'देश संकट में है' तो शेयर बाज़ार में रौनक क्यों?

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    • Author, दिनेश उप्रेती
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

पिछले तीन साल से ज़्यादा वक़्त से सत्ता संभाल रही मोदी सरकार पहली बार दबाव में दिख रही है. इतना दबाव कि प्रधानमंत्री को ख़ुद सामने आकर पलटवार करना पड़ा. और समस्या जुड़ी है अर्थव्यवस्था से.

विरोधी दल सरकार पर हमला बोल रहे हैं जबकि आर्थिक विश्लेषक उनकी नीतियों में ख़ामियां खोज रहे हैं. बाहर से ही नहीं, सत्ताधीश दल को भीतर से भी विरोध के स्वर सुनने पड़ रहे हैं.

कारोबारी साल 2017-18 की पहली तिमाही (अप्रैल-जुलाई, 2017) के दौरान ग्रोथ रफ्तार धीमी पड़ी और ये 3 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई.

आलोचकों को मौक़ा कैसे मिला?

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आलोचकों को बोलने का मौक़ा इसलिए मिला क्योंकि तिमाही दर तिमाही आधार पर जीडीपी ग्रोथ रेट 6.1 फ़ीसदी से घटकर 5.7 फ़ीसदी पर आ गई.

अगर सालाना आधार पर तुलना करें तो पिछले कारोबारी साल में इस अवधि में ये 7.9 फ़ीसदी रही थी. विपक्षी दलों ने इसके लिए नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों को कोसना शुरू किया.

नोटबंदी और जीएसटी जैसी नीतियों पर सवाल उठ रहे हैं और यहां तक कहा जा रहा है कि इनकी वजह से ही अर्थव्यवस्था 'गर्त' में जा रही है.

लेकिन इस बीच कारोबारी दुनिया का एक कोना ऐसा है जो हैरान करता है.

बाज़ार ने कैसे बनाया रिकॉर्ड?

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जिन दिनों फैक्ट्रियों में मशीनों की रफ़्तार धीमी थी और मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ 10 फ़ीसदी से लुढ़ककर एक फ़ीसदी पर आ गई, ठीक उसी दौरान भारतीय शेयर बाज़ारों में जश्न का माहौल रहा और रिकॉर्ड बनते रहे.

इस साल 26 जुलाई को 50 शेयरों वाला नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी पहली बार 10,000 अंकों के पार चला गया और सेंसेक्स ने 32,000 का आंकड़ा पार किया.

अर्थव्यवस्था में सुस्ती का आलम ये है कि बैंकों से कारोबारियों को दिया जाने वाले क़र्ज़ की रफ्तार चिंताजनक स्तर पर पहुँच गई है.

जानकारों ने क्या बताया?

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स्टेट बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल कॉर्पोरेट को दिए जाने वाले क़र्ज़ की रफ्तार महज 5.1 फ़ीसदी है और ये 1951 के बाद सबसे कम है.

तो फिर ऐसा क्यों है कि हज़ारों किलोमीटर दूर अमरीका और यूरोप की अर्थव्यवस्था में जरा भी झोंका आने पर डांवाडोल होने वाला भारतीय शेयर बाज़ार भारतीय अर्थव्यवस्था की इस हालत से बेपरवाह है.

जानकारों ने इसकी जो वजह बताईं वो उम्मीद भी पैदा करती हैं और चिंता भी.

अर्थशास्त्री सुदीप बंद्योपाध्याय ने बीबीसी हिन्दी से कहा, "शेयर बाज़ार में तेज़ी की बड़ी वजह रिलायंस इंडस्ट्रीज़ जैसी कंपनियों का बेहतरीन प्रदर्शन रहा है. अब चूंकि इन कंपनियों का निफ्टी और सेंसेक्स में भी बड़ा वेटेज़ है इसलिए बाज़ार में तेज़ी दिखना लाज़िमी है."

दोनों को जोड़ना गलत या सही?

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दूसरे जानकारों का कहना है कि बाज़ार और अर्थव्यवस्था को एकसाथ जोड़कर देखना सही नहीं है. बाज़ार विश्लेषक विवेक मित्तल कहते हैं, "शेयर बाज़ार को अर्थव्यवस्था के आईने में नहीं देखा जाना चाहिए."

आंकड़े देते हुए विवेक बताते हैं कि इस तेज़ी में ये अवधारणा भी टूटी है कि भारतीय बाज़ार विदेशी निवेशकों के बूते तेज़ी की रफ्तार पर हैं.

उन्होंने कहा कि हालांकि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने इस साल भी भारतीय शेयर बाज़ारों में जमकर निवेश किया है, लेकिन कुल मिलाकर उनके हिस्से 18,336 करोड़ की बिकवाली ही है. बाज़ार के असल खिलाड़ी घरेलू संस्थागत निवेशक यानी म्यूचूअल फंड्स रहे हैं.

विदेशी निवेशकों की भागीदारी

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विवेक के मुताबिक घरेलू संस्थागत निवेशकों ने इस साल अब तक 65,917 करोड़ रुपये की ख़रीदारी की है और ताज्जुब की बात ये है कि सबसे ज़्यादा ख़रीदारी अगस्त और सितंबर के महीनों में की गई है.

सुदीप बंद्योपाध्याय का कहना है कि विदेशी संस्थागत निवेशक दो तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं. क्योंकि वे विदेशी निवेशक हैं इसलिए उन्हें ख़रीदारी से पहले अपनी करेंसी भारतीय रुपये में बदलनी होती है यानी भारतीय रुपये की मांग बढ़ती है और ये मज़बूत होता है और महंगाई कम होती है.

जानकारों के मुताबिक पिछले दो-तीन सालों के मुकाबले अभी शेयर बाज़ार में लोगों और संस्थाओं की भागीदारी बढ़ी है. नोटबंदी के बाद लोगों ने घर में नकदी रखने के बजाय म्यूचुअल फंड्स में पैसा लगाना शुरू किया है.

मोदी सरकार से उम्मीदें?

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इसके अलावा बाज़ार में तेज़ी की एक और बड़ी वजह है राजनीतिक स्थिरता और आर्थिक सुधारों पर आगे बढ़ते रहने की मोदी सरकार से उम्मीदें.

लेकिन ये भी हक़ीक़त है कि तमाम आलोचनाओं की परवाह नहीं करने वाले मोदी पहली बार डिफेंसिव दिखे. पिछले दिनों कंपनी सेक्रेटरीज़ के कार्यक्रम में मोदी को आर्थिक सुस्ती से जुड़े सवालों पर सफाई देनी पड़ी थी.

प्रधानमंत्री ने इस साल की पहली तिमाही में 5.7 फीसदी पर लुढ़की विकास दर को थामने और अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने का दावा किया. और ये भी कहा कि जीएसटी में ज़रूरत पड़ने पर बदलाव को तैयार है.

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