नज़रिया: आख़िर पीएम मोदी किसको जवाब दे रहे थे?

जेटली मोदी

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    • Author, प्रोफ़ेसर अरुण कुमार
    • पदनाम, अर्थशास्त्री, बीबीसी हिंदी के लिए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को अर्थव्यवस्था की वर्तमान हालत पर भरोसा दिलाने की कोशिश है.

हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि जीडीपी में गिरावट ज़रूर आई है लेकिन अभी भी स्थिति नियंत्रण में है.

निवेश अपने उच्च स्तर पर है, राजस्व घाटा नियंत्रण में है. नोटबंदी के बाद जीडीपी और नकदी का अनुपात 9 प्रतिशत तक पहुंच गया है.

लेकिन अर्थव्यवस्था में समस्या तो आ गई है और इस पर बीजेपी के अंदर से ही आलोचना शुरू हो गई है.

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने एक अंग्रेज़ी अख़बार में लेख लिखकर अर्थव्यवस्था के हालात पर चिंता जताई थी.

यशवंत सिन्हा

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किस बात ने बोलने पर मज़बूर किया?

इससे पहले भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी भी अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता ज़ाहिर कर चुके हैं.

अभी दो दिन पहले ही वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री रह चुके अरुण शौरी ने भी एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में नोटबंदी को 'अब तक का सबसे बड़ा मनीलॉंड्रिंग स्कीम' क़रार दिया है.

अन्य दूसरे लोग भी अर्थव्यवस्था के वर्तमान हालत के लिए केंद्र सरकार के दो बड़े फैसलों नोटबंदी और जीएसटी को ज़िम्मेदार ठहराते रहे हैं.

यशवंत सिन्हा के सवालों का जवाब मौजूदा वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दिया भी.

लेकिन प्रधानमंत्री को बोलना ही इसलिए पड़ा क्योंकि सरकार के सामने राजनीतिक और आर्थिक संकट पैदा हो गया है और उन्हें सामने आकर खुलकर अपनी सरकार का बचाव करना चाहिए.

हालांकि उन्होंने जो आंकड़े दिए हैं, वो सिर्फ संगठित क्षेत्र के आंकड़े हैं. नोटबंदी और जीएसटी के बाद असंगठित क्षेत्र का हाल क्या है, इसके आंकड़े तो अभी आए नहीं हैं.

इसलिए अभी जो जीडीपी के आंकड़े हैं, वो पूरे सच को नहीं बताते. मेरा मानना तो ये है कि इस समय जीडीपी में वृद्धि एक प्रतिशत से अधिक नहीं है.

मनमोहन और मोदी

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सुस्ती तो आनी ही थी

ऐसा मानने की वजह वे सर्वे हैं, जो नोटबंदी या बाद के दिनों में आए. मसलन स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया, ऑल इंडिया मैन्युफ़ैक्चरिंग एसोसिएशन, पंजाब हरियाणा दिल्ली चैंबर ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज़ के सर्वे में बताया गया था कि अर्थव्यवस्था में 60 से 80 प्रतिशत तक की गिरावट का अनुमान लगाया गया था.

चूंकि कुल जीडीपी में असंगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी 45 प्रतिशत तक है. अगर इसमें 60 से 80 प्रतिशत की गिरावट आती है तो जीडीपी की वृद्धि दर भी गिरेगी.

इस गिरावट से हमारे निवेश, कैपेसिटी यूटिलाइजेशन और उद्योग धंधों को दिए जाने वाले कर्ज़ में कमी आई है. ये असर लंबी अवधि वाले होते हैं.

इसीलिए नोटों की कमी ख़त्म होने के बाद, उसका असर अर्थव्यवस्था में दिखाई दे रहा है. लेकिन जैसे ही दूसरा झटका जीएसटी का लगा, तो इससे संगठित क्षेत्र भी परेशानी में आ गए हैं.

यही कारण है कि विकास दर प्रभावित हुई है.

उर्जित पटेल

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पीएम का बोलना डैमेज कंट्रोल

चूंकि अभी सरकार महंगाई दर को जितना बता रही है, उसमें सेवा क्षेत्र शामिल नहीं है, जिसपर कि महंगाई का सबसे अधिक असर पड़ता है तो लगता है कि महंगाई दर भी 6-7 प्रतिशत तक है.

यानी आर्थिक विकास दर कम है और महंगाई दर ऊंची है. ऐसे दौर में किसान, नौजवान, व्यापारी, उद्योगपति सभी परेशान हैं, तो ऐसे समय प्रधानमंत्री को लगा कि उन्हें सामने आकर जवाब देना चाहिए.

मोदी का अर्थव्यवस्था पर बोलना एक किस्म का डैमेज कंट्रोल है, जिससे एक आश्वासन दिया जा सके कि हम कुछ कर सकते हैं और हम करेंगे.

लेकिन सबसे बड़ी समस्या है कि सरकार मौजूदा हालात को स्वाकार नहीं कर रही है क्योंकि वो ऐसा नहीं जताना चाहती कि नोटबंदी फेल हो गई या जीएसटी में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

प्रधानमंत्री ने मुफ़्त रसोई गैस योजना, मुफ़्त बिजली योजना, सस्ती एलईडी योजना, मुद्रा बैंक योजना आदि का ज़िक्र किया या कारों की बिक्री, हवाई यात्रा आदि के आंकड़े का ज़िक्र किया है.

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दावों और असली तस्वीर

लेकिन ध्यान देने वाली बात ये है कि मौजूदा समस्या मैक्रो इकोनॉमिक समस्या है. ये इससे हल नहीं होगी कि आपने थोड़ी बहुत छूट कहां कहां दी है.

इसलिए ये थोड़ी बहुत छूट के आंकड़े देकर हम मैक्रो इकोनॉमिक्स की समस्याओं को सही नहीं ठहरा सकते.

प्रधानमंत्री की कोशिश रही है कि वो खुशनुमा तस्वीर दिखाएं, लेकिन ये कहना कि इससे सारी तस्वीर बदल गई है तो ऐसा नहीं है.

लेकिन सरकार की सबसे अधिक चिंता है कि अंदर से आलोचनाएं उठ रही हैं.

इसिलिए ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री का अर्थव्यवस्था पर जो भाषण था वो पार्टी के अंदर की आलोचनाओं और देशभर में चल रहे विरोध प्रदर्शनों को लक्ष्य करके दिया गया.

ऑडियो कैप्शन, नोटबंदी का जीडीपी पर क्या होगा असर?

निशाना किस पर?

प्रधानमंत्री का ईशारा अंदर के आलोचकों पर ज़्यादा है, क्योंकि के आलोचक तो आलोचना कर ही रहे थे.

बड़ा पेंच यही है कि जबतक हम ये स्वीकार नहीं करेंगे कि समस्या है, तब तक इसमें सुधार की गुंजाइश भी नहीं बनती.

देश प्रधानमंत्री से कुछ ठोस आश्वासन सुनना चाहता था.

(बीबीसी संवाददाता संदीप राय से बातचीत पर आधारित.)

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