समान नागरिक संहिता: पहल न होने के असल कारण

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
समान नागरिक संहिता या फिर कॉमन सिविल कोड या फिर यूनिफार्म सिविल कोड - समान नागरिकता के क़ानून के लिए भारत में बहस लगातार चल रही है.
इसकी वकालत करने वालों का कहना है कि भारत में सभी नागरिकों के लिए एक जैसा नागरिक कानून होना चाहिए. चाहे वो किसी धर्म के क्यों ना हों.
यह बहस इसलिए हो रही है क्योंकि इस तरह के क़ानून के अभाव में महिलाओं के बीच आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा बढ़ती जा रही है.
हालांकि सरकारें इस तरह का क़ानून बनाने की हिमायत तो करती रही हैं, लेकिन राजनीतिक मजबूरियों की वजह से किसी सरकार ने इसे लागू करने के लिए कभी कोई ठोस पहल नहीं की है.
समाज के अलग-अलग प्रतिनिधि आखिर क्या सोचते हैं ?

संदीप महापात्रा, संघ के विचारक
जिस तरह भारतीय दंड संहिता और 'सीआरपीसी' सब पर लागू हैं, उसी तरह समान नागरिक संहिता भी होनी चाहिए, जो सबके लिए हो - चाहे वो हिन्दू हों या मुसलमान हों, या फिर किसी भी धर्म के माननेवाले क्यों ना हों.
लेकिन सिविल क़ानून सबके लिए अलग अलग है. हिन्दुओं, सिखों और जैनियों के लिए ये अलग है , बौद्धों और पारसियों के लिए ये अलग है.
जहाँ तक विवाह का सवाल है तो यह सिविल क़ानून पारसियों, हिन्दुओं, जैनियों, सिखों और बौद्धों के लिए 'कोडिफाई' कर दिया गया है.
फिर एक 'स्पेशल मैरिज एक्ट' भी लाया गया है जिसके तहत सभी धर्म के अनुयायियों को अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाह के लिए एक सामाजिक सुरक्षा प्रदान की गई.
बहस वहाँ शुरू होती है जहाँ हम मुसलामानों की बात करते हैं.
1937 से मुस्लिम पर्सनल लॉ में कोई रिफार्म नहीं हुए हैं. समान नागरिक संहिता की बात आज़ादी के बाद हुई थी, लेकिन उसका विरोध हुआ जिस वजह से उसे 44वें अनुच्छेद में रखा गया.
हलाकि यह संभव है. हमारे पास गोवा का उदहारण भी है जहाँ समान नागरिक संहिता लागू है.
जब भी समान नागरिक संहिता की बात होती है, उस पर राजनीति शुरू हो जाती है.
शायद यही कारण है कि कोई इसमें हाथ डालना चाहता है.

मुन्ना शर्मा, हिन्दू महासभा
हिन्दुओं में शादी जन्मों का बंधन है जिसे तोड़ा नहीं जा सकता. साथ ही सम्मिलित हिन्दू परिवार की जो कल्पना है वो इस समाज की संस्कृति का हिस्सा है.
मगर अब आधुनिक युग में महिलाओं को भी अधिकार होना चाहिए कि वो अपने फैसले ख़ुद ले सकें. उन्हें भी बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए.
चाहे वो संपत्ति हो या विवाह. हिन्दू महिलाएं भी चाहती हैं कि उनके पिता और पति की संपत्ति में उन्हें बराबर का हिस्सा मिले. यह बराबरी का मुद्दा है.
हर समाज की महिलाएं बराबरी चाहती हैं, इसलिए समान नागरिक संहिता होनी चाहिए. मगर ना तो भाजपा इस बारे में गंभीर है और ना ही दूसरे राजनीतिक दल.

ताहिर महमूद, विधि आयोग के पूर्व सदस्य
ज़्यादातर लोगों को पता ही नहीं है कि संविधान में यूनिफार्म सिविल कोड के बारे में क्या कहा गया है. वो डायरेक्टिव प्रिंसिपल ऑफ़ स्टेट पॉलिसी यानी राज्यों के लिए नीति निदेशक तत्व की बात करते हैं.
लेकिन यह नीति निदेशक तत्व संसद के लिए नहीं बल्कि राज्यों के लिए हैं. यह कहा गया है कि राज्य इस बात का प्रयास करेंगे कि समान नागरिक संहिता हो.
इसका यह मतलब है कि जिस भी समुदाय के लिए क़ानून बने उसमे समानता होनी चाहिए. मगर मुस्लिम पर्सनल लॉ 1400 साल पहले बना था.
इसे संसद ने नहीं बनाया. संसद ने हिन्दू सक्सेशन एक्ट बनाया है. सबसे ज़्यादा महिला विरोधी क़ानून वही है.
इस क़ानून में कमी का एक उद्धरण यह है कि हिन्दू पुरूषों पर यह लाज़मी है कि वो अपने बूढ़े माँ बाप का भरण पोषण करें.
मगर यह इस शर्त के साथ है कि माँ बाप हिन्दू हों, जबकि मुसलमान पुरूष पर यह तब भी अनिवार्य है अगर उसके माँ बाप मुसलामन ना भी हों.
लिंग भेद हर क़ानून में है इसलिए ज़रूरी है कि क़ानूनों की समीक्षा हो. भारत विविधता का देश है इसलिए बेहतर होगा कि एक समान क़ानून की बजाय सभी क़ानूनों की समीक्षा की जाए और उन सब में समानता लाई जाए.

जॉन दयाल, अखिल भारतीय ईसाई परिषद
देखिये अभी हिन्दुओं में भी यूनिफार्म सिविल कोड नहीं है. मैं दक्षिण भारत से आता हूँ और वहां हिन्दू समाज के एक तबके में मामा और भांजी के बीच शादी की प्रथा है.
अगर कोई हरियाणा में ऐसा करे तो दोनों की हत्या हो जाएगी. सैकड़ों जातियां हैं जिनके शादी के तरीके और नियम अलग अलग हैं.
उसी तरह ईसाइयों में भी कॉमन सिविल कोड है मगर कई ईसाई अपनी जाती में ही शादी करना चाहते हैं. अब हमारे बीच रोमन कैथलिक भी हैं और प्रोटेस्टेंट भी.
मैं रोमन कैथलिक हूँ और हमारे यहां तलाक़ की कोई गुंजाइश नहीं है. शादी हमारे यहां जन्म जन्मान्तर का बंधन है.
वहीं प्रोटेस्टंट्स में तलाक़ है. यह जो भारतीय जनता पार्टी रह रहकर यूनिफार्म सिविल कोड की बात उछालती है वो सिर्फ़ राजनीतिक लाभ लेने के लिए.
इस मुद्दे पर राजनीतिक दल भी अछूते नहीं हैं. यूनिफ़ार्म कोड पर कोई गंभीर नही है. हमें कोई प्रारूप दिखाओ तो सही. कुछ भी नहीं है.

राणा परमजीत सिंह, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी
हमारी भी यह बहुत पुरानी मांग रही है कि हमें हिन्दू सक्सेशन एक्ट के अधीन ना लाया जाया क्योंकि हमारे सबसे पहले गुरु - गुरुनानक देव जी ने कभी जनेऊ नहीं पहना था.
हम इसी संघर्ष में लगे हैं कि हमें अलग धर्म के रूप में मान्यता मिले. मगर हमारे मामलों का निपटारा हिन्दुओं के लिए बनाए गए क़ानून के तहत किया जाता है.
हमारा पूरा सिस्टम गुरु ग्रन्थ साहिब के अनुसार ही चलता है. हमारे यहां तलाक़ नाम की चीज़ नहीं है. हम चाहते हैं कि सरकार बातचीत करे ना कि कोई क़ानून किसी पर ज़बरदस्ती थोप दे.

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मुख्तार अब्बास नक़वी, केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री
कुछ मुस्लिम महिलाओं ने कहा है कि तलाक़ के बारे में एक अलग क़ानून बनाया जाना चाहिए. लेकिन यह भी सही है कि समाज में सुधारों के लिए बहस की ज़रुरत है.
हमारे देश में ऐसा नहीं हो सकता कि डंडे के ज़ोर पर कोई क़ानून लागू कर दिया जाए. यह देश संविधान से चलता है.
मांगें उठती रहती हैं और सुधारों की गुंजाइश बनी रहती है. लेकिन उसके लिए समाज को ही तैयार होने की ज़रुरत है.
वैसे समानता की मांगें भी उठती रहती हैं मगर यह सब कुछ आम राय और सहमती से ही संभव हो सकता है. अभी इस पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता
(ये समाज के इन प्रतिनिधियों के अपने विचार हैं)












