नज़रिया: 'मां-बाप बेटियों की 18 साल से कम उम्र में शादी करने से डरेंगे?'

मुसलमान उलेमा

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    • Author, शकील अख्तर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले दिनों भारत के सुप्रीम कोर्ट ने लड़कियों को बराबरी का दर्जा देने से संबंधित एक बेहद अहम फ़ैसला दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नाबालिग पत्नी से सेक्स संबंधों को बलात्कार माना जाएगा.

यदी बीवी 15-18 साल के बीच की है और वो पति के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराती है तो दोनों के बीच बने सेक्स संबंधों को बलात्कार माना जाएगा. भारत में लड़कियों और लड़कों को 18 साल की उम्र होने पर बालिग़ माना जाता है और दोनों के बीच आपसी सहमति से सेक्स बनाने की उम्र भी यही तय की गई है.

भारतीय दंड संहिता के तहत यदि कोई लड़की 18 साल से कम उम्र की है और अगर वो रज़ामंदी से भी सेक्स संबंधी बनाती है तब भी उन्हें बलात्कार ही माना जाएगा. लेकिन शादी के मामले में उम्र का उल्लेख किया गया था और छूट दी गई थी.

भारतीय सरकार का तर्क था कि भारत का समाज एक पारंपरिक समाज है और लड़कियों की शादी अक़्सर क़ानूनी तौर पर बालिग़ होने से पहले की उम्र में भी हो जाती है इसलिए अगर 18 बरस की सीमा तय कर दी गई तो समाज में मुश्किलें पैदा हो जाएंगी.

सुप्रीम कोर्ट ने जो फ़ैसला सुनाया है उसके दूरगामी प्रभाव होंगे. यह फ़ैसला देश में शादियों की संख्या को भी कम करेगा. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सेवा के सर्वेक्षणों के मुताबिक देश में 47 प्रतिशत विवाह 14-20 वर्ष की उम्र में होते थे.

सुप्रीम कोर्ट

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इमेज कैप्शन, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि 18 साल से कम उम्र की पत्नी से सेक्स संबंधों को रेप माना जाएगा.

लेकिन पिछले सालों में इसमें बड़ी गिरावट दर्ज की गई है और अब ये दर कम होकर 27 फ़ीसदी पर आ गई है. लेकिन संख्या के हिसाब से ये अब भी बहुत ज़्यादा है. भारत में अब भी हर दसियों लाख नाबालिग लड़कियों की शादी होती है.

नाबालिग लड़कियों की सबसे ज़्यादा शादियां हिंदुओं में होती हैं. दूसरे नंबर पर मुसलमान हैं जहां कम पढ़े लिखे और पिछड़े तबके में अक्सर लड़कियों की शादी कमसिन उम्र में कर दी जाती है.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद से मां-बाप 18 वर्ष से कम उम्र में लड़कियों की शादी करने से डरेंगे. इस फ़ैसले का सबसे अहम पहलू ये है कि इस मामले में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने लड़कियों को शादी के मामले में क़ानूनी तौर पर अपनी पसंद का हक़ दे दिया है.

पारंपरिक तौर पर शादियां मां-बाप ही तय करते हैं और ज़्यादातर मामलों में लड़कियों की राय तक नहीं ली जाती है और उन्हें मां-बाप की ही पसंद माननी होती है. लेकिन अब मां-बाप को लड़कियों की शादी करते वक़्त उनकी पसंद और नापसंद का ख़्याल भी रखना पड़ेगा क्योंकि 18 साल की उम्र होने पर लड़के और लड़कियों को अपने फ़ैसले ख़ुद लेने का हक़ भी मिल जाता है.

कम उम्र में शादी पर रोक लगाने का सबसे ज़्यादा विरोध हिंदू और मुसलमान ही कर रहे थे. एक समय ऐसा भी था जब मुसलमान न सिर्फ़ इसे शरियत के ख़िलाफ़ देते थे बल्कि वो सरकार के शादियों का रजिस्ट्रेशन ज़रूरी करने के फ़ैसले का भी विरोध कर रहे थे. लेकिन इस बार सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर किसी वर्ग से गुस्से या विरोध की कोई आवाज़ नहीं आई.

मुस्लिम महिलाएं

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ये फ़ैसला एक ऐसे समय में आया है जब लॉ कमीशन देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए मसौदा तैयार कर रहा है. भारत में अलग-अलग धर्मों के नागरिकों के लिए अलग अलग नागरिक क़ानून हैं.

शादी, तलाक़ और विरासत जैसे मसले तय करने के लिए भारत में अलग अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ हैं. समान नागरिक संहिता का सबसे ज़्यादा विरोध भारत के मुसलिम उलेमा ही करते हैं.

सरकार ने लॉ कमीशन को समान नागरिक संहिता लागू करने की ज़िम्मेदारी सौंपी है. लॉ कमीशन ने कुछ समय पहले इस सिलसिले में अलग अलग धर्मों के नेताओं को सवाल भेजे थे.

लॉ कमीशन समान नागरिक संहिता का एक ऐसा मसौदा तैयार कर रहा है जो पूरी तरह लोकतांत्रिक हो, जो सभी के लिए स्वीकार्य हो और जिससे किसी को ये न महसूस हो कि ये देश के हिंदू बहुसंख्यकों का ध्यान रखते हुए बनाया गया है.

विशेषज्ञों का मानना है कि समान नागरिक संहिता को ग़ैर ज़रूरी तौर पर एक संवेदनशील मसला बना दिया गया है जबकि अतीत में इसे लागू करने का कोई गंभीर प्रयास किया ही नहीं गया है.

ये मानवाधिकार का दौर है. लोकतांत्रिक देशों में क़ानून समानता, लैंगिक समानता और बुनियादी अधिकारों पर आधारित है. कोई भी पारंपरिक नियम जो इंसान के मौलिक अधिकारियों या व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन करते हों उन्हें लोकतांत्रिक समाज में कोई जगह नहीं दी जा सकती है.

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