भर करेगा कि सरकार सड़कों के निर्माण को कैसे कार्यान्वित करती है.
अच्छी ख़बर यह है कि इसके प्रभारी नितिन गडकरी हैं, जो मोदी सरकार के अच्छा प्रदर्शन करने वाले मंत्रियों में से हैं. और बुरी ख़बर यह है कि भारत किसी काम को सुचारू ढंग से करने के लिए नहीं जाना जाता.
(विवेक कौल 'इंडियाज़ बिग गवर्नमेंट- द इंट्रूसिव स्टेट एंड हाउ इट इज़ हर्टिंग अस' के लेखक हैं)
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